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चेहरा देखकर एआई बता सकेगा कि मरीज़ कितने समय तक ज़िंदा रहेगा!

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Source :- BBC INDIA

इस एआई टूल को लाखों स्वस्थ चेहरों और कैंसर मरीज़ों की 35,000 तस्वीरों पर ट्रेन किया गया है

अमेरिका के शोधकर्ताओं का कहना है कि एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टूल मरीज़ के चेहरे की सिर्फ़ एक तस्वीर देखकर डॉक्टरों को यह समझने में मदद कर सकता है कि मरीज़ कितना बीमार है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस टूल को लाखों स्वस्थ चेहरों और कैंसर मरीज़ों की 35,000 तस्वीरों पर ट्रेन किया गया है. यह आंखों के आस-पास के हिस्सों को बारीकी से देखकर अंदाज़ा लगा सकता है कि मरीज़ कितने समय तक जीवित रह सकता है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि अस्पतालों में इस्तेमाल के लायक बनने में इसे अभी लंबा समय लगेगा, लेकिन उनका मक़सद है कि डॉक्टर अपने मरीज़ों के लिए सही इलाज चुन सकें.

चेहरे का कौन-सा हिस्सा सबसे ज़्यादा बातें बताता है?

इस एआई टूल के पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है, जो अभी मंज़ूरी के इंतज़ार में है.

इस एआई टूल का नाम ‘फ़ेससर्वाइवल’ है. ये टूल कहता है कि किसी की ज़िंदगी कितनी बची है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए चेहरे पर सबसे ज़रूरी हिस्सा है आंखों के नीचे की जगह और दोनों आंखों के बीच नाक का ऊपरी हिस्सा.

किसी मरीज़ के कितने समय तक जीवित रहने की संभावना है, इसका अनुमान लगाते समय यह टूल चेहरे के इन्हीं हिस्सों को सबसे ज़्यादा अहमियत देता है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये पैमाने कई तरह के कैंसर पर सही बैठते हैं, चाहे वो हल्के हों या गंभीर. इनमें वो मामले भी शामिल थे जिनमें कैंसर मरीज़ की हड्डियों या दिमाग़ तक फैल चुका था.

इस टूल को तैयार करने के लिए जिन कैंसर मरीज़ों की तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया, उनमें ज़्यादातर कैंसर मरीज़ अमेरिका और नीदरलैंड्स के थे और उनकी उम्र 50 से 70 साल के बीच थी. लेकिन कुछ मरीज़ बच्चे थे, तो कुछ 90 साल से ज़्यादा उम्र के थे.

हालांकि, डॉक्टर पहले से ही मरीज़ों की जांच करते हैं और कई तरह के टेस्ट करवाते हैं, ताकि पता चल सके कि मरीज़ कितना बीमार है और आगे उसकी हालत कैसी रह सकती है.

इस एआई टूल के पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है, जो अभी मंज़ूरी के इंतज़ार में है. इसे डॉक्टरों की मदद करने के लिए बनाया गया है, उनकी जगह लेने के लिए नहीं.

बोस्टन के मास जनरल ब्रिघम अस्पताल के मुख्य शोधकर्ता डॉ. रेमंड मैक ने बताया, “जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ रही है, डॉक्टरों को रेडिएशन, सर्जरी या सिस्टेमिक थेरेपी जैसे इलाज में उचित सलाह की ज़रूरत होती है. यह उन्हें ये आंकने में मदद करती है कि मरीज़ के शरीर में कितनी ताक़त बची है और वह कितना कमज़ोर है.”

“हमारा मक़सद है कि चेहरे की तस्वीर से सेहत का आकलन ज़्यादा सटीक, एक जैसा और बड़े पैमाने पर हो सके, ताकि यह हर मरीज़ के हिसाब से इलाज तय करने में मदद करे, न कि डॉक्टर के फ़ैसले की जगह ले.”

एआई से परखा गया चेहरा कितना जवान?

सांकेतिक तस्वीर

मैक और उनके साथी एक और एआई टूल को परख रहे हैं, जो किसी की बायोलॉजिकल उम्र का अंदाज़ा लगाता है. यानी कोई कितना बूढ़ा दिखता है, न कि जन्म की तारीख़ के हिसाब से उसकी उम्र कितनी है.

इस टूल का नाम ‘फ़ेसएज’ है.

इसके मुताबिक़, नाक के नीचे और मुंह के आसपास की त्वचा इस बात का अच्छा संकेत दे सकती है कि किसी व्यक्ति की उम्र कितनी तेज़ी से बढ़ रही है.

इनमें नाक से होंठों के किनारों तक दिखाई देने वाली लकीरें और मुंह के किनारों से ठोड़ी की ओर जाने वाली रेखाएं शामिल हैं.

इसके अलावा माथे की शिकन, आंखों के किनारों की झुर्रियां, कनपटी और गाल भी उम्र बढ़ने की रफ़्तार के बारे में बता सकते हैं.

कुछ आदतें उम्र बढ़ने की इस प्रक्रिया को तेज़ कर सकती हैं. इनमें बहुत अधिक शराब पीना, नशीली दवाओं का इस्तेमाल और धूम्रपान शामिल हैं.

डॉक्टर मैक का कहना है कि आम जीवन में ली गई अलग-अलग तरह की तस्वीरों पर भी इस टूल के नतीजे “हैरान करने वाली हद तक एक जैसे” रहे.

तस्वीर खिंचवाने का तरीक़ा, रोशनी, चेहरे के भाव और मेकअप अलग होने के बावजूद इसके नतीजों में बहुत बदलाव नहीं आया.

जिन प्लास्टिक सर्जरी प्रक्रियाओं पर इसे जांचा गया, उनमें से अधिकतर के बाद भी नतीजे लगभग स्थिर रहे. केवल नाक की सर्जरी यानी राइनोप्लास्टी के बाद नतीजों में थोड़ा बदलाव दिखाई दिया.

‘अभी सिर्फ़ शुरुआत, अधिक डेटा चाहिए होगा’

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SOURCE : BBC NEWS