प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 2026 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में “दिमागी नक्सल” की अवधारणा पर ध्यान आकर्षित किया, जिसके बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस शब्द का अर्थ स्पष्ट किया—और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इसे अपनाया।
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## “दिमागी नक्सल” पर PM Modi ने क्या कहा
80वें स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान PM Modi ने सशस्त्र माओवादी विद्रोहियों को उखाड़ फेंकने के लिए भारत को बधाई दी। उन्होंने कहा, “वर्षों तक माओवादी सोच रखने वाले लोग सार्वजनिक जीवन में, यहां तक कि सरकारी समितियों में भी मौजूद रहे; इस सोच ने विभिन्न संस्थानों और पहलों को प्रभावित किया।”
उन्होंने स्पष्ट अंतर बताया: जहां “हथियारबंद नक्सल”—सशस्त्र विद्रोही—काफी हद तक समाप्त कर दिए गए हैं, वहीं अभी भी “दिमागी नक्सल” मौजूद हैं। उनके अनुसार, ये माओवादी विचारधारा वाले लोग हिंसा फैलाने और देश की आगे बढ़ने की यात्रा को पटरी से उतारने के अवसर तलाश रहे हैं। उन्होंने इन वैचारिक खतरों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान किया।
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## किरेन रिजिजू ने शब्द का अर्थ स्पष्ट किया
विपक्षी दलों की आलोचना के बाद, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने X (पूर्व में Twitter) पर एक पोस्ट के जरिए स्पष्ट किया कि “दिमागी नक्सल” शब्द किसी विशिष्ट राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के लिए नहीं था।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह परिभाषा केवल उन लोगों पर लागू होती है, जो:
– भारतीय संविधान को अस्वीकार करते हुए माओवादियों का समर्थन करते हैं
– अलगाववादी आंदोलनों के साथ खड़े होते हैं और Article 370 को बहाल करने की वकालत करते हैं
– भारत के पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से अलग करना चाहते हैं और “Chicken’s Neck” गलियारे को विभाजित करने की वकालत करते हैं—यह पश्चिम बंगाल में स्थित वह संकरा इलाका है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है
मंत्री ने यह अंतर इसलिए स्पष्ट किया ताकि उन दावों का जवाब दिया जा सके कि PM Modi की टिप्पणियां विपक्षी नेताओं के खिलाफ निर्देशित थीं।
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## पी. चिदंबरम की तीखी प्रतिक्रिया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने इसी मंच पर प्रतिक्रिया देते हुए पोस्ट किया, “I am proud to be a dimagi Naxal!”
उनका बयान इस लेबल को अपनाने और उकसावे—दोनों के रूप में सामने आया। यह PM Modi और रिजिजू द्वारा किए गए अंतर को चुनौती देने या इस राजनीतिक भाषा को अपने पक्ष में पुनः परिभाषित करने का प्रयास भी हो सकता है। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब राष्ट्रवाद, असहमति और वैचारिक शुद्धता को लेकर बहस के बीच राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण है।
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## संदर्भ: “दिमागी नक्सल” को विवादास्पद मुद्दों से जोड़ना
किरेन रिजिजू के अनुसार, किसी व्यक्ति के “दिमागी नक्सल” बनने की तीन प्रमुख वजहें हैं:
1. **माओवादी विचारधाराओं का समर्थन करते हुए संवैधानिक मूल्यों को अस्वीकार करना**
2. **अलगाववाद और Article 370 का समर्थन करना**
3. **Chicken’s Neck को काटकर भारत के पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से अलग करने की इच्छा रखना**
यह ध्यान देने योग्य है कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला Article 370 अगस्त 2019 से निरस्त है। यहां Article 370 का संदर्भ संवैधानिक अखंडता के संदर्भ में उससे जुड़े राजनीतिक विवादों से मेल खाता है।
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## विपक्ष का पलटवार
रिजिजू ने इस बात से इनकार किया कि यह लेबल व्यापक रूप से विपक्षी नेताओं के लिए इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, उनकी पोस्ट कांग्रेस की तीखी आलोचना के बाद आई। पार्टी और राजनीतिक स्पेक्ट्रम के विभिन्न आलोचकों ने तर्क दिया कि संस्थागत क्षरण और वैचारिक उग्रवाद की जिम्मेदारी असहमति रखने वाली आवाजों, NGOs, अकादमिक जगत और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अनुचित रूप से डाली जा रही है। कुछ लोगों का मानना है कि “दिमागी नक्सल” शब्द असहमति और राजनीतिक विरोध को ही अवैध ठहराने का प्रयास है।
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## भारतीय लोकतंत्र पर व्यापक प्रभाव
PM Modi का “दिमागी नक्सल” की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान इस बात पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति, देशभक्तिपूर्ण असहमति और वैचारिक निष्ठा से क्या तात्पर्य है। राज्य के आधिकारिक आख्यानों को चुनौती देने वाली मान्यताओं को किस हद तक दंडित किया जाना चाहिए? आलोचना कब देश-विरोधी गतिविधि में बदल जाती है?
कई लोगों के लिए यह बहस लोकतंत्र के केंद्र में है। जैसे-जैसे भारत आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है और क्षेत्रीय अलगाववाद से लेकर सांप्रदायिक विभाजन तक आंतरिक तनावों का सामना कर रहा है, निष्ठा, असहमति, विचारधारा और विपक्ष के बीच की सीमाएं लगातार अधिक विवादित होती जा रही हैं।
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## मुख्य निष्कर्ष
– किरेन रिजिजू की परिभाषा के अनुसार, “दिमागी नक्सल” उन लोगों को कहा जाता है, जो माओवादियों का समर्थन करते हैं, संविधान को अस्वीकार करते हैं या अलगाववाद का समर्थन करते हैं—विशेष रूप से Article 370 के जरिए या पूर्वोत्तर भारत को विभाजित करने की इच्छा के माध्यम से।
– PM Modi के स्वतंत्रता दिवस भाषण में वैचारिक उग्रवाद की आलोचना की गई और इसकी तुलना अब कमजोर पड़ चुके सशस्त्र नक्सली आंदोलन से की गई।
– कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम द्वारा सार्वजनिक रूप से इस लेबल को अपनाने की प्रतिक्रिया ने असहमति और वैचारिक पहचान को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
भारत अब संवैधानिकता, असहमति और लोकतंत्र में देशभक्त नागरिक होने के अर्थ को लेकर जारी विमर्श के एक और अध्याय में प्रवेश कर रहा है।
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