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आखिर क्यों मुंबई के इस गुरुद्वारे में हर साल होती है मधुबाला के नाम पर अरदास, बेहद दिलचस्प है किस्सा

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Source :- LIVE HINDUSTAN

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मधुबाला से जुड़े कई अनसुने किस्से आज भी आज भी बी-टाउन में मशहूर है। लेकिन उनसे जुड़ी एक बात शायद ही आप जानते होंगे। मुंबई के इस गुरुद्वारे में हर साल मधुबाला के नाम से पर अरदास होती है।

हिंदी सिनेमा जगत की सबसे खूबसूरत अभिनेत्री मानी जाने वाली मधुबाला आज भी लोगों के दिलों पर राज करती हैं। अपने करियर में मधुबाला ने कई सुपरहिट फिल्में दी हैं। उनकी आइकॉनिक फिल्मों को आज तक कोई दूसरी फिल्म टक्कर नहीं दे पाई। मधुबाला पर्दे पर जिस तरह से चमकीं, उनकी असल जिंदगी में काफी अंधेरों से घिरी थी। मधुबाला की लव लाइफ और शादीशुदा जिंदगी काफी खराब रही। अपने आखिरी दिनो में एक्ट्रेस ने काफी दर्द झेले। बता दें कि मधुबाला से जुड़े कई अनसुने किस्से आज भी आज भी बी-टाउन में मशहूर है। लेकिन उनसे जुड़ी एक बात शायद ही आप जानते होंगे। मुंबई के इस गुरुद्वारे में हर साल मधुबाला के नाम से पर अरदास होती है।

प्रोड्यूसर के साथ इस शर्त पर साइन करती थीं एग्रीमेंट

ये बात कम लोग ही जानते हैं कि मुस्लिम परिवार में जन्मी मधुबाला उर्फ मुमताज जहां देहलवी, गुरुनानक देव की दीवानी थीं। उनकी दीवानगी का आलम ये था कि वो आखिरी वक्त तक उनके पर्स में “जपुजी साहिब” की किताब मौजूद रही। मधुबाला फारसी भाषा में लिखे जपुजी साहिब का पाठ हर रोज करती थीं। यही नहीं वो पूरे साल कहीं भी रहें लेकिन गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव यानी गुरुपर्व पर मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे में मौजूद रहती थीं। ये बात वो किसी भी फिल्म को साइन करने से पहले प्रोड्यूसर के साथ होने वाले एग्रीमेंट में भी लिखवा लेती थीं।

ऐसे खुला था मधुबाला का ये राज

बता दें कि, उस दौर के संगीत निर्देशक एस महेन्द्र के मुताबिक, मधुबाला के गुरुनानक देव जी के प्रति प्रेम का खुलासा तब हुआ,जब एक दिन किसी फिल्म के सेट पर अगले शॉट की तैयारी चल रही थी। वहीं, इस दौरान खाली वक्त में मधुबाला ने अपने पर्स में से एक छोटी-सी किताब निकाली और अपना सिर ढककर उसे पढ़ने लगीं। कुछ देर बाद उन्हें बुलावा आ गया कि अगला शॉट तैयार है। ऐसे में एक्ट्रेस अपना पर्स और वो किताब महेंद्र जी को देकर शॉट देने के लिए चली गईं। इसके बाद जब एस महेंद्र ने किताब खोलकर देखी तो वह फारसी भाषा में लिखा जपजी साहिब था।

ऐसे शुरू हुई जपुजी साहिब के करीब

इसके बाद जब मधुबाला शूटिंग पूरी करके वापस आईं तब एस महेंद्र ने उनसे पूछा कि ये सब क्या है? इस पर उन्होंने बताया, ‘मेरे पास सब कुछ है, लेकिन मैं फिर भी अंदर से पूरी तरह से टूट चुकी थी। ऐसे में मेरे एक जानने वाले मुझे अंधेरी के गुरुद्वारे में ले गए। दर्शन के बाद वहां के ग्रंथि को जब मेरी परेशानी के बारे में बताया तो उन्होंने रोज जपुजी साहिब का पाठ करने का सुझाव दिया। चूंकि मुझे गुरमुखी नहीं आती, इसलिए मैंने फारसी भाषा में छपी किताब मंगवाई। उस दिन ये किताब हमेशा मेरे पास रहती है और मैं बिना एक दिन भी नागा किए इसे रोज पढ़ती हूं। इसे पढ़ने से मुझे एक अजीब-सा सुकून व शांति मिलती है।’

हर साल गुरुद्वारे में बोली जाती है ये अरदास

बता दें कि अंधेरी गुरुद्वारे के ग्रंथ बताते हैं कि साल 1969 में मधुबाला ने अपनी मौत से करीब 7 साल पहले ये इच्छा जाहिर की थी कि वह गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव पर लंगर की सेवा देना चाहती हैं और इसका पूरा खर्च का चेक वो गुरुद्वारा कमेटी को दे देती थीं। ये सिलसिला सात साल तक लगातार चलता रहा। उनकी मौत के बाद करीब छह साल तक उनके पिता ने यह सेवा संभाली। इसके बाद मधुबाला की मौत के बाद उनके पिता और गुरुद्वारा कमेटी और वहां के श्रद्धालुओं ने तय किया कि मधुबाला भले ही सशरीर नहीं हैं, लेकिन नानक देव के प्रति उनकी श्रद्धा को देखते हुए अरदास लगाई जाएगी। ऐसे में हर साल गुरुनानक देव जी के जन्मोत्सव पर होने वाली अरदास में यह बोला जाता है, ‘है पातशाह, आपकी बच्ची मधुबाला की तरफ से लंगर-प्रशाद की सेवा हाजिर है, उसे अपने चरणों से जोड़े रखना।’

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