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भारत में आज भी ज़्यादातर लोगों के लिए घर का मालिक होना एक सपना और प्राथमिकता है.
घर खरीदने को एक बड़ा निवेश भी माना जाता है.
लेकिन हाल के रुझान बताते हैं कि अहमदाबाद सहित देश के प्रमुख शहरों में घरों की बिक्री धीमी हो गई है.
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, शेयर बाजार में लिस्टेड 28 प्रमुख रियल एस्टेट कंपनियों ने अप्रैल-जून 2026 तिमाही में बुकिंग में 21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है.
एक साल पहले, जून तिमाही में 50,900 करोड़ रुपये की बुकिंग हुई थी, जो इस साल घटकर लगभग 40,000 करोड़ रुपये रह गई है.
ज़मीन की ऊंची कीमतों, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों, लेबर की कमी और दूसरे कारणों का हवाला देते हुए, गुजरात के रियल एस्टेट डेवलपर्स ने हाल ही में मकानों की कीमतों में पांच से दस प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा की थी.
लेकिन स्थिति ऐसी है कि वे अपनी घोषणा के मुताबिक कीमतें नहीं बढ़ा सके.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, असलियत यह है कि ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि मौजूदा कीमतों पर भी घरों को बेचना मुश्किल है.
बढ़ती कंस्ट्रक्शन की लागत
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रियल एस्टेट कंसल्टेंट फ़र्म एनारॉक प्रॉपर्टी की ओर से ईमेल के ज़रिए से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत के शीर्ष सात शहरों में निर्माण लागत में 2021 से 2025 के बीच औसतन 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसके कारण पांच सालों में आवास की कीमतों में लगभग 59 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
एक वजह ईरान युद्ध भी रहा है और इस अकेली इस वजह से निर्माण लागत में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
इन सात शहरों में मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता शामिल हैं.
एनारॉक रिसर्च के एक ईमेल के मुताबिक, शीर्ष सात शहरों में ज़मीन की कीमतों में 2021 से 50 से 120 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है.
दिल्ली-एनसीआर में सबसे ज़्यादा 70 से 130 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, जबकि बेंगलुरु में इस अवधि के दौरान ज़मीन की कीमतों में 60 से 120 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण स्टील की कीमतों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और निर्माण में उपयोग होने वाली टीएमटी छड़ों की कीमत बढ़कर 72,000 रुपये प्रति टन हो गई है, जबकि ईंधन और साइट लॉजिस्टिक्स की लागत में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
मध्य पूर्व युद्ध के कारण टाइल्स, कांच, हार्डवेयर जैसी फ़िनिशिंग मैटेरियल्स की कीमतों में 8 से 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग की लागत में 9 से 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लेबर, जो कुल निर्माण लागत का 25 से 30 प्रतिशत है, उसमें पांच से छह प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि सीमेंट की कीमतों में चार से पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
हिचकिचा रहे हैं उपभोक्ता
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अहमदाबाद स्थित बेकरी ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन बेकरी ने रियलिटी मार्केट की मौजूदा स्थिति के बारे में कहा, “यह देखा गया है कि मौजूदा आर्थिक अनिश्चितता को देखते हुए कुछ लोग घर खरीदने को कुछ समय के लिए टाल रहे हैं या ‘इंतजार करो और देखो’ का रवैया अपना रहे हैं.”
वे कहते हैं, “हालांकि, कुछ क्षेत्रों में, अगर लोगों का बजट और घर की कीमतें सही हों तो बिक्री हो जाती है.”
पवन बेकरी के मुताबिक, “पिछले एक साल में मध्य पूर्व में युद्ध और अन्य कारणों से कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के चलते निर्माण लागत बढ़ गई है. एल्युमीनियम, सीमेंट, स्टील जैसी चीज़ें महंगी हो गई हैं. इसके अलावा, पिछले तीन सालों से रियल एस्टेट क्षेत्र में लेबर की कमी भी बनी हुई है.”
उनका कहना है, “कच्चे तेल की कीमत, जो कभी 60 से 70 डॉलर थी, बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल हो गई है, जिससे उद्योगों से काफी नकदी निकल गई है. इसका असर निजी क्षेत्र पर भी पड़ा है.”
क्या गुजरात के शहरों में मांग की तुलना में आपूर्ति अधिक बढ़ी है?
इस सवाल के जवाब में कि पवन बेकरी का कहना है, “आमतौर पर दो से तीन साल की आपूर्ति होती है, जिसे उद्योग के लिए अच्छा माना जाता है. लेकिन अभी आपूर्ति अधिक है और बिक्री धीमी हो गई है. हालांकि, कुछ डेवलपर्स को नए प्रोजेक्ट शुरू करने होंगे क्योंकि ज़मीन खरीदने के बाद उन्हें उस पर काम करना ही पड़ता है.”
रियल एस्टेट की आवाज़
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हाल ही में, अहमदाबाद और सूरत सहित कई शहरों में बिल्डर्स एसोसिएशन ने घोषणा की थी कि कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के कारण वे जुलाई से मकानों की कीमतों में 5 से 10 प्रतिशत की वृद्धि करेंगे.
हालांकि, असलियत में वे इतनी वृद्धि नहीं कर पाए हैं. पवन बेकरी का कहना है कि कुछ बिल्डरों ने कीमतों में 2 से 3 प्रतिशत की वृद्धि की है.
उस समय, रियल एस्टेट डेवलपर्स के संगठन क्रेडाई के अध्यक्ष राजेश वासवानी ने कहा था, “कुछ कच्चे माल की कीमतों में 80 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है. अब तक इससे घर खरीदारों पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा था, लेकिन अब कीमतें बढ़ानी ही पड़ेंगी.”
अहमदाबाद के एक बिल्डर सौरभ पटेल कहते हैं, “अहमदाबाद और सूरत सहित कई शहरों में अब टू बेडरूम-हॉल-किचन (बीएचके) वाले घरों से तीन बेडरूम वाले घरों की ओर रुझान बढ़ रहा है, और अधिकांश नए घर भी तीन या चार बेडरूम वाले हैं.”
डेवलपर्स का कहना है कि ऊंची कीमत पर ज़मीन खरीदने के बाद अब उनके पास टू-बीएचएस फ्लैट बनाने का कोई विकल्प नहीं है. इसी वजह से किफ़ायती सेगमेंट में नए प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग कम हो गई है और तीन-बीएचएस घरों की कीमत बढ़ गई है. इसलिए लोग इन्हें खरीद नहीं पा रहे हैं.
सौरभ पटेल ने कहा, “टू-बीएचके फ्लैट के लिए लोगों का बजट 45 से 50 लाख रुपये होता है. लेकिन ज़मीन की कीमत इतनी बढ़ गई हैं कि बिल्डर के लिए इसे वहन करना मुश्किल हो गया है. आज टू-बीएचके फ्लैट बनाने में बिल्डर को 60 लाख रुपये से अधिक खर्च करने पड़ते हैं, इसलिए यह ग्राहक के बजट से बाहर हो गया है.”
‘टाइल्स, तांबा, सीमेंट सब हुआ महंगा
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अहमदाबाद स्थित सिग्नेचर ग्रुप के सौरभ पटेल ने बीबीसी को बताया, “मध्य पूर्व में युद्ध शुरू होने के बाद से कई सामानों की कीमतें 30 से 80 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. इनमें टाइल्स, सीमेंट, स्टील, पीवीसी पाइप, पेंट, रेडी-मिक्स कंक्रीट, सीमेंट ब्लॉक, वॉटरप्रूफिंग सामग्री आदि शामिल हैं. इन सामानों की खरीद के लिए आपूर्तिकर्ताओं ने कंपनी को पहले ही ऑर्डर दे दिए हैं. लेकिन चूंकि सौदा पुरानी कीमत पर हुआ था, इसलिए आपूर्तिकर्ता माल की डिलीवरी में देरी कर रहे हैं या ज़्यादा पैसे मांग रहे हैं. इस वजह से कुछ जगहों पर नए प्रोजेक्ट शुरू करने में देरी करनी पड़ी है.”
सौरभ पटेल कहते हैं, “सबसे बड़ी समस्या स्टील, सीमेंट, तांबा और सिरेमिक टाइलों की बढ़ती कीमतों के कारण उत्पन्न हुई है. इसके अलावा, प्लंबिंग की लागत भी बढ़ गई है. इसके परिणामस्वरूप, मकानों की कीमतें बढ़ी हैं और बिक्री प्रभावित हुई है.”
उन्होंने कहा कि “तांबे की कीमतों में वृद्धि के कारण बिजली के सामान 15 से 20 प्रतिशत महंगे हो गए हैं. इसके अलावा, पीएनजी में आपूर्ति में व्यवधान ने टाइलों के उत्पादन को प्रभावित किया है और अब वे भी महंगी हो रही हैं.”
अहमदाबाद में मकानों की बिक्री के बारे में उनका कहना है, “बिक्री में मंदी आई है, लेकिन यह क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग है. अगर किसी ऐसे क्षेत्र में 1 करोड़ रुपये के फ्लैट बनाए जाते हैं जहां 50 लाख रुपये से कम कीमत वाले किफायती मकानों की मांग है, तो स्वाभाविक रूप से वे नहीं बिकेंगे.”
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रियल एस्टेट की मौजूदा स्थिति के बारे में पारिख इंफ्राकॉन प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक मोनिल पारिख कहते हैं, “यह सच है कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और श्रम की कमी के कारण मकानों की कीमतें बढ़ी हैं. गुजरात का आवास क्षेत्र काफी हद तक उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के मजदूरों पर निर्भर रहा है. अब इन राज्यों में भी काम उपलब्ध हो रहा है और उन्हें गुजरात के बराबर ही वेतन मिल रहा है, इसलिए वे निर्माण कार्य के लिए गुजरात आने से बच रहे हैं. इस वजह से, उपलब्ध मजदूरों को अधिक भुगतान करना पड़ रहा है.”
वह कहते हैं, “2024 के आंकड़ों के अनुसार, अहमदाबाद का रियल एस्टेट बाजार 1.45 लाख करोड़ रुपये का है, जबकि सूरत का बाजार 65 हजार करोड़ रुपये का, गांधीनगर का 50 हजार करोड़ रुपये का और राजकोट का रियल एस्टेट बाजार लगभग 18 हजार करोड़ रुपये का है.”
इस सवाल के जवाब में मोनिल पारिख ने कहा कि डेवलपर आमतौर पर 70 से 80 प्रतिशत घर बिक जाने तक इंतजार करते हैं और उसके बाद ही कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करते हैं.
उनका कहना है कि अगर कोई व्यावसायिक संपत्ति लंबे समय तक नहीं बिकती है, तो बिल्डर उसे किराए पर दे देते हैं, लेकिन आवासीय संपत्तियों के मामले में ऐसा नहीं होता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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