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कहीं आप खाना ग़लत टाइम पर तो नहीं खाते, क्या है भोजन करने का सही समय?

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Source :- BBC INDIA

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आपकी सेहत पर सिर्फ़ इस बात का असर नहीं पड़ता कि आप क्या खाते हैं. खाना पचाने और शरीर में उसके इस्तेमाल के तरीके में आपकी बॉडी क्लॉक भी अहम भूमिका निभाती है.

जब मैंने अपने स्पेनिश दोस्त और सहकर्मी जेवियर हिर्शफ़ेल्ड से पूछा कि उनके देश में आम तौर पर खाने का क्या तरीक़ा होता है, तो उन्होंने मुझसे कहा, “नाश्ता राजा की तरह, दोपहर का खाना राजकुमार की तरह और रात का खाना ग़रीब की तरह खाइए.”

बचपन से ही उन्हें यह कहावत सुनाई जाती रही है.

वह कहते हैं, “स्पेन में कुछ लोग डिनर बिल्कुल नहीं खाते. अधिकतर लोग फिर फल और दही ही खाते हैं.”

ब्रिटेन और अमेरिका में आम तौर पर दोपहर का खाना हल्का होता है. इसके बाद शाम को ज़्यादा खाना खाया जाता है. लेकिन स्पेन का ट्रेंड इसका उल्टा है.

इसके लिए एक वैज्ञानिक टर्म यूज़ किया जाता है जिसे क्रोनोन्यूट्रिशन कहा जाता है.

इसके मुताबिक, स्वस्थ खाने का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि हम क्या खाते हैं. यह भी मायने रखता है कि हम इसे कब खाते हैं.

ऐसा क्यों होता है? और इसका फ़ायदा उठाने के लिए हमें अपने खाने का समय कैसे तय करना चाहिए? आइए जानते हैं.

अपने बॉडी क्लॉक के हिसाब से खाने का सही समय तय करें

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स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ मर्सिया की मार्ता गाराउलेट की दिलचस्पी खाने के समय के असर में तब बढ़ी, जब उन्होंने अपने वज़न कम करने वाले क्लिनिक में कुछ लोगों पर ध्यान दिया.

एक दशक से भी ज़्यादा समय पहले उन्होंने दो मरीज़ों को देखा, जिनमें एक के वज़न में ज़्यादा कमी आई. जबकि दोनों एक ही घर में रहती थीं और बिल्कुल एक जैसा खाना खाती थीं.

दोनों में से एक दोपहर का खाना करीब एक बजे खाती थी. वहीं, दूसरी महिला अपनी क्लास के समय की वजह से बाद में ही खाना खा पाती थी.

गाराउलेट कहती हैं, “बस यही एक अंतर था.”

छह हफ़्तों बाद पहले खाना खाने वाली छात्रा का वज़न काफ़ी ज़्यादा कम हुआ था. इसके बाद उन्होंने यह जानने की कोशिश शुरू की कि क्या खाना खाने का समय वज़न कम करने में बहुत बड़ा असर डाल सकता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मर्सिया के अपने सहयोगियों के साथ गाराउलेट ने स्पेन के 420 वयस्कों पर नज़र रखी. ये सभी 20 हफ़्तों तक चले एक ही वज़न कम करने वाले कार्यक्रम में शामिल थे. इसमें पाया गया कि जो लोग दोपहर का खाना पहले खाते थे, उनका वज़न बाद में खाना खाने वालों की तुलना में ज़्यादा और तेज़ी से कम हुआ.

इसी तरह, एक छोटे रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल में 32 स्वस्थ महिलाओं ने दो हफ़्तों तक एक जैसा खाना खाया.

जिन महिलाओं ने दोपहर का खाना देर से खाया, उनके ब्लड शुगर को नियंत्रित करने की क्षमता कमज़ोर रही. उन्होंने कार्बोहाइड्रेट भी कम मात्रा में जलाए. इसके बाद हुए कई अध्ययनों में पाया गया है कि हमारी सर्केडियन रिदम यानी शरीर की जैविक घड़ी (बायोलॉजिकल क्लॉक) हमारी भूख, पाचन और मेटाबॉलिज़्म को प्रभावित करती है.

लेकिन एक ही खाना दिन के अलग-अलग समय पर खाने से इतना बड़ा असर क्यों पड़ता है?

जब मैंने यह सवाल बोस्टन स्थित ब्रिगम एंड विमेन्स हॉस्पिटल के मेडिसिन प्रोफ़ेसर और न्यूरोसाइंटिस्ट फ़्रैंक शीर से पूछा, तो उन्होंने कहा कि इसकी वजह यह है “जैविक नज़रिए से हम सुबह और शाम एक जैसे नहीं होते.”

उनके मुताबिक, हमारी आंतरिक बॉडी क्लॉक शरीर के लगभग सभी कामों को नियंत्रित करती है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि जब हमारी बॉडी क्लॉक के मुताबिक सोने का समय हो चुका हो, तब खाना खाने से शरीर के अंदर एक तरह का असंतुलन पैदा हो सकता है.

इसे “सर्केडियन मिसअलाइनमेंट” कहा जाता है.

इसका एक उदाहरण यह है कि हमारा शरीर ब्लड शुगर को किस तरह नियंत्रित करता है.

2022 में 800 से ज़्यादा वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हर व्यक्ति को ग्लूकोज़ वाला एक ड्रिंक दिया.

इसमें उतने ही कार्बोहाइड्रेट थे, जितने आम तौर पर शाम के खाने में होते हैं.

शोधकर्ताओं ने पाया कि जब लोगों ने यह ड्रिंक सोने से चार घंटे पहले पीने के बजाय सोने से एक घंटे पहले पिया, तो उनके शरीर ने इसे कम प्रभावी ढंग से प्रोसेस किया.

सोने के समय के क़रीब यह पेय पीने वाले लोगों का ब्लड शुगर ज़्यादा था. उनके शरीर ने इंसुलिन भी कम बनाया. इंसुलिन एक ऐसा हार्मोन है, जो हमारे ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस प्रक्रिया में मेलाटोनिन की अहम भूमिका होती है. शरीर के सोने की तैयारी करने के साथ मेलाटोनिन का स्तर बढ़ता है.

इस अध्ययन में शामिल रहे शीर कहते हैं, “अगर आप शाम को उस समय खाना खाते हैं, जब मेलाटोनिन का स्तर बढ़ा हुआ होता है, तो आपका ग्लूकोज़ नियंत्रण प्रभावित होगा.”

MTNR1B जीन के एक आम वैरिएंट वाले लोगों में यह असर और भी ज़्यादा था. इस वैरिएंट को टाइप 2 डायबिटीज़ के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है. इसलिए, लंबे समय तक देर से खाना खाने से इस बीमारी के होने का जोखिम बढ़ सकता है. दुनियाभर में टाइप 2 डायबिटीज़ के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

कम भूख लगे, इसके लिए जल्दी खाएं

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देर से खाना खाने का असर सिर्फ़ ब्लड शुगर को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है. शोध से पता चला है कि देर से खाना खाने वाले लोगों को अगले दिन ज़्यादा भूख लग सकती है.

ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि देर से खाना खाने से भूख और पेट भरे होने का एहसास कराने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं. देर से खाना खाने वाले लोगों के शरीर में लेप्टिन हार्मोन कम बनता है. यह हार्मोन हमारे दिमाग को बताता है कि हमारा पेट भर गया है.

इसके साथ ही, खाने का समय इस बात को भी प्रभावित करता है कि हमारा शरीर चर्बी को किस तरह जमा करता है. देर से खाना खाने पर शरीर चर्बी को तोड़ने के बजाय उसे कोशिकाओं में जमा कर सकता है. समय के साथ इससे शरीर के लिए स्वस्थ वज़न बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.

इसलिए उन लोगों के लिए खाने का समय ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है, जिनमें ऐसे आनुवंशिक बदलाव होते हैं, जिनकी वजह से उनका वज़न बढ़ने की संभावना ज़्यादा होती है.

करीब 1,200 वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने पाया कि मोटापे के ज़्यादा जोखिम वाले लोगों में देर से खाना खाने का संबंध ज़्यादा बॉडी मास इंडेक्स से था. वहीं, जल्दी खाना खाने से यह जोखिम कम हुआ.

दिल की बेहतर सेहत के लिए भरपेट नाश्ता करें

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जल्दी खाना खाने से दिल की सेहत को भी फ़ायदा हो सकता है.

फ़्रांस में एक लाख से ज़्यादा लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जो लोग देर से नाश्ता करते थे, उनमें हृदय रोग का जोखिम ज़्यादा था.

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि रात में जल्दी खाना खाने दिल की सेहत को बेहतर करने में मदद करता है.

स्टडी में ये भी पाया गया कि ओवरनाइट फ़ास्टिंग के बेस्ट रिजल्ट तब आते हैं जब रात में जल्दी खाना खा लिया जाए और फिर ब्रेकफ़ास्ट भी वक़्त पर कर लिया जाए.

जो लोग इंटरमीडिएट फ़ास्टिंग करने के लिए डिनर जल्दी और अगले दिन ब्रेकफास्ट देर से करते हैं उनकी सेहत को नुक़सान पहुंच सकता है.

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह उन लोगों के लिए ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है जो शिफ़्ट में काम करते हैं.

यह उन दूसरे लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है, जिनकी बॉडी क्लॉक प्रभावित होती है. जो लोग रात में काम करते हैं, उन्हें जहां तक संभव हो, दिन के समय ही खाना खाने की सलाह दी जाती है. हालांकि, यह हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता. उदाहरण के लिए, स्वास्थ्यकर्मियों को अपनी ऊर्जा बनाए रखने के लिए रात में खाना पड़ सकता है.

बेशक, हम कब खाना खाते हैं, यह पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं होता. कुछ लोग सुबह जल्दी उठने वाले यानी ‘लार्क’ होते हैं, जबकि कुछ लोग देर रात तक जागने वाले यानी ‘आउल’ होते हैं. इसका असर हमारे खाना खाने के समय पर भी पड़ता है.

इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ़ नेपल्स फेडेरिको की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जियोवाना मुस्कोगिउरी कहती हैं कि सुबह जल्दी सक्रिय रहने वाले लोगों के कम कैलोरी वाली डाइट अपनाने की ज़्यादा संभावना होती है. वहीं, देर रात तक सक्रिय रहने वाले लोग खाना देर से खाते हैं और रात में ज़्यादा कैलोरी वाला खाना खाने की संभावना भी उनमें ज़्यादा होती है.

ख़ास बात यह है कि हमारा शारीरिक रूप से एक्टिव रहने का टाइम इस बात को भी प्रभावित करता है कि हमारा शरीर खाने पर किस तरह प्रतिक्रिया करता है. सुबह जल्दी सक्रिय रहने वाले लोगों में इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता का स्तर जल्दी चरम पर पहुंचता है. उनके शरीर में मेलाटोनिन भी जल्दी बनता है. इसके उलट, देर रात तक सक्रिय रहने वाले लोग देर से खाना खाते हैं. इसलिए उनमें ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में दिक़्क़त और वज़न बढ़ने का जोखिम ज़्यादा हो सकता है.

इसलिए मुस्कोगिउरी का कहना है कि हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम ‘लार्क’ हैं या ‘आउल’. उनका कहना है कि देर से खाना खाने वाले लोग धीरे-धीरे शाम का खाना पहले खाने की आदत डालें तो उन्हें फ़ायदा हो सकता है.

हमें अपनी नींद की अवधि और उसकी क्वालिटी पर भी ध्यान देना चाहिए. इसका असर हमारी भूख और खाने की इच्छा पर पड़ता है. मुस्कोगिउरी के मुताबिक, अगर हम पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं, तो ज़्यादा खाने और ज़्यादा कैलोरी वाला खाना चुनने की संभावना बढ़ जाती है. समय के साथ इससे वज़न बढ़ सकता है.

बेहतर तरीके से कैसे खाएं

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इसका व्यावहारिक तरीक़ा काफ़ी आसान है. कोशिश करें कि रोज़ एक तय समय पर खाना खाएं.

दिन में पहले के समय ऐसे कार्बोहाइड्रेट खाएं, जिनमें फ़ाइबर ज़्यादा हो.

इनमें साबुत अनाज, फलियां जैसे बीन्स, मटर और दालें, और फल शामिल हैं. इस समय हमारा शरीर इन्हें बेहतर तरीके से प्रोसेस कर सकता है.

शाम को हल्का खाना खाएं. कोशिश करें कि इसमें प्रोटीन की मात्रा अच्छी हो.

मुस्कोगिउरी ने हाल में प्रकाशित एक समीक्षा में यह भी सलाह दी है कि शाम के खाने में ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जाएं, जो नींद को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं.

इनमें नट्स और बीज शामिल हैं. इसके अलावा ट्रिप्टोफ़ैन से भरपूर प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ भी लिए जा सकते हैं. इनमें चिकन, साल्मन और टूना शामिल हैं. ट्रिप्टोफ़ैन नींद की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद करता है.

तो रात का खाना खाने का सबसे अच्छा समय क्या है?

दरअसल, इसका कोई एक तय समय नहीं है. लेकिन बेहतर होगा कि दिन का सबसे अहम खाना (लंच) पहले खाया जाए. रात का खाना सोने से कम से कम तीन घंटे पहले खा लेना चाहिए.

* मेलिसा होगेनबूम बीबीसी की सीनियर हेल्थ कॉरेस्पॉन्डेंट और ‘ब्रेडविनर्स’ और ‘द मदरहुड कॉम्प्लेक्स’ की लेखिका हैं. वह इंस्टाग्राम पर melissa_hogenboom नाम से हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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