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एली हिर्शलैग ने जाना कि अगर आप नींद से जुड़ी दूसरी ज़रूरी बातों का ध्यान रखें, तो स्वाभाविक रूप से जागना हैरान करने वाली हद तक आसान हो सकता है.
मेरी अलार्म पर निर्भरता ज़िंदगी के अलग-अलग दौर में काफ़ी बदलती रही है. जब मैं किशोरावस्था में थी, तब स्कूल के दिनों में अक्सर अलार्म बजने से पहले ही जाग जाती थी.
मैं तुरंत बिस्तर से उठ खड़ी नहीं होती थी, लेकिन मेरी शरीर की आंतरिक घड़ी इतनी भरोसेमंद थी कि मुझे कभी देर होने की चिंता नहीं रहती थी.
इसकी एक वजह मेरा नियमित दैनिक कार्यक्रम भी था. यह आमतौर पर रात 11 बजे ख़त्म हो जाता था और उसी समय मैं सो जाती थी.
फिर कॉलेज में पहुंचने पर मेरी नींद का रूटीन बिगड़ गया. इसकी वजह कम व्यवस्थित कार्यक्रम था. इसके बाद मैं अलार्म पर कहीं ज़्यादा निर्भर हो गई.
बाद में जब मैंने नौकरी शुरू की, तो स्थिति फिर बदल गई. मैं दोबारा एक नियमित नींद की दिनचर्या पर लौट आई और बिना अलार्म के आसानी से जागने लगी.
लेकिन 30 साल की उम्र के बाद मैं फिर से अलार्म पर ज़्यादा निर्भर होने लगी.
अब मेरी उम्र 40 साल से ज़्यादा है. रात में नींद आसानी से नहीं आती और सुबह की सुस्ती दूर करने के लिए मैं नियमित रूप से कैफ़ीन का सहारा लेती हूं.
इसलिए जब मेरे एडिटर ने सुझाव दिया कि मैं नींद के शोधकर्ताओं की सलाह के आधार पर बिना अलार्म के जागना सीखने का प्रयोग करूं, तो मैंने उत्साह से इसे स्वीकार कर लिया.
मेरी सर्केडियन रिदम को फिर से संतुलित करने की ज़रूरत थी. मैं इसे ठीक करने के लिए पूरी मेहनत करने के लिए तैयार थी.
अपनी लय तलाशना
विशेषज्ञों से बात करने के बाद मैंने तय किया कि अपने शरीर की आंतरिक घड़ी को दोबारा प्रशिक्षित करने के लिए बिना अलार्म के एक हफ़्ते तक जागने की कोशिश करना उचित रहेगा.
हालांकि इसके लिए थोड़ी तैयारी की ज़रूरत थी.
जिन शोधकर्ताओं से मैंने बात की, उन सभी ने सलाह दी कि शुरुआत करने से पहले कुछ दिन अपनी वास्तविक नींद की लय को समझने में बिताने चाहिए.
अगर बाद में यह लय आपकी दिनचर्या के अनुकूल न बैठे, तो सर्केडियन रिदम को कैसे बदला जा सकता है, उस पर हम आगे बात करेंगे.
मैं आमतौर पर सात से आठ घंटे सोती हूं. लेकिन मेरे सोने का समय रात 11 बजे से लेकर 2 बजे के बीच कभी भी हो सकता है.
कभी-कभी मैं सोफ़े पर टीवी देखते-देखते सो जाती हूं. फिर रात 2:30 बजे मेरी आंख खुलती है. इसके बाद दोबारा सो पाना मेरे लिए सचमुच मुश्किल हो जाता है.
ख़ुशक़िस्मती से मैं उसी दौरान एक क्रूज़ यात्रा पर जाने वाली थी.
मेरे पास यह देखने के लिए काफ़ी समय था कि रात में मुझे स्वाभाविक रूप से कब नींद आती है और सुबह कब जागने का मन होता है.
मुझे पता चला कि मेरा स्वाभाविक सोने का समय रात लगभग 11:30 बजे है और जागने का समय सुबह 8 बजे. यानी कुल साढ़े आठ घंटे की नींद.
हमारे शरीर और दिमाग़ के सही ढंग से काम करने के लिए पूरी नींद लेना बेहद ज़रूरी है.
आमतौर पर वयस्कों को सात से नौ घंटे की नींद लेने की कोशिश करनी चाहिए. छह घंटे से कम नींद लेने पर समय से पहले मृत्यु का ख़तरा 20 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.
लेकिन ऐसा कोई जादुई आंकड़ा नहीं है, जो हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू हो.
डैलस स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय की स्लीप इनोवेशन लैब्स की एसोसिएट डायरेक्टर एटी बेन साइमन कहती हैं, “आठ घंटे बीच का मानक है. लेकिन कुछ लोग सात घंटे में ठीक रहते हैं, जबकि कुछ को नौ घंटे की ज़रूरत होती है.”
वह कहती हैं कि इसमें जैविक अंतर स्वाभाविक है. यह काफ़ी हद तक आपकी सर्केडियन रिदम पर निर्भर करता है.
लेकिन सवाल यह था कि कामकाजी हफ़्ते के दौरान मैं इस व्यवस्था को कैसे बनाए रखूं.
उस समय चिंता ज़्यादा रहती है और यह फ़िक्र भी बनी रहती है कि हर रात आठ घंटे की नींद पूरी हो पाएगी या नहीं. इसका असर अक्सर मेरी नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है.
रोशनी और आराम की तैयारी
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मेरी नई दिनचर्या में प्राकृतिक रोशनी को भी शामिल करना ज़रूरी था. इससे मेरे शरीर की आंतरिक घड़ी को मेरी नींद की दिनचर्या के साथ तालमेल बिठाने में मदद मिलती.
आदर्श रूप से ये दोनों मिलकर काम करते हैं. साइमन कहती हैं, “इससे आप रात में थकान महसूस करते हैं और दिन में जागृत रहते हैं.”
इस तालमेल में रोशनी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यह उन हार्मोन को सक्रिय करती है, जो शरीर को सोने और जागने का संकेत देते हैं.
चार्टर्ड मनोवैज्ञानिक, नींद विशेषज्ञ और रीजेंट्स यूनिवर्सिटी लंदन की शोधकर्ता एना जॉयस कहती हैं, “रोशनी सर्केडियन घड़ी को नियंत्रित करने वाला सबसे बड़ा कारक है.”
वह कहती हैं, “यह मेलाटोनिन को बंद होने का संकेत देती है और बताती है कि अब जागने का समय है.”
शोधों से यह भी पता चला है कि सुबह की तेज़ रोशनी अवसाद कम करने में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है. इसका कारण यह है कि यह शरीर को सेरोटोनिन की स्वस्थ मात्रा प्रदान करती है.
मैं रोशनी के प्रति काफ़ी संवेदनशील हूं. इसलिए जिन शोधकर्ताओं से मैंने बात की, उन्होंने सोते समय ब्लैकआउट पर्दों का इस्तेमाल करने की सलाह दी.
मेरे पास ऐसे पर्दे पहले से मौजूद थे. अतिरिक्त सुरक्षा के लिए मैंने अपनी स्लीप मास्क पहनने का भी फ़ैसला किया.
इसके बाद उन्होंने सलाह दी कि जागते ही मैं तुरंत पर्दे खोल दूं, ताकि सुबह की रोशनी कमरे में आ सके. यह कॉर्टिसोल नामक हार्मोन के स्तर को बढ़ाती है.
यही हार्मोन हमें सतर्क और सक्रिय रहने में मदद करता है.
साइमन कहती हैं, “यह शरीर की घड़ी को संकेत देता है कि ठीक है, अब मेरा दिन शुरू हो गया है.”
जॉयस ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि सोने के निर्धारित समय से लगभग दो घंटे पहले एक “नियमित और पूर्वानुमानित आराम की दिनचर्या” होनी चाहिए.
यह दिनचर्या हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है.
लेकिन रोशनी को धीमा करना बहुत ज़रूरी है. इससे शरीर को मेलाटोनिन बनाने का संकेत मिलता है और वह नींद के लिए तैयार होने लगता है.
मैंने योजना बनाई कि जैसे ही मुझे नींद महसूस हो, मैं नाइटसूट पहन लूं, दांत साफ़ कर लूं और अपनी स्किनकेयर दिनचर्या पूरी कर लूं. इससे निर्धारित समय पर मैं सीधे बिस्तर पर जा सकती थी.
साइमन ने मुझे शरीर के तापमान पर भी ध्यान देने की सलाह दी.
रात में हमारे शरीर का आंतरिक तापमान कम हो जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम कम ऊर्जा खर्च कर रहे होते हैं.
शरीर बची हुई ऊर्जा को हाथों और पैरों के ज़रिए बाहर निकालता है. यह रक्त वाहिकाओं के फैलने की प्रक्रिया से होता है.
इसी वजह से गर्मी होने पर सोना या सोए रहना ज़्यादा मुश्किल हो जाता है.
ज़्यादा गर्मी मेरी नींद को निश्चित रूप से प्रभावित करती है. इसलिए मैंने अपने घर का थर्मोस्टेट सामान्य समय से पहले, रात 11 बजे ही कम तापमान पर सेट कर दिया.
साथ ही बिस्तर पर तापमान नियंत्रित रखने वाली बांस से बनी चादरें भी बिछा दीं.
नींद में आने वाली बाधाएं
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हालांकि मेरी नींद में सबसे बड़ी रुकावट मेरा स्मार्टफ़ोन है.
जिन विशेषज्ञों से मैंने बात की, उनके अनुसार यह एक बहुत आम समस्या है. इसके लिए कुछ हद तक उपकरणों से निकलने वाली नीली रोशनी ज़िम्मेदार हो सकती है.
इसकी तरंग लंबाई दिन की प्राकृतिक रोशनी जैसी होती है. इससे रात के समय दिमाग़ को भ्रमित करने वाले संकेत मिल सकते हैं.
लेकिन स्मार्टफ़ोन का ज़्यादा असर डालने वाला पहलू शायद “डोपामिन स्क्रॉलिंग” है. इसका मतलब है सोशल मीडिया फ़ीड को बार-बार देखते रहना, ताकि थोड़ी-थोड़ी ख़ुशी महसूस होती रहे.
इन प्लेटफ़ॉर्म के एल्गोरिदम लोगों को लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए बनाए जाते हैं. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि हालिया विश्लेषण में पाया गया कि ज़रूरत से ज़्यादा स्क्रॉलिंग नींद में बाधा डालती है.
इस समस्या से निपटने के लिए मैंने एक फ़िज़िकल ऐप-ब्लॉकिंग डिवाइस का इस्तेमाल किया. मैंने प्रयोग के दौरान हर रात 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक ऐप्स ब्लॉक रहने का समय तय किया.
मैंने अपने फ़ोन को ग्रेस्केल मोड में भी डाल दिया. इससे तस्वीरें कम आकर्षक और कम ध्यान खींचने वाली दिखाई देती हैं.
मैंने यह भी तय किया कि रात का खाना सोने से कम से कम तीन घंटे पहले ख़त्म कर लूं. ऐसा इसलिए क्योंकि शरीर का मेटाबॉल्ज़्मि प्रक्रिया भी सर्केडियन रिदम को प्रभावित करती है.
बर्गेस ने मुझे सलाह दी कि मैं जितना संभव हो शराब से बचूं.
लेकिन बाद में यह आपकी नींद को बिगाड़ देती है. इसका कारण यह है कि यह आरईएम नींद को दबा देती है.
प्रयोग शुरू करने से पहले मैंने उन बातों के बारे में सोचा, जिनकी वजह से यह योजना बिगड़ सकती थी.
हमारे घर में दो बिल्लियां हैं. उन्हें सुबह 6 बजे नाश्ता चाहिए होता है. ख़ुशक़िस्मती से वे ज़्यादातर मेरे पति को जगाने की आदी हैं. मैं उन्हें शाम का खाना देती हूं.
मेरे पति का सुबह का हल्का अलार्म आमतौर पर मुझे नहीं जगाता. लेकिन उन्होंने यह पेशकश की कि जिन दिनों उन्हें बहुत जल्दी उठना होगा, जैसे सुबह 5 बजे, उन दिनों वे सोफ़े पर सो जाएंगे.
और आख़िर में, जिन सभी विशेषज्ञों से मैंने बात की थी, उनकी सलाह पर मैंने एहतियात के तौर पर एक इमरजेंसी अलार्म भी सेट कर दिया.
यह अलार्म मेरे स्वाभाविक रूप से सुबह 8 बजे जागने के निर्धारित समय से 20 मिनट बाद के लिए लगाया गया था. ऐसा इसलिए किया गया था, ताकि अगर मैं समय पर न जागूं, तो यह बैकअप के रूप में काम कर सके.
सात दिनों की परीक्षा
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पहली रात मैं रात 12 बजे तक सो गई. यह मेरे तय समय रात 11:30 बजे से आधा घंटा बाद था. हालांकि रात में मेरी कुछ बार नींद खुली.
अगली सुबह मैं सुबह 8 बजे से थोड़ा पहले जाग गई. लेकिन फिर 8:15 बजे तक बिस्तर में ही पड़ी रही.
इससे मुझे नींद आ गई.
उस रात मैं अपने इमरजेंसी अलार्म की आवाज़ पर सुबह 8:20 बजे जागी. तीसरे दिन मैं काफ़ी व्यस्त रही इसलिए रात लगभग 11 बजे ही सो गई.
अगली सुबह मेरी आंख स्वाभाविक रूप से 7:10 बजे खुल गई. चूंकि मुझे अभी उठना नहीं था, इसलिए मैं कुछ देर बिस्तर पर ही रही. लेकिन दोबारा नींद नहीं आई.
नींद के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई ऐसा स्विच नहीं है, जिसे बस चालू या बंद कर दिया जाए.
ज़िंदगी ने भी कुछ बाधाएं खड़ी कीं. चौथी रात मुझे रात 12 बजे से थोड़ा पहले सोने में कोई परेशानी नहीं हुई. लेकिन अगली सुबह 6:45 बजे दरवाज़े की घंटी ने मुझे जगा दिया.
वह घंटी इतनी जल्दी बजी कि मुझे बहुत बुरा लगा. हालांकि इसके बाद मैं फिर से लगभग एक घंटे के लिए सो गई.
पांचवीं रात मैं रात 11:30 बजे तक सो गई. अगली सुबह मेरी आंख 8:12 बजे खुली. यह तब हुआ, जब सुबह 5:30 बजे मेरी बिल्ली ने अपने पंजे से मेरे चेहरे को हल्के से छूकर जगा दिया था.
छठी रात मेरा जन्मदिन था. इसलिए मैंने कुछ ड्रिंक्स लीं और रात 12:30 बजे तक बिस्तर पर चली गई.
मैं सुबह 6 बजे सीने में जलन (हार्टबर्न) के कारण जाग गई, जिसे मैंने मज़ाक में इस प्रयोग से भटकने की अपनी “कर्मिक सज़ा” माना. इसके बाद मैं फिर से सो गई और सुबह 9 बजे तक सोती रही.
सातवीं रात, जो शुक्रवार की रात थी, मैं रात 11:30 बजे से 12 बजे के बीच आसानी से सो गई. शनिवार की सुबह मेरी आंख 8:05 बजे खुल गई.
सप्ताहांत में मेरे पति से पहले उठना मेरे लिए बहुत दुर्लभ बात है. इसलिए मैं पास की दुकान से हम दोनों के लिए कॉर्टाडो कॉफ़ी लेने चली गई.
मेरा एक हफ़्ते का यह प्रयोग आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका था. लेकिन रविवार को भी मैं आराम से सुबह 8 बजे के कुछ मिनट बाद जाग गई.
यह सिलसिला अगले हफ़्ते भी बिना ज़्यादा प्रयास के जारी रहा.
इसके बाद के हफ़्तों में भी मैंने विशेषज्ञों की सुझाई गई कुछ अच्छी नींद संबंधी आदतें बनाए रखीं. इनमें नियमित समय पर भोजन करना और सोने से पहले फ़ोन का कम इस्तेमाल करना शामिल है.
मैं कुछ हद तक फिर से अलार्म लगाकर जागने लगी हूं. लेकिन अब जब मैं चाहती हूं, तब स्वाभाविक रूप से जागने में पहले जैसी मुश्किल नहीं होती.
हालांकि इसके लिए एक शर्त है. मुझे कम से कम आठ घंटे की नींद ज़रूर लेनी होती है.
मेरे बड़ी सीखें
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इस प्रयोग के अंत तक मेरी आंतरिक जैविक घड़ी कोई जर्मन ट्रेन की तरह पूरी तरह सटीक नहीं बन गई थी. लेकिन कुल मिलाकर यह प्रयोग सफल लगा.
सुबह 8 बजे के आसपास स्वाभाविक रूप से जागने में मुझे पहले की तुलना में कम परेशानी होने लगी. चौथे दिन तक सुबह की सुस्ती भी काफ़ी कम महसूस हुई.
मुझे लगा कि सबसे ज़्यादा मदद नियमित समय पर सोने की आदत और स्क्रीन के कम इस्तेमाल से मिली.
मैं कोशिश करूंगी कि इन आदतों को यथासंभव जारी रखूं. सप्ताहांत पर भी. सच कहूं तो इससे मैं ज़्यादा तरोताज़ा और ऊर्जावान महसूस करने लगी.
आख़िरकार मैं अपने जागने का समय एक घंटा और पहले करना चाहती हूं. हालांकि बर्गेस कहती हैं कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है.
वह कहती हैं, “सर्केडियन प्रणाली अपनी गति बहुत धीरे बदलती है. मैं सलाह दूंगी कि शुरुआत में सोने और जागने के समय को आधा घंटा पहले करें. फिर हर दिन आधा घंटा और पहले करें, जब तक आप अपने इच्छित समय तक न पहुंच जाएं. इसके बाद उसी समय को बनाए रखने की कोशिश करें.”
ज़िंदगी में दरवाज़े की घंटी, जन्मदिन और तनाव जैसी कई चीज़ें आती रहती हैं. ऐसे में नियमित और सचमुच आरामदायक नींद पाना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है.
इस लेख के लिए वैज्ञानिक शोधों को पढ़ते समय जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वह यह थी कि आज हमारी नींद के साथ संबंध कितना तनावपूर्ण हो गया है.
तकनीक पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है. इसका असर विशेष रूप से किशोरों पर दिखाई देता है.
2025 में नॉर्वे के 45,000 विद्यार्थियों पर किए गए एक सर्वेक्षण के विश्लेषण में पाया गया कि स्मार्टफ़ोन का अत्यधिक इस्तेमाल सीधे तौर पर ख़राब नींद से जुड़ा हुआ है.
वह आगे कहती हैं, “उन्हें कम से कम नौ घंटे की नींद की ज़रूरत होती है. लेकिन लगभग 70 प्रतिशत युवा सात घंटे की नींद भी पूरी नहीं कर पाते हैं.”
कई किशोरों को निश्चित रूप से अपनी नींद की आदतों को दोबारा संतुलित करने के लिए एक सप्ताह का ऐसा प्रयोग फ़ायदा पहुंचा सकता है.
मेरे लिए यह काफ़ी लाभदायक साबित हुआ. हालांकि मैं यह भी समझती हूं कि इसके लिए समय निकाल पाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता.
फिर भी, अगर आप इनमें से कुछ आदतों को अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या में शामिल कर लें, तो इससे बेहतर और सुकूनभरी नींद पाने में मदद मिल सकती है. साथ ही सुबह जागना भी आसान हो सकता है.
अगर आपकी नींद की दिनचर्या बिगड़ी हुई है और आपके पास उसे दोबारा ठीक करने के लिए थोड़ा समय है, तो ख़ुद के साथ धैर्य रखें.
अपनी सही लय को समझने में कुछ समय लग सकता है. इसके लिए आपको कई बार अलग-अलग तरीक़े आज़माने पड़ सकते हैं.
बर्गेस कहती हैं, “नींद के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई ऐसा स्विच नहीं है, जिसे बस चालू या बंद कर दिया जाए.”
वह आगे कहती हैं, “नींद इस तरह काम नहीं करती.”
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