Home BUSINESS NEWS HINDI ईरान युद्ध से सबक: मोदी सरकार के मास्टर प्लान से नहीं होगी...

ईरान युद्ध से सबक: मोदी सरकार के मास्टर प्लान से नहीं होगी पेट्रोल, डीजल और गैस की किल्लत!

5
0

Source :- LIVE HINDUSTAN

ईरान युद्ध से देश में उपजे पेट्रोल-डीजल और गैस की किल्लत से बचने के लिए मोदी सरकार एक मास्टर प्लान पर काम कर रही है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार अब कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की स्ट्रेटजिक रिजर्व क्षमता बनाने की योजना पर काम कर रही है। यह इतनी बड़ी होगी कि देश की एक महीने की घरेलू मांग को पूरा कर सके। इस कदम का मकसद फारस की खाड़ी में युद्ध जैसी स्थितियों से पैदा होने वाली सप्लाई संकट से बचना है।

रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसके लिए एक समिति गठित की है, जो संभावित स्थानों, ऑपरेटिंग मॉडलों और ओवर ग्राउंड और अंडर ग्राउंड स्टोरेज के बीच विभाजन जैसे डिटेल्स की स्टडी करेगी। यह जानकारी मामले से परिचित लोगों ने दी है, हालांकि चर्चा सार्वजनिक नहीं होने के कारण उन्होंने नाम न छापने की शर्त रखी है।

ईरान युद्ध का सबसे अधिक असर भारत पर

दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश पर अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद सबसे अधिक असर पड़ा है, खासकर जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग पूरी तरह बंद हो गया था। इस संकट ने मीडिल ईस्ट से ऊर्जा आयात पर भारी निर्भरता की कलई खोल दी और साथ ही यह भी दिखा कि मौजूदा भंडार कितने सीमित थे, जिन्हें बफर के रूप में काम करना चाहिए था। हालांकि, पेट्रोलियम मंत्रालय ने इस योजना पर ब्लूमबर्ग के पूछे गए सवालों का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।

कितने दिन का बचा है कच्चा तेल

फिलहाल भारत के पास करीब 39 मिलियन बैरल का स्ट्रेटजिक क्रूड ऑयल रिजर्व है, जो लगभग आठ दिनों के आयात के बराबर है। यह एशिया की दूसरी बड़ी ऊर्जा खपत वाली ताकत चीन के मुकाबले बहुत कम है, हालांकि रिफाइनरियों और रिटेलर्स के पास मौजूद इन्वेंट्री मिलकर 70 दिनों से अधिक की तेल मांग को पूरा कर सकती है।

120 मिलियन बैरल भंडारण क्षमता हासिल करना लक्ष्य

स्ट्रेटजिक रिजर्व की क्षमता को पहले से ही बढ़ाया जा रहा है। देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर भूमिगत गुफाओं के माध्यम से यह क्षमता मौजूदा भंडार से दोगुनी से अधिक हो जाएगी, और यह काम करीब पांच साल में पूरा होने की उम्मीद है। अंतिम लक्ष्य कम से कम 120 मिलियन बैरल भंडारण क्षमता हासिल करना है।

एलपीजी और एलएनजी का भंडार लगभग न के बराबर

हालांकि, एलपीजी और एलएनजी का भंडार लगभग न के बराबर है, क्योंकि दोनों को संग्रहित करना मुश्किल होता है। एलपीजी को दबाव में लिक्विड के रूप में रखा जाता है, जबकि एलएनजी को बहुत ही अधिक ठंडे तापमान पर रखना पड़ता है। दोनों के लिए रिसाव या विस्फोट से बचने के लिए सख्त सुरक्षा नियमों की जरूरत होती है।

पूरे देश की खपत के करीब दो दिनों के बराबर LPG

बेंगलुरू स्थित थिंक-टैंक तक्षशिला संस्थान के अनुसार, भारत की लंबी अवधि के एलपीजी भंडारण क्षमता मात्र 1,40,000 टन है, जो मुख्यतः पूर्वी और पश्चिमी तटों पर भूमिगत चट्टानी गुफाओं में है और यह पूरे देश की खपत के करीब दो दिनों के बराबर ही है।

हालांकि रिफाइनरियां और आयात टर्मिनल अतिरिक्त इन्वेंट्री रखते हैं, लेकिन भंडारण की जटिलता और लागत के कारण भारत ने अब तक निरंतर आयात और वितरण पर ही निर्भर रहना पसंद किया है।

एलपीजी भंडार बढ़ाने पर काम करने का निर्देश

सूत्रों के अनुसार, पेट्रोलियम मंत्रालय ने राज्य के स्वामित्व वाली तेल रिफाइनरियों को इमरजेंसी के लिए एलपीजी भंडार बढ़ाने पर काम करने का निर्देश दिया है। गैस के मामले में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि फिलहाल कोई स्ट्रेटजिक रिजर्व मौजूद नहीं है। पिछले साल सरकार ने एक मसौदा नीति पेश की थी।

इसमें टर्मिनल ऑपरेटरों को अपनी सामान्य ऑपरेशनल जरूरताें से 10 प्रतिशत अधिक एलएनजी भंडारण क्षमता बनाए रखने के लिए कहा गया था, और इस अतिरिक्त मात्रा को जरूरत पड़ने पर सरकार अपने कब्जे में ले सकती है। पेट्रोनेट एलएनजी जैसे एलएनजी आयातक पहले से ही नए भंडारण टैंक जोड़ रहे हैं।

ईरान संकट के चरम पर भारत को डीजल, एलपीजी और गैस की सप्लाई में राशनिंग करनी पड़ी थी, और उसने कमी को पूरा करने के लिए जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अन्य एशियाई खरीदारों से मदद मांगी थी, जिनके पास एलपीजी और एलएनजी का भंडार है।

सिंगापुर, ताइवान और पाकिस्तान भी आगे बढ़ रहे

भविष्य के झटकों से बचाने के लिए अपना सुरक्षा जाल बनाने का यह अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी प्रयास है। इस दिशा में सिंगापुर, ताइवान और पाकिस्तान भी आगे बढ़ रहे हैं, जो ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए अपने भंडारण को बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।

जापान और भारत एलएनजी भंडार पर सहयोग पर भी विचार कर रहे हैं, जैसा कि जापान टाइम्स ने रविवार को अज्ञात स्रोतों के हवाले से बताया। जापानी प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सप्ताह नई दिल्ली में होने वाली वार्ता के दौरान इस पर एक समझौता कर सकते हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN