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जाति जनगणना को लेकर क्या कोई भी राजनीतिक दल सच में गंभीर है?

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Source :- BBC INDIA

नोएडा में जनगणना 2027 के तहत घर-घर सर्वेक्षण का काम करते जनगणना अधिकारी

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जाति की गिनती कैसे होगी? संख्याएँ कैसे गिनी जाएँ? और लोगों की पहचान कैसे की जाए? आम लोगों को यह कोई मुश्किल सवाल नहीं लगेगा.

लेकिन जब पहचान जाति की हो, तो भारत जैसे देश में यह बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाता है. कई बार यह इतना संवेदनशील हो जाता है कि लोग इससे दूरी बनाना ही बेहतर समझते हैं.

करीब दो हफ़्ते पहले एक बड़े अख़बार के ओपिनियन पेज पर चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव ने इसी मुद्दे पर अपनी बात रखी थी.

बहुत सरल शब्दों में उनका कहना था कि अगर लोगों से सिर्फ़ एक खुला सवाल पूछा जाए, “आपकी जाति क्या है?”, तो नतीजे 2011 जैसे ही हो सकते हैं.

2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना कराई गई थी. उस जनगणना में जातियों की संख्या 1931 में दर्ज 4,147 से बढ़कर 4 लाख 67 हज़ार तक पहुँच गई थी.

1931 में देश की पहली जाति जनगणना हुई थी. 2011 में जुटाए गए आँकड़ों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठे थे.

स्थिति ऐसी थी कि यह डेटा सार्वजनिक भी नहीं किया गया.

प्रोफ़ेसर यादव ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, “एक साल पहले जिस सरकार ने जाति जनगणना का एलान किया था, उसने अब उसे ख़त्म करने का फ़ैसला कर लिया है.”

उन्होंने लिखा, “ज़ाहिर है कि इसकी कोई औपचारिक घोषणा नहीं होगी और न ही कोई सरकारी अंतिम संस्कार किया जाएगा.”

फ़रवरी से शुरू होगी जनगणना

जनगणना के लिए तैयार 40 सवालों में जाति का ज़िक्र सिर्फ़ एक बार किया गया है

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पिछले 130 वर्षों से हर 10 साल में जनगणना कराई जाती रही है. जनगणना सिर्फ़ आबादी गिनने का काम नहीं है.

यह सरकार को नीतियाँ बनाने के लिए ज़रूरी आँकड़े भी उपलब्ध कराती है.

2027 की जनगणना फ़रवरी से शुरू होने वाली है. यह सात साल की देरी के बाद हो रही है.

कोविड महामारी की वजह से 2021 में जनगणना नहीं हो पाई थी. बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भी इसे टाल दिया गया.

प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव ने अपने लेख में तर्क दिया कि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग की उपजातियों के नाम सरकार के पास पहले से मौजूद हैं.

उन्होंने कहा कि इस जानकारी का इस्तेमाल ड्रॉप-डाउन मेन्यू में किया जा सकता है.

उनके मुताबिक़, इससे सामान्य वर्ग की गणना करना भी मुश्किल नहीं रहेगा.

प्रोफ़ेसर यादव के इस सुझाव पर समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, नौकरशाही और राजनीति से जुड़े विशेषज्ञों के बीच बहस चल रही है.

इस बहस ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है.

सवाल यह है कि राजनीतिक दल अचानक ख़ामोश क्यों हो गए हैं.

कुछ दल पहले जाति जनगणना की मांग कर रहे थे. वहीं कुछ दल इसके विरोध में थे. लेकिन बाद में उन्होंने भी इसे स्वीकार कर लिया.

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस पूरी कवायद का मक़सद समाज के वंचित तबकों के लिए विकास नीतियाँ तैयार करना बताया जाता है.

जाति गिनने के कई तरीके़

इस बार जनगणना में आवास, सुविधाओं और जाति से जुड़ी जानकारी भी डिजिटल माध्यम से दर्ज की जा रही है

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विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ा सवाल जाति से जुड़ा खुला प्रश्न है.

जनगणना के लिए तैयार 40 सवालों में जाति का ज़िक्र सिर्फ़ एक बार किया गया है.

यह सवाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और जाति के रूप में शामिल है.

जनसंख्या विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम एम. कुलकर्णी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “मुझे यह अजीब लगता है कि जनगणना में ड्राइविंग लाइसेंस जैसी चीज़ों पर सवाल पूछे जा रहे हैं, लेकिन महत्वपूर्ण सवालों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा.”

उन्होंने कहा, “जाति पर खुला सवाल पूछने से बहुत बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम सामने आते हैं. 2011 में भी यही हुआ था.”

कुलकर्णी के मुताबिक़, इस काम के लिए व्यापक तैयारी की ज़रूरत होगी.

उन्होंने कहा कि समाजशास्त्रियों, मानवविज्ञानियों और सांख्यिकीविदों को मिलकर समान नामों की पहचान करनी होगी और उन्हें व्यवस्थित श्रेणियों में रखना होगा.

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “गौड़ा” शब्द का मतलब अलग-अलग इलाक़ों में अलग हो सकता है.

उत्तर कर्नाटक में यह कभी वोक्कालिगा समुदाय का नाम होता है, तो कभी लिंगायत समुदाय में ज़मींदार के अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है.

उन्होंने कहा, “पूरी प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण राज्यों के स्तर पर होना चाहिए.”

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ के जेआरडी टाटा चेयर विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नरेंद्र पाणी भी डेटा जुटाने की प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण से सहमत हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “लोग अपनी जाति या उपजाति का नाम गणनाकर्मी को बताएँ.”

उन्होंने कहा कि गणनाकर्मी आमतौर पर स्कूल शिक्षक होते हैं.

उनके मुताबिक़, पहले लोगों के जवाबों को जस का तस दर्ज किया जाना चाहिए.

बाद में ज़िला या तालुका स्तर के विशेषज्ञ स्थानीय नामों का मिलान कर सकते हैं.

फिर इन नामों को मानकीकृत श्रेणियों में रखा जा सकता है.

उन्होंने कहा कि अलग-अलग नामों और वर्तनी को मिलाने के लिए बड़े डेटा सिस्टम का उपयोग किया जा सकता है.

प्रोफ़ेसर पाणी का मानना है कि ड्रॉप-डाउन मेन्यू की कोई विशेष ज़रूरत नहीं है.

उन्होंने कहा, “असल सवाल यह है कि जाति का निर्धारण कौन करे.”

उनके मुताबिक़, गणनाकर्मियों को उपजातियों की पहचान करने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती.

उन्होंने कहा, “अगर मौके पर ही वर्गीकरण किया गया तो मूल जानकारी खोने का ख़तरा रहेगा.”

पाणी का कहना है कि यह काम बाद में विशेषज्ञों को करना चाहिए.

उन्होंने कहा, “गणनाकर्मी जातियों का सही वर्गीकरण करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति नहीं होते.”

उन्होंने कहा, “विशेषज्ञ बाद में इन आँकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं और श्रेणियाँ तय कर सकते हैं.”

पाणी के मुताबिक़, जातियों का आकलन नीचे से ऊपर की दिशा में होना चाहिए. यानी पहले स्थानीय जानकारी जुटाई जाए और फिर उसके आधार पर व्यापक वर्गीकरण किया जाए.

ड्रॉप-डाउन सूची हो सकती है मददगार

देश की पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना के तहत लोगों से विस्तृत जानकारी जुटाई जा रही है

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हालाँकि, अशोका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर अश्विनी देशपांडे इस मुद्दे पर अलग राय रखती हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “ड्रॉप-डाउन मेन्यू में पहले से तैयार जातियों की सूची होनी चाहिए.”

उन्होंने कहा कि हर राज्य के पास अनुसूचित जातियों की सूची पहले से मौजूद है.

इसी तरह हर राज्य के पास अनुसूचित जनजातियों और ओबीसी समुदायों की सूची भी है.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें आरक्षण देने के लिए पहले से इन सूचियों का इस्तेमाल करती हैं.

इसके अलावा केंद्र सरकार की अलग सूची भी मौजूद है.

देशपांडे के मुताबिक़, “सूची चाहे जितनी बड़ी हो, वह 2011 की तरह 46.7 लाख प्रविष्टियों तक नहीं पहुँचेगी.”

उन्होंने कहा कि ऐसी सूची को आसानी से ड्रॉप-डाउन मेन्यू में शामिल किया जा सकता है.

अश्विनी देशपांडे ने कहा, “अगर किसी जाति का नाम ड्रॉप-डाउन सूची में नहीं है, तो उसे अलग से लिखा जा सकता है.”

उन्होंने कहा कि सूची में “बताना नहीं चाहते” का विकल्प भी होना चाहिए.

इसके साथ ही “अन्य” का विकल्प भी शामिल किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, “अगर जाति जनगणना करनी है, तो यह पूरी तरह संभव है.”

उनके मुताबिक़, अगर पहले से तैयार ड्रॉप-डाउन सूची नहीं दी गई तो 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है.

उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में डेटा उपयोग के लायक़ नहीं रह जाएगा.

देशपांडे का कहना है कि अगर जाति से जुड़ी जानकारी सही तरीक़े से दर्ज की जाए, तो उसे दूसरी सामाजिक और आर्थिक जानकारियों से जोड़ा जा सकता है.

उन्होंने कहा कि इन आँकड़ों को बुनियादी सुविधाओं, श्रम भागीदारी, शिक्षा, उम्र और अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ मिलाकर देखा जा सकता है.

जनगणना विभाग के लिए नई चुनौती

जनगणना संचालन के पूर्व उप महानिदेशक के. नारायणन उन्नी का कहना है कि जाति जनगणना कराने में सबसे बड़ी चुनौती पूर्व अनुभव की कमी है

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जनगणना संचालन के पूर्व उप महानिदेशक के. नारायणन उन्नी का कहना है कि जनगणना कराने में अधिकारियों को स्वाभाविक रूप से कई व्यावहारिक मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनगणना विभाग में जाति गणना का अनुभव और विशेषज्ञता कम हो गई है.

उनके मुताबिक़, कई दशकों से विभाग ने जाति गणना का काम नियमित तौर पर नहीं किया है.

उन्होंने कहा कि प्रवासन और समाज में आए बदलाव जैसी जटिल परिस्थितियाँ भी सही गणना और वर्गीकरण को मुश्किल बनाती हैं.

उन्नी के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में गणनाकर्मी ड्रॉप-डाउन सूची का इस्तेमाल करने के बजाय लोगों द्वारा बताई गई जाति को लिख रहे हैं.

उन्होंने कहा, “इस मामले में मिश्रित मॉडल अपनाया जाना चाहिए.”

उनका सुझाव है कि प्रमुख और व्यापक रूप से पहचानी जाने वाली जातियों के लिए ड्रॉप-डाउन कोड उपलब्ध कराए जाएँ.

उन्होंने कहा, “इससे ग़लतियाँ कम होंगी और दफ़्तरों पर काम का बोझ भी घटेगा.”

क्या मौजूदा जनगणना जाति की सही तस्वीर दे पाएगी.

समाजशास्त्री सुरिंदर एस. जोधका की सबसे बड़ी चिंता जनगणना की वर्तमान रूपरेखा को लेकर है.

उनका कहना है कि मौजूदा ढाँचा जाति की सार्थक गणना नहीं कर पाता.

उन्होंने कहा, “इसमें केवल जाति का नाम दर्ज किया जाता है, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों को समझने वाले सवाल और तरीक़े मौजूद नहीं हैं.”

जोधका के मुताबिक़, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने के लिए कोई नए सवाल शामिल नहीं किए गए हैं.

उन्होंने कहा कि पूरे देश में एक ही तरीक़े से जाति की गणना करना आसान नहीं है.

उनके अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों में जातियों की सामाजिक स्थिति और पदानुक्रम अलग होते हैं.

उन्होंने कहा, “एक प्रदेश में किसी जाति की जो स्थिति है, वह दूसरे प्रदेश में अलग हो सकती है.”

जोधका का यह भी मानना है कि विस्तृत जातिगत आँकड़े सामने आने पर समाज में मौजूद विशेषाधिकारों की तस्वीर भी उजागर हो सकती है.

उनके मुताबिक़, यही वजह है कि पूरी तरह और विस्तार से जाति गणना कराने को लेकर हिचकिचाहट दिखाई देती है.

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी क्यों

द प्रिंट के राजनीतिक संपादक डीके सिंह कहते हैं,

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प्रोफ़ेसर सुरिंदर एस. जोधका का कहना है कि जाति भारतीय समाज की संरचना का एक अहम संकेतक है.

वह कहते हैं, “फिर भी नौकरशाही में उदासीनता है और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है.”

उनके मुताबिक़, “सरकार ने जाति गणना करने पर सहमति तो दे दी है, लेकिन इसे करने की वास्तविक इच्छा किसी में नहीं दिखती.”

वह कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि हमें जाति की गणना करना नहीं आता.”

उनका मानना है कि जनगणना की प्रक्रिया और प्रश्नावली को समाजशास्त्रियों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों की सलाह से नए सिरे से तैयार करने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, “लेकिन ऐसा कोई नहीं कर रहा.”

द प्रिंट के राजनीतिक संपादक डीके सिंह इस बहस को एक अलग नज़रिए से देखते हैं.

उनका कहना है कि सिर्फ़ सरकार में ही नहीं, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में भी झिझक दिखाई दे रही है.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “शुरुआत में कांग्रेस ने राजनीतिक मजबूरी में जाति जनगणना की मांग उठाई थी.”

उनके मुताबिक़, “कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक काफ़ी पहले क्षेत्रीय दलों की ओर खिसक चुका था. वहीं भाजपा अब केवल ब्राह्मण और बनिया समुदायों की पार्टी नहीं रह गई है.”

उन्होंने कहा कि ऊँची जातियों के साथ-साथ ओबीसी और दलित समुदाय के एक हिस्से का समर्थन भी भाजपा को मिलने लगा. ख़ासकर 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद.

डीके सिंह कहते हैं, “कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही थी और उसके पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं दिख रही थी.”

उनके मुताबिक़, 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने जाति जनगणना को चुनावी मुद्दा बनाना शुरू किया.

कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद उन्होंने इस मांग को और ज़ोर से उठाया.

हालाँकि उसी साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. लेकिन तेलंगाना में उसे जीत मिली.

सिंह का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हुए झटके ने राहुल गांधी का भरोसा और बढ़ाया कि जाति जनगणना राजनीतिक रूप से फ़ायदेमंद मुद्दा हो सकती है.

लेकिन इसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा.

उनके मुताबिक़, इससे राहुल गांधी का भरोसा इस मुद्दे पर कुछ कमज़ोर पड़ा है.

डीके सिंह कहते हैं, “अब राहुल गांधी जाति जनगणना की बात सिर्फ़ औपचारिक तौर पर करते हैं.”

उन्होंने कहा, “जब सरकार ने जनगणना के सवाल जारी किए और जाति से जुड़ा सवाल खुला छोड़ दिया, तब कांग्रेस की प्रतिक्रिया काफ़ी हल्की रही.”

उन्होंने कहा, “योगेंद्र यादव ने इसे जाति जनगणना का अंतिम संस्कार बताया था. लेकिन कांग्रेस ने उतने ज़ोरदार तरीके से विरोध नहीं किया.”

सिंह का मानना है कि राहुल गांधी इस मुद्दे पर इसलिए भी ज़्यादा नहीं बोल रहे क्योंकि युवाओं के बीच यह नारा उतना असरदार नहीं दिख रहा.

हालांकि, हाल ही में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री को जाति जनगणना के मुद्दे पर खुला पत्र लिखा है.

इस साझा पत्र में उन्होंने केंद्र सरकार की जाति जनगणना के मौजूदा फॉर्मेट को ‘भ्रामक’ बताया है और इसे तुरंत रद्द करने की मांग की है‌.

25 अगस्त 2026 को कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश द्वारा सार्वजनिक किए गए इस पत्र में दोनों नेताओं ने चेतावनी दी है कि वर्तमान तरीके से की जाने वाली गणना से जातियों का गलत डेटा सामने आएगा, जिससे सामाजिक न्याय की नीतियां प्रभावित होंगी‌.

इस पत्र में ड्रॉप डाउन सूची की मांग भी की गई है ताकि लोग अपनी सही और सूचीबद्ध जाति का ही चयन कर सकें.

पत्र में बिहार और तेलंगाना मॉडल पर जाति जनगणना करने का भी सुझाव दिया गया है.

जाति जनगणना पर ज़ोर कांग्रेस को पहुंचा सकता है नुक़सान?

डीके सिंह कहते हैं, “जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन आकांक्षाओं और रोज़गार जैसे आर्थिक मुद्दों से जुड़े थे. वे जाति जनगणना के लिए नहीं थे.”

उनके मुताबिक़, शहरी और ग्रामीण इलाक़ों के युवा मध्यम वर्गीय आकांक्षाओं और आर्थिक चिंताओं से ज़्यादा प्रभावित हैं.

सिंह का कहना है कि कांग्रेस को भाजपा के ऊँची जाति वाले वोट बैंक में भी कुछ संभावनाएँ दिखाई दे रही हैं.

उन्होंने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का उदाहरण दिया.

उन्होंने कहा, “बांकीपुर विधानसभा में लगभग 1.60 लाख ऊँची जाति के मतदाता थे. लेकिन भाजपा उम्मीदवार को 45 हज़ार वोट भी नहीं मिले.”

उनके मुताबिक़, अगर कांग्रेस जाति जनगणना पर ज़्यादा ज़ोर देगी तो ऐसे मतदाता उससे दूर रह सकते हैं.

डीके सिंह को 29 अप्रैल 2025 की एक घटना भी याद है.

उन्होंने कहा कि उस दिन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की थी.

इसके अगले दिन राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने 2027 की जनगणना में जाति गणना शामिल करने का फ़ैसला किया.

डीके सिंह के मुताबिक़, उस समय पार्टी के कई नेता भी इस फ़ैसले से हैरान थे.

उन्होंने कहा, “यह फ़ैसला पार्टी नेताओं के लिए भी चौंकाने वाला था.”

डीके सिंह का कहना है कि इसके बाद से पार्टी इस मुद्दे पर पीछे हटने की कोशिश करती दिखाई दे रही है.

उन्होंने कहा, “अब पार्टी के पास एक नया फ़ॉर्मूला है.”

उनके मुताबिक़, पार्टी ‘पेंडोरा बॉक्स’ खोलने से बचना चाहती है.

उन्होंने कहा, “उसे लगता है कि इससे ऐसे नतीजे सामने आ सकते हैं जिनका अनुमान लगाना मुश्किल होगा.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS