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तिब्बत में बाढ़ से तबाही कितनी हुई है, जानिए वहाँ क्यों हैं इतनी ख़ामोशी

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Source :- BBC INDIA

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

इन दृश्यों को नज़रअंदाज़ करना लगभग नामुमकिन था.

पानी का तेज़ बहाव नेपाल और तिब्बत के बीच मुख्य सीमा चौकियों में से एक ग्यिरोंग पोर्ट से होकर गुज़र रहा था और अपने रास्ते में सब कुछ बहा ले जा रहा था.

दूसरी तरफ़ सैकड़ों लोग अपनी जान बचाने के लिए बेतहाशा भाग रहे थे.

सीसीटीवी कैमरों में क़ैद ये दृश्य तेज़ी से सोशल मीडिया और दुनिया भर की स्क्रीन पर पहुँच गए.

लेकिन चीन में ऐसा नहीं हुआ.

अब तक देश के सरकारी मुख्य समाचार बुलेटिन में इन दृश्यों की सिर्फ़ एक तस्वीर प्रसारित की गई है.

चीन के भारी सेंसर वाले इंटरनेट पर भी इस वीडियो को ढूंढना मुश्किल रहा है. बुधवार से आई इस अचानक बाढ़ में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और इतने ही लोग अब भी लापता हैं, लेकिन इस बाढ़ का ज़िक्र करने वाली पोस्ट ढूंढना भी उतना ही मुश्किल है.

बीजिंग ने सैकड़ों आपातकालीन कर्मचारियों को शामिल करते हुए बड़े पैमाने पर बचाव अभियान शुरू किया है, जो अब भी जारी है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी अधिकारियों के साथ आपात बैठक की अध्यक्षता कर राहत और बचाव कोशिशों के समन्वय की समीक्षा की.

लेकिन जब इन दिनों दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में इंटरनेट पर सामने आ रही सामग्री की तुलना चीन में उपलब्ध सामग्री से की जाती है, तो चीन का इंटरनेट फायरवॉल पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देता है.

तिब्बत, जिसे बीजिंग ने 1950 के दशक में अपने नियंत्रण में ले लिया था, लंबे समय से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का विरोध करता रहा था.

चीन ने वर्षों से विरोध प्रदर्शनों को दबाया है, कई बार हिंसक तरीक़े से भी और उस पर इस बौद्ध क्षेत्र में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप लगते रहे हैं. उसने निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को अलगाववादी क़रार दिया है.

इस इतिहास का मतलब है कि तिब्बत नाम भर से चीन के सेंसर सक्रिय हो जाते हैं. ऐसे समय में बीजिंग की संवेदनशीलता और भी स्पष्ट दिखाई देती है.

मृतकों और लापता लोगों की संख्या को लेकर रोजाना अपडेट जारी किए गए हैं. बीजिंग बचाव अभियानों और उस बैराज झील से पैदा हुए ख़तरे को लेकर भी अपडेट दे रहा है, जिसके पानी से भरकर बाहर निकलने का ख़तरा बना हुआ है.

लेकिन इसके अलावा ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. तिब्बत में बचे लोगों के आपबीती सामने नहीं आई है और न ही बाढ़ के भयावह क्षणों या उसके बाद के हालात को दिखाने वाले बनाए गए वीडियो देखने को मिल रहे हैं.

लापता लोगों के चिंतित परिवारों की आवाज़ भी अभी सुनाई नहीं दी है. सामान्य समय में भी वहाँ लोगों से संपर्क करना लगभग असंभव होता है.

उत्तर कोरिया को कवर करने वाले एक पत्रकार के तौर पर, मेरे लिए प्योंगयांग में इंटरव्यू देने वाले लोगों से संपर्क करना भी कई बार तिब्बत की राजधानी ल्हासा में लोगों से संपर्क करने की तुलना में आसान रहा है.

सीसीटीवी फुटेज में तिब्बत के ग्यिरोंग में कीचड़ और पानी से इमारतें नष्ट होते देख लोग भागते हुए दिखाई दे रहे हैं.

इमेज स्रोत, Reuters

गुरुवार रात, जब दुनिया भर की सुर्खियों में हिमालय की एक घाटी में हुई तबाही छाई हुई थी, चीन के सरकारी प्रसारक ने अपने मुख्य बुलेटिन की शुरुआत शी जिनपिंग की नई किताब के लॉन्च से की. यह किताब उनके सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक कार्यों का संकलन है.

विदेशी पत्रकार बिना सरकारी अनुमति के तिब्बत की यात्रा नहीं कर सकते. इस तरह की बड़ी ख़बरों में हमारे पास वीडियो हटाए जाने और लोगों की आवाज़ दबा दिए जाने से पहले ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटाने के लिए केवल कुछ घंटे होते हैं.

इसके बजाय, हमें सरकारी मीडिया पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसने अब तक बेहद नाटकीय बचाव अभियानों पर ध्यान केंद्रित किया है.

विशेषज्ञ बचाव दल पहाड़ों और खड़ी चट्टानों पर चढ़ रहे हैं, या उफनती नदियों को पार कर सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन हमें अभी यह पता नहीं है कि उसके बाद क्या हुआ या वे कितने लोगों को बचाने में सफल रहे.

इसका मतलब यह नहीं है कि बीजिंग इस घटना को लेकर चिंतित नहीं है. बल्कि वह बेहद चिंतित है.

चीन के प्रधानमंत्री ली चियांग को तुरंत इस इलाक़े में भेजा गया, जहाँ उन्हें मलबा हटाने के काम का निरीक्षण करते देखा गया. इतनी बड़ी आपदा के तुरंत बाद देश के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता का इस तरह दौरा करना दुर्लभ है.

दुनिया को जो प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत धीमी या सीमित नज़र आ सकती है, उसकी वजह उस एक चीज़ को बचाए रखना है, जिसे शी अपने देश के लिए सबसे ज़्यादा चाहते हैं: स्थिरता.

कम्युनिस्ट पार्टी को डर होगा कि ऐसी आपदा से लोगों में असंतोष पैदा हो सकता है, चाहे वह राहत और बचाव कार्यों को लेकर हो या इस बात को लेकर कि आपदा को रोकने के लिए पहले से पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं की गई.

उसे यह भी डर हो सकता है कि इस तरह की त्रासदी का क्या असर पड़ेगा और यह लोगों को एकजुट करने का कारण बन सकती है, ख़ासकर ऐसे समुदाय में जहाँ लंबे समय से आस्था की केंद्रीय भूमिका रही है.

हालांकि इस क्षेत्र में लंबे समय से कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ है, लेकिन विदेशों में रह रहे तिब्बती समूहों ने चीन के बढ़ते नियंत्रण को लेकर चिंता जताई है. इनमें शिक्षा से जुड़े नए क़ानून भी शामिल हैं, जिनके बारे में उनका कहना है कि इनका मक़सद मठों और बौद्ध धर्म की भूमिका को कमज़ोर करना है.

आपदा आने के कुछ ही घंटों बाद, कम्युनिस्ट पार्टी के तंत्र ने भूस्खलन से निपटने के सरकार के तरीक़े को लेकर असंतोष के किसी भी संकेत को रोकने के लिए अपने ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया.

तिब्बत के शिगात्से में विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के बाद बचावकर्मी अभियान चला रहे हैं

इमेज स्रोत, Gongga Laisong/China News Service/VCG via Getty Images

स्थानीय पार्टी कार्यालय की ओर से जारी एक नोटिस में सदस्यों से अपने-अपने इलाक़ों में राहत और बचाव प्रयासों में बढ़-चढ़कर मदद करने और प्रभावित लोगों को भावनात्मक मार्गदर्शन या मनोवैज्ञानिक सहायता देने का आग्रह किया गया.

इसमें मुख्य निर्देश था कि वे “आपदा प्रभावित इलाक़ों में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने और स्थिरता के साथ जनता के विश्वास को सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करें.” अच्छा प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत किया जाएगा, जबकि ख़राब प्रदर्शन करने वालों को “जवाबदेह ठहराया जाएगा.”

यह ऐसी चेतावनी है जिसे हल्के में नहीं लिया जाएगा. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस क्षेत्र में तिब्बतियों को पत्रकारों से बात करने या ऑनलाइन ऐसी कोई सामग्री पोस्ट करने के लिए हिरासत में लिया जा सकता है या गिरफ़्तार किया जा सकता है, जिसे सरकार के आधिकारिक नैरेटिव के विपरीत माना जाए.

इस वजह से क्षेत्र से बाहर रहने वाले तिब्बतियों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो रहा है कि उनके रिश्तेदारों के साथ क्या हुआ है.

इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत ने इलाक़े में राहत और बचावकर्मियों के काम की सराहना करते हुए कहा कि बीजिंग सोशल मीडिया से वीडियो और अन्य प्रत्यक्ष जानकारी हटा रहा है. संगठन ने चीनी अधिकारियों से “नुक़सान और हताहतों के बारे में पूरी और सत्यापन योग्य जानकारी सार्वजनिक करने” की अपील की.

तिब्बतियों का जीवन कैसा है, इसे समझने के लिए बीबीसी ने पिछले साल हिमालयी पठार के किनारे बसे एक कस्बे की यात्रा की थी, जो चीन के अनुसार, तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के ठीक बाहर है.

वहां हमने अबा, जिसे तिब्बती भाषा में नगाबा कहा जाता है, स्थित किर्ती मठ के भिक्षुओं से बात की थी. यह मठ कभी बीजिंग के ख़िलाफ़ तिब्बती प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र था. एक भिक्षु ने हमें बताया, “हम तिब्बतियों को बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित रखा जाता है.”

उन्होंने कहा कि वे लगातार निगरानी में रहते हैं और आरोप लगाया कि चीनी सरकार तिब्बतियों का दमन और उत्पीड़न करती है. बातचीत बहुत संक्षिप्त रखनी पड़ी, क्योंकि हमें लंबे समय तक किसी से बात करते हुए नहीं देखा जा सकता था.

बीजिंग इस बात से इनकार करता है कि वह तिब्बतियों के अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है. उसका कहना है कि उसने पर्यटन को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र को देश के बाक़ी हिस्सों के साथ जोड़ने के लिए वहां बड़े पैमाने पर निवेश किया है.

फिर भी, इस समय चीन में लोगों को तिब्बत में वास्तव में क्या हो रहा है, इसकी बहुत कम जानकारी होगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS