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ईरान ने क्या होर्मुज़ स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण खो दिया है?

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Source :- BBC INDIA

सितंबर महीने में होर्मुज़ स्ट्रेट के पास अपनी पकड़ को अपनी रणनीतिक ताक़त के तौर पर पेश किया था (फ़ाइल फ़ोटो)

हाल के हफ्तों में, फ़ारस की खाड़ी के अरब देश तेल टैंकरों की आवाजाही बढ़ाने और वैकल्पिक मार्गों का ज़्यादा इस्तेमाल कर अपने तेल निर्यात को ईरान युद्ध से पहले के स्तर तक वापस लाने में सफल रहे हैं.

वहीं, अमेरिका की ओर से लगाई गई समुद्री नाकेबंदी की वजह से ईरान का निर्यात लगभग शून्य बना हुआ है.

यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब ईरान ने हालिया युद्ध की शुरुआत से ही होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाज़ों की आवाजाही रोकने को अपनी प्रमुख ताक़त में से एक बनाने की कोशिश की थी.

ईरान ने इस रणनीतिक जलमार्ग में बाधा पैदा करके अमेरिका के सामने अपनी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाने की कोशिश की थी.

मौजूदा हालात में पड़ोसी देशों के बढ़े हुए निर्यात और ईरानी अधिकारियों की उस धमकी के बीच अंतर दिखाई देता है, जिसमें कहा गया था कि अगर ईरान के कच्चे तेल का निर्यात रोका गया तो दूसरे देशों का निर्यात भी रुक जाएगा.

तो क्या ईरान ने इस धमकी को लागू करने की क्षमता खो दी है और क्या अमेरिका होर्मुज़ में आवाजाही पर नियंत्रण हासिल करने में सफल रहा है या स्थिति इससे कहीं ज़्यादा जटिल है?

होर्मुज़ में क्या बदला है?

होर्मुज़

टैंकर ट्रैकिंग संस्था केप्लर की रिपोर्ट के मुताबिक़, 1 से 28 सितंबर के बीच हर दिन कम से कम 1.65 करोड़ बैरल कच्चे तेल और कंडेनसेट क्षेत्र से निर्यात किया गया, जो ईरान के तेल को शामिल किए बिना युद्ध से पहले के औसत के बराबर है.

इस मात्रा में से क़रीब 99 लाख बैरल, यानी 60 प्रतिशत, होर्मुज़ से होकर गुजरा. 23 प्रतिशत तेल ओमान सागर के तट पर और मुख्य रूप से फ़ुजैरा में लोड किया गया, जबकि 17 प्रतिशत लाल सागर के रास्ते बाहर गया.

केप्लर के मुताबिक़, सितंबर में क्षेत्र से निर्यात किए गए कुल तेल का करीब 40 प्रतिशत जलडमरूमध्य से होकर नहीं गुजरा और जमीनी पाइपलाइनों के जरिए लाल सागर या ओमान की खाड़ी के बंदरगाहों तक पहुंचा. युद्ध से पहले यह आंकड़ा 17 प्रतिशत था.

केप्लर ने अनुमान लगाया है कि जुलाई में नाकाबंदी फिर शुरू होने के बाद सितंबर में होर्मुज़ से ईरानी तेल की आवाजाही लगभग शून्य रही. युद्ध से पहले ईरान हर दिन क़रीब 17 लाख बैरल तेल निर्यात करता था और इसे शामिल करने पर सितंबर में क्षेत्र का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर का क़रीब 91 प्रतिशत हो जाता है.

इस बदलाव का एक हिस्सा सऊदी अरब की लाल सागर तक जाने वाली पाइपलाइनों और संयुक्त अरब अमीरात की फ़ुजैरा तक जाने वाली पाइपलाइन के इस्तेमाल से संभव हुआ है, लेकिन होर्मुज़ स्ट्रेट के भीतर तेल टैंकरों की आवाजाही भी बढ़ी है.

निगरानी करने वाले लोग होर्मुज़ में आवाजाही बढ़ने के प्रमुख कारणों में अमेरिकी वायु और नौसैनिक बलों की भूमिका को मानते हैं.

ख़तरे के साए में समुद्री मार्ग पार करना

माल को दूसरे जहाज़ में ट्रांसफ़र करना, टैंकर उपलब्ध कराना और सैन्य सहायता प्रदान करना क्षेत्रीय व्यापार की लागत बढ़ाते हैं

लेकिन क्या निर्यात में यह बढ़ोतरी अमेरिका के साथ युद्ध में होर्मुज़ स्ट्रेट को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की ईरान की रणनीति की नाकामी मानी जा सकती है?

ईरान की शक्ति पर इस नई स्थिति के असर का आकलन करते हुए इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरान के वरिष्ठ विश्लेषक हमीदरेज़ा अज़ीज़ी तेहरान के होर्मुज़ में असुरक्षा पैदा करने के मक़सद पर जोर देते हैं.

उन्होंने बीबीसी फ़ारसी से बातचीत में बताया कि ईरानी अधिकारी जिसे “स्मार्ट कंट्रोल” कहते हैं, वह आवाजाही में बाधा डालने, खतरा बढ़ाने और ऊर्जा की कीमतों को प्रभावित करने की कोशिश है.

इस नजरिए से हमला या हमले की आशंका जहाज़ मालिकों, बीमा कंपनियों और ख़रीदारों को जोखिम उठाने से रोक सकती है और इस तरह व्यापार को सीमित कर सकती है.

ऐसा असर पैदा करने के लिए ईरान के लिए हर जहाज़ को रोकना जरूरी नहीं है. यात्रा की लागत और सुरक्षा को लेकर कंपनियों का फ़ैसला भी ईरान के आकलन का हिस्सा है.

इसी बीच, अमेरिकी सैन्य समर्थन ने भी होर्मुज़ स्ट्रेट की स्थिति बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

सुरक्षा कंपनी ईओएस रिस्क ग्रुप के वरिष्ठ ख़ुफ़िया विश्लेषक मार्टिन केली ने बीबीसी वेरिफाई को बताया कि अमेरिकी समर्थन मुख्य रूप से “जहाज़ों को हवाई सहायता” देने के रूप में है. इसमें चेतावनी जारी करना और ड्रोन, मिसाइल या नाव जैसे आने वाले ख़तरों को रोकना शामिल है.

हालांकि, जो जहाज़ अमेरिका के सुझाए गए दक्षिणी रास्ते से ओमान के तट के पास होकर गुजरते हैं और ईरान के उत्तरी मार्ग का इस्तेमाल करने के लिए उससे अनुमति नहीं लेते, वे अब भी हमले का निशाना बन रहे हैं.

ऐसी स्थिति में भी इन तेल टैंकरों को ईरान की ओर से निशाना बनाए जाने की ख़बरें सामने आई हैं. ब्रिटेन के मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस सेंटर (यूकेएमटीओ) ने 21 सितंबर को एक आने वाले तेल टैंकर पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल के टकराने और 23 सितंबर को एक प्रोजेक्टाइल टकराने के बाद एक मालवाहक जहाज़ में आग लगने की जानकारी दी.

इन घटनाओं का जारी रहना दिखाता है कि जहाज़ अब भी ख़तरे में हैं, हालांकि हमलों के होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ईरान की सैन्य क्षमता में पहले की तुलना में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

संयुक्त अरब अमीरात के शटल तेल टैंकर

होर्मुज़ क्षेत्र का मैप

शटल तेल टैंकरों का नेटवर्क शुरू होने से खाड़ी के बंदरगाहों और समुद्री रास्तों के बाहर कार्गो ट्रांसफर वाले स्थानों के बीच यात्रा संभव हुई है. ये जहाज़ होर्मुज़ के बाहर दूसरे तेल टैंकरों को तेल सौंपते हैं, जो उपभोक्ता बाज़ारों तक लंबा रास्ता तय करते हैं.

केप्लर ने इस नेटवर्क में कम से कम 63 बहुत बड़े तेल टैंकरों की पहचान की है. इनमें से 35 नियमित रूप से, लगभग हर 16 दिन में, एक बार आना-जाना करते हैं. अगस्त में होर्मुज़ से गुज़रने वाले 70 प्रतिशत से ज़्यादा कच्चे तेल को फ़ुजैरा के पास एक जहाज़ से दूसरे जहाज़ में ट्रांसफ़र किया गया.

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की भूमिका बताते हुए अज़ीज़ी ने व्यापार के कुछ जोखिम को स्वीकार करने की यूएई सरकार की भूमिका पर ज़ोर दिया.

मौजूदा ख़तरों की जानकारी होने के बावजूद यह समर्थन जारी रहा और कच्चे तेल के निर्यात की स्थिति सुधारने की कोशिश की गई.

हमीदरेज़ा अज़ीज़ी इस बारे में कहते हैं, “संयुक्त अरब अमीरात की आर्थिक पहल और अमेरिका की सैन्य और परिचालन कार्रवाइयों के संयोजन ने होर्मुज़ में बाधा पैदा करने की ईरान की रणनीति को मुश्किल में डाल दिया है.”

लेकिन ख़ास हालात और इस स्थिति में अलग-अलग तरह की समस्याओं का सामना कर रहे कई पक्षों की मौजूदगी को देखते हुए, नई पहलों से उन सभी के लिए समाधान नहीं निकल पाया है.

इन आवाजाही का ख़र्च कौन चुका रहा?

कार्गो को दूसरे जहाज़ में ट्रांसफ़र करने, तेल टैंकरों की व्यवस्था करने और सैन्य समर्थन देने से क्षेत्रीय व्यापार की लागत बढ़ी है (सांकेतिक तस्वीर)

कार्गो को दूसरे जहाज़ में ट्रांसफ़र करने, तेल टैंकरों की व्यवस्था करने और सैन्य समर्थन देने से क्षेत्रीय व्यापार की लागत बढ़ी है. इसका कुछ हिस्सा सरकारें और निर्यात करने वाली कंपनियां चुका रही हैं.

इन व्यवस्थाओं के टिकाऊ होने का आकलन करने के लिए यह भी अहम है कि इन लागतों के बावजूद कितनी आय बच रही है.

इराक़ में निर्यात बढ़ाने के लिए उन ख़रीदारों को भारी छूट दी गई है, जो खाड़ी में इराक़ी तेल की डिलीवरी लेते हैं. ब्लूमबर्ग ने दस्तावेज़ देखे हैं जिसके मुताबिक़, इराक़ की सरकारी तेल विपणन कंपनी ने अक्तूबर के कार्गो के लिए बसराह मीडियम को बाज़ार के संदर्भ सूचकांकों से 34.5 डॉलर और बसराह हेवी को 37 डॉलर कम कीमत पर पेश किया है.

केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक़, सितंबर में इराक़ का निर्यात कम से कम 26 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया. इसलिए भारी छूट बढ़ी हुई बिक्री के साथ दी गई है और यह दिखाता है कि निर्यात की मात्रा बनाए रखने का मतलब ज़रूरी नहीं है कि हर बैरल से होने वाली आय भी बनी रहे.

अज़ीज़ी निर्यात बनाए रखने की लागत का जिक्र करते हुए कहते हैं, “छूट के रूप में या यूएई के मामले में जोखिम को कवर करने के लिए जो लागत चुकाई जाती है, उसे लंबे समय तक जारी रखना मुश्किल है. अमेरिका के लिए भी सैन्य समर्थन की लागत एक मुद्दा है.”

मार्टिन केली भी जोर देते हैं कि यह सवाल बना हुआ है कि ये शटल जहाज़ कब तक चलते रहेंगे, ख़ासकर तब जब उन पर हमले जारी हैं.

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वित्तीय और परिचालन दबाव किस मोड़ पर संबंधित सरकारों के लिए इन व्यवस्थाओं को जारी रखना मुश्किल बना देगा.

कब कहा जा सकता है कि सामान्य हालात वापस होंगे

ईरान युद्ध के बाद से ऊर्जी की कीमतों और इसकी सप्लाई पर असर पड़ा है (सांकेतिक तस्वीर)

हालांकि सितंबर में आवाजाही में बढ़ोतरी उल्लेखनीय रही है.

केप्लर के अनुमान से पता चलता है कि एलएनजी, एलपीजी, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और पेट्रोलियम उत्पादों को ले जाने वाले जहाज़ों की आवाजाही भी युद्ध से पहले की तुलना में काफी कम हुई है.

28 सितंबर को ख़त्म हुए सात दिनों के औसत में केप्लर ने होर्मुज़ के रास्ते रोजाना क़रीब 1.35 करोड़ बैरल कच्चे तेल के बाहर जाने का आंकड़ा दर्ज किया, जो युद्ध से पहले के स्तर के लगभग बराबर है.

इसी अवधि में पेट्रोलियम उत्पादों के समूह की मात्रा उस स्तर से करीब 81 प्रतिशत कम थी.

कच्चे तेल और अन्य कार्गो की स्थिति में अंतर होर्मुज़ की स्थिति का आकलन और जटिल बनाता है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने 28 सितंबर को क़तर से जुड़े जहाज़ों की आवाजाही बढ़ने की जानकारी दी, लेकिन गैस, उर्वरक और क्षेत्रीय देशों के आयात की स्थिति कच्चे तेल के आंकड़ों में दिखाई नहीं देती.

गैस और रसायनों की स्थिति के अलावा क्षेत्रीय देशों के आयात का मुद्दा भी हल नहीं हुआ है और कम से कम फिलहाल इस समस्या के समाधान की कोई व्यवस्था नज़र नहीं आती.

क्षेत्रीय देशों के लिए समुद्री मार्ग से सामान की आपूर्ति भी महत्वपूर्ण है और कच्चे तेल के निर्यात में बढ़ोतरी से उन जहाज़ों की स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं मिलती, जिन्हें खाड़ी में प्रवेश करना है.

मौजूदा संतुलन का आकलन करते हुए वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता और खाड़ी देशों के मामलों के विश्लेषक साइमन हेंडरसन ने बीबीसी फ़ारसी से कहा, “अमेरिका के पास अभी खाड़ी में सबसे बड़ी सैन्य ताक़त है और वह ईरान के ख़तरों का अच्छी तरह सामना कर रहा है.”

“वह दक्षिणी गलियारे के जरिए खाड़ी से बड़ी मात्रा में तेल बाहर निकालने में सफल रहा है, जो ओमान के क़रीब है. इसलिए यह सोचना सही है कि ईरान कमजोर स्थिति में और अमेरिका मजबूत स्थिति में है. लेकिन जैसा कि हमने अनुभव से सीखा है, कोई नहीं जानता कि यह स्थिति कब तक बनी रहेगी.”

कच्चे तेल के निर्यात में बढ़ोतरी और ईरान के निर्यात पर जारी प्रतिबंध के साथ, ईरान को दूसरे देशों के निर्यात को रोकने की अपनी धमकी को लागू करने में गंभीर संकट का सामना करना पड़ा है.

अमेरिका और क्षेत्रीय देश असुरक्षा के बावजूद व्यापार के एक हिस्से को जारी रखने में सफल रहे हैं.

हालांकि, पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात और युद्ध से पहले के स्तर के बीच अंतर और आयात की स्थिति को लेकर अनिश्चितता दिखाती है कि यह सुधार होर्मुज़ की सभी व्यापारिक गतिविधियों तक नहीं पहुंचा है.

ईरान के दबाव के साधन के कमजोर पड़ने का निष्कर्ष निकालने के लिए यह देखना होगा कि ये आवाजाही किस लागत और किस तरह के समर्थन के साथ कितने समय तक जारी रहती है.

इन आवाजाही को जारी रखना सैन्य समर्थन और अतिरिक्त लागत को स्वीकार करने पर निर्भर है.

उपलब्ध आंकड़े इन लागतों को कितने समय तक या किस सीमा तक सहन किया जा सकता है, इसका सटीक आकलन नहीं दे सकते.

इसके अलावा, कच्चे तेल के निर्यात में बढ़ोतरी भी ईरान की दबाव बनाने की क्षमता के खत्म होने की घोषणा के लिए पर्याप्त नहीं है.

इस दबाव का एक हिस्सा उस लागत में बना रह सकता है, जिसे दूसरे पक्ष की सरकारें व्यापार जारी रखने के लिए चुका रही हैं. लेकिन क्या यह लागत अंततः उनके राजनीतिक फैसले को प्रभावित करेगी या नहीं, इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है.

तेल की कीमत अभी तक क्यों नहीं गिरी?

बाज़ार फ़िलहाल हालात को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है जिससे तेल की कीमतें स्थिर नहीं हो रही हैं

हालांकि केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक़ कच्चे तेल का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर पर लौट आया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाज़ार भी सामान्य स्थिति में लौट आया है.

पहली बात यह है कि बाज़ार को अभी इस स्थिति के टिकाऊ होने का भरोसा नहीं है. जून और जुलाई के युद्धविराम के दौरान, जब निर्यात सामान्य स्तर के करीब पहुंच गया था, ब्रेंट तेल की कीमत क़रीब 70 डॉलर तक गिर गई थी.

लेकिन इस बार समान मात्रा में निर्यात के बावजूद कीमत ऊंची बनी हुई है. यह संकेत है कि संघर्ष दोबारा शुरू होने और आपूर्ति में फिर से बाधा आने का जोखिम अब भी बाज़ार में गंभीरता से लिया जा रहा है.

दूसरा कारण भंडार में भारी गिरावट है. युद्ध शुरू होने के बाद से दुनिया के तेल भंडार से 50 करोड़ से ज्यादा बैरल तेल इस्तेमाल किया जा चुका है और इसी दौरान चीन की ख़रीद भी फिर बढ़ी है. इसकी वजह से बाज़ार के पास सुरक्षा का मार्जिन कम हुआ है.

तीसरा, डीज़ल और जेट ईंधन जैसे पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात अब भी सामान्य स्तर से काफी नीचे है. यानी सिर्फ कच्चे तेल के निर्यात की वापसी का मतलब पूरी आपूर्ति श्रृंखला का सामान्य होना नहीं है.

और चौथा, यह निर्यात ज्यादा लागत और जटिलता के साथ जारी है. इसमें तेल टैंकरों का ऊंचा किराया, एक जहाज से दूसरे जहाज़ में तेल का ट्रांसफ़र, वैकल्पिक मार्ग और सुरक्षा उपाय शामिल हैं.

इसलिए, होर्मुज़ स्ट्रेट से तेल टैंकरों की आवाजाही बढ़ना अकेले तेल की कीमत कम करने के लिए पर्याप्त नहीं है. बाज़ार अब भी दोबारा आपूर्ति बाधित होने के जोखिम, कम होते भंडार और तेल के परिवहन की ऊंची लागत को कीमतों में शामिल कर रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS