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कम उम्र में भी हो सकता है हार्ट अटैक, 40 से पहले किन बातों पर ध्यान देना ज़रूरी

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Source :- BBC INDIA

हार्ट हेल्थ

क्या हृदय रोग ज्यादा उम्र में होता है. क्या ये युवाओं की समस्या नहीं है? कई लोगों के मन में इस तरह के सवाल उठते हैं.

अक्सर 20-30 साल के युवा सोचते हैं कि उन्हें इसका ख़तरा नहीं है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में युवाओं और मझोली उम्र के लोगों में हार्ट अटैक के मामले बढ़ते दिखे हैं.

हार्ट अटैक के लिए हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, डायबिटीज, धूम्रपान, नींद की कमी, लगातार मानसिक तनाव और कम शारीरिक गतिविधि जैसी वजहें जिम्मेदार हो सकती हैं.

अगर कम उम्र में ही ये समस्याएं जीवन का हिस्सा बन जाएं तो आगे चलकर ये कई बीमारियों की वजह बन सकती हैं. साथ ही, यह जोखिम बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी शरीर में बढ़ सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि हृदय रोग होने की वजहों पर पहले से ध्यान देना जरूरी है.

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के मुताबिक़, हृदय रोग का जोख़िम बढ़ाने वाली वजहों को जल्दी पहचानने के लिए नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की जांच अहम है.

हमारी जीवनशैली में आ रहे बदलाव की वजह से भी हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं.

वर्ल्ड हार्ट डे के मौके पर जानते हैं कि 40 साल की उम्र से पहले किन लोगों को हार्ट चेक-अप की जरूरत होती है. कौन सी जांच सही में उपयोगी है और किन लक्षणों को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.

क्या सभी को ईसीजी कराना चाहिए?

हार्ट अटैक

बिना किसी लक्षण और खास हृदय रोग के जोखिम वाले हर युवा को नियमित रूप से ईसीजी यानी इकोकार्डियोग्राफी कराने की जरूरत नहीं होती.

अगर सीने में दर्द, दिल की धड़कन तेज होना, बेहोशी, सांस फूलना या डॉक्टर को जांच के दौरान कोई संदिग्ध लक्षण दिखाई दे, तो इन जांचों की जरूरत पड़ सकती है.

हृदय रोग का जोखिम पता लगाने के लिए कई तरह की जांच होती. लेकिन हर व्यक्ति को सभी जांच कराने की जरूरत नहीं होती.

विशेषज्ञों के मुताबिक़, 30-40 साल की उम्र के ज्यादातर स्वस्थ लोगों के लिए नियमित ब्लड प्रेशर जांच, ब्लड शुगर टेस्ट और लिपिड प्रोफाइल जैसी बुनियादी जांच ज्यादा उपयोगी हो सकती हैं.

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजिज कंट्रोल एंज प्रिव्हेंशन (सीडीसी) का कहना है कि हार्ट अटैक के जोख़िम को समझने के लिए कोलेस्ट्रॉल की जांच अहम है.

हालांकि जोख़िम ज्यादा होने पर एचबी1एसी, लिपोप्रोटीन (ए) यानी एलपीए और कुछ मामलों में एपीओबी जैसी जांचों पर भी विचार किया जा सकता है.

हाल की लिपिड मैनेजमेंट गाइडलाइंस में एलपीए जैसे मार्कर पर भी ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है.

डॉ. लक्ष्मण गायकवाड ने बीबीसी मराठी को इस बारे में विस्तार से बताया है. वह एम्स हॉस्पिटल, डोंबिवली में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट हैं.

उन्होंने कहा, “काम का तनाव, व्यायाम की कमी, बढ़ता वजन, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की समस्याएं अब कम उम्र में दिखाई देने लगी हैं. कई बार शुरुआत में इनके कोई लक्षण नहीं होते. इसलिए कम उम्र से ही हार्ट हेल्थ पर ध्यान देना जरूरी है.”

20 से 30 साल की उम्र में कैसा ख़तरा हो सकता है

विशेषज्ञों का कहना है कि हृदय रोग से बचाव के लिए कम उम्र से ही प्रयास शुरू करना जरूरी है

हाई ब्लड प्रेशर, एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना, डायबिटीज या इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक गतिविधि की कमी की वजह से कम उम्र में हृ़दय रोग के लक्षण दिख सकते हैं. इसके साथ ही असंतुलित आहार, पर्याप्त नींद न लेना और लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव भी कम उम्र ख़राब हृदय स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार हो सकता है.

कुछ लोगों में आनुवंशिक कारणों से भी कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत बढ़ा हुआ हो सकता है.

हमने डॉ. गायकवाड से पूछा कि ऐसे में ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की जांच किस उम्र से शुरू करनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “ब्लड प्रेशर की जांच हर वयस्क व्यक्ति की नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा होना चाहिए. कोलेस्ट्रॉल की जांच भी वयस्क उम्र में शुरू की जा सकती है और इसके बाद कितनी बार जांच करानी है, यह व्यक्ति के जोखिम पर निर्भर करता है. अगर परिवार में कम उम्र में हृदय रोग या बहुत ज्यादा कोलेस्ट्रॉल की समस्या रही है तो नियमित जांच की जरूरत होती है.”

परिवार में हृदय रोग का इतिहास हो तो क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

हार्ट अटैक

डॉ. लक्ष्मण गायकवाड कहते हैं, “परिवार में हृदय रोग का इतिहास एक अहम वजह हो सकता है. अगर किसी व्यक्ति के माता-पिता या परिवार के किसी अन्य सदस्य को कम उम्र में हृदय रोग या हार्ट अटैक हुआ है तो उस व्यक्ति में भी जोखिम ज्यादा हो सकता है. ऐसी स्थिति में ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और जोखिम बढ़ाने वाले कारणों की जांच जल्दी करानी चाहिए.कुछ मामलों में आनुवंशिक रूप से होने वाले कोलेस्ट्रॉल संबंधी गड़बड़ियों की जांच भी जरूरी हो सकती है.”

वह कहते हैं, “40 साल की उम्र से पहले ही अगर सीने में भारीपन या दर्द हो, ख़ासकर दर्द हाथ, कंधे, पीठ, गर्दन या जबड़े तक फैल रहा हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अचानक सांस फूलना, पसीना आना, चक्कर आना या बेहोशी, सीने में धड़कन महसूस होना जैसे लक्षण भी अहम हैं. ऐसे लक्षण अचानक शुरू हों तो तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए.”

डॉ. गायकवाड़ कहते हैं, ” यह गलत धारणा है कि 40 साल की उम्र से पहले हृदय रोग का ख़तरा नहीं होता. हर युवा को हृदय की विशेष जांच कराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन कम उम्र से ही ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर, वजन और जीवनशैली पर ध्यान देने से भविष्य में हृदय रोग के जोखिम को पहचानने और उसे कम करने में मदद मिल सकती है.”

कम उम्र में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कितना गंभीर

40 साल की उम्र से पहले ही बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल खतरे की घंटी हो सकता है

जिन लोगों में हार्ट अटैक का जोख़िम बढ़ाने वाली वजह पहले से मौजूद हैं, उन्हें जांच के लिए 40 साल की उम्र तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है.

इसमें अधिक वजन या मोटापे वाले लोग, हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज वाले लोग, धूम्रपान करने वाले, किडनी की बीमारी वाले और कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी गंभीर समस्या वाले लोग शामिल हैं.

परिवार में कम उम्र में हृदय रोग होने का इतिहास भी जांच जल्दी शुरू करने की एक अहम वजह है. ऐसे लोगों को किसी ख़ास उम्र का इंतजार करने के बजाय जोख़िम बढ़ाने वाली वजहों की जल्दी पहचान कर हालात संभालने पर ध्यान देना चाहिए.

एलपी(ए) या लीपोप्रोटीन (ए) आनुवंशिकता से जुड़ा हृदय रोग का जोखिम बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. इसका स्तर मुख्य रूप से जीवनशैली के बजाय आनुवंशिकता पर निर्भर करता है.

ख़ासकर परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास होने पर वयस्कों को जीवन में कम से कम एक बार एलपी(ए) की जांच कराने पर विचार करना चाहिए. इससे हृदय रोग के जोखिम को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है.

ख़राब जीवनशैली

40 साल की उम्र से पहले ही बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल खतरे की घंटी हो सकता है.

इस बारे में डॉ. वैभव देढिया ने बीबीसी मराठी को कई अहम बातें बताई. वो मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट हैं.

उन्होंने कहा, “कोलेस्ट्रॉल का आकलन करते समय ये जानना जरूरी है कि उसका स्तर क्या है और ये कितने समय से बढ़ा हुआ है.एलडीएल कोलेस्ट्रॉल में मामूली बढ़ोतरी भी अगर कई वर्षों तक बनी रहे तो इस पर ध्यान देना जरूरी है. इसलिए कोई व्यक्ति युवा है, इस वजह से बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.”

डॉ. वैभव देढिया कहते हैं, “अगर एलडीएल का स्तर 190 एमजी/डीएल या उससे ज्यादा है तो इस पर विशेष ध्यान देना जरूरी है.

ऐसे मामलों में फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रॉलेमिया जैसी आनुवंशिक स्थिति की संभावना पर विचार करना पड़ता है. कुल मिलाकर, अगर कोलेस्ट्रॉल लगातार बढ़ा हुआ है तो मिड एज में आने का इंतज़ार करने के बजाय जल्द कदम उठाना चाहिए.

अच्छी सेहत के लिए नियमित कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग जरूरी है

20 और 30 की उम्र में जीवनशैली में बदलाव क्या भविष्य में हृदय रोग का जोखिम कम कर सकता है

युवा होने का मतलब ये नहीं है कि आपका हृदय स्वस्थ ही होगा

20 और 30 की उम्र में जीवनशैली में बदलाव किए जाएं तो क्या भविष्य में हृदय रोग का जोखिम कम हो सकता है?

डॉ. वैभव देढिया के मुताबिक़ ” हृदय रोग से बचाव की कोशिश लंबे समय तक और लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. 20 और 30 की उम्र में बनी आदतों और इनसे पैदा होने वाले जोखिम का असर अगले कई दशकों तक हो सकता है. जितनी जल्दी हम वजन, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर को नियंत्रण में रखते हैं और तंबाकू से दूर रहते हैं, उतना ही ज्यादा फायदा जीवनभर मिल सकता है.”

उन्होंने कहा, ” ऐसा नहीं है कि बचाव की शुरुआत बीमारी के लक्षण दिखाई देने या 40-50 साल की उम्र होने के बाद ही करनी चाहिए. जितनी जल्दी ये बदलाव किए जाएंगे, लंबे समय में जोखिम कम करने का मौका उतना ही ज्यादा होगा.

क्या हृदय को स्वस्थ रखने के लिए कितना व्यायाम जरूरी है. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कितनी अहम है

इस सवाल पर वो कहते हैं, ” हर सप्ताह 150 से 300 मिनट तक मिड पेस वाला एरोबिक एक्सरसाइज करना एक अच्छा लक्ष्य माना जा सकता है. इसमें तेज चलना, साइकिल चलाना या नियमित रूप से किए जा सकने वाले दूसरे एरोबिक व्यायाम शामिल हैं.”

”इसके साथ सप्ताह में कम से कम दो बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना भी अहम है. हार्ट की सेहत केवल कार्डियो एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं करती. मांसपेशियों की ताक़त बनाए रखना और रोजमर्रा की जिंदगी में सक्रिय रहना भी उतना ही जरूरी है. कभी-कभार ज्यादा व्यायाम करने के बजाय नियमितता ज्यादा अहम है.”

नींद, तनाव और लगातार बैठे रहने का युवाओं हार्ट पर क्या असर पड़ता है?

डॉ. वैभव ने कहा, ” पर्याप्त नींद न लेना और लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर की मेटाबॉलिक हेल्थ पर नकारात्मक असर डाल सकता है. ये हृदय रोग का जोखिम बढ़ा सकता है. लगातार बैठे रहना भी एक जोखिम है, ख़ासकर उन लोगों के लिए जो दिन का काफी समय डेस्क पर काम करते हुए बिताते हैं.

”इसलिए सिर्फ दिन में एक बार व्यायाम करना ही पर्याप्त नहीं है. पूरे दिन सक्रिय रहना, लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचना, पर्याप्त नींद लेना और तनाव को नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी है.”

40 साल से कम उम्र के लोगों में हृदय रोग को लेकर कौन-सी गलत धारणाएं हैं?

डॉ. वैभव देढिया कहते हैं, ”सबसे बड़ी गलत धारणा यह है कि युवा होने का मतलब है कि हृदय स्वस्थ ही होगा. इसी तरह यह मानना भी गलत है कि कोई व्यक्ति दुबला-पतला है तो उसे हृदय रोग का ख़तरा नहीं है.”

डॉ. वैभव कहते हैं, ” हार्ट हेल्थ का ध्यान रखना जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है. हृदय रोग का जोखिम बढ़ाने वाले कई कारक कई वर्षों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ते रह सकते हैं. इसलिए किसी खास उम्र या लक्षण का इंतजार किए बिना ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर, जीवनशैली और परिवार के मेडिकल इतिहास पर ध्यान देना जरूरी है.”

हृदय को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

दिन में एक बार एक घंटे व्यायाम कर लेने का मतलब यह नहीं है कि हम पूरी तरह सुरक्षित हैं. पूरे दिन बैठे रहना ठीक नहीं है. लगातार सक्रिय रहना जरूरी है.

  • अपना ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर का स्तर जानें.
  • धूम्रपान न करें.
  • नियमित व्यायाम करें.
  • वजन स्वस्थ सीमा में रखें.
  • हृदय के लिए फायदेमंद संतुलित आहार लें.

युवा हैं, इसलिए सीने में असहजता, सांस फूलना, बेहोशी या दिल की धड़कन तेज होने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें.

जीवनशैली में कोई महत्वपूर्ण बदलाव करना हो, आहार में बदलाव करना हो, दवा लेनी हो या शारीरिक व्यायाम शुरू करना हो, तो डॉक्टर और योग्य प्रशिक्षक की मदद लेना जरूरी है.

अपने शरीर और लक्षणों की उचित जांच डॉक्टर से कराएं और उनकी सलाह के अनुसार ही जीवनशैली में बदलाव करें. डॉक्टर को दिखाए बिना खुद इलाज करना ख़तरनाक हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS