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कश्मीरी पंडित रूबन सप्रू को जब इस महीने की शुरुआत में उनके एक दोस्त ने बताया कि उनके समुदाय के ख़िलाफ़ फिर से एक धमकी भरी चिट्ठी जारी हुई है, तो उन्होंने अपना सामान पैक किया और कश्मीर से चले गए.
रूबन सप्रू घाटी में एक ‘कश्मीरी पंडित टाउनशिप’ में रहते हैं, लेकिन उन्होंने अपनी जान को ख़तरा बताते हुए अपने मौजूदा ठिकाने के बारे में जानकारी नहीं दी है.
साल 2022 में राजस्व विभाग में कार्यरत प्रवासी कश्मीरी पंडित राहुल भट्ट की दिनदहाड़े संदिग्ध चरमपंथियों द्वारा हत्या का ज़िक्र करते हुए सप्रू ने कहा, “अगर एक बार ऐसा हो सकता है, तो दोबारा भी हो सकता है.”
सप्रू उन सैकड़ों प्रवासी पंडित सरकारी कर्मचारियों में से एक हैं, जिन्होंने डर के कारण काम पर जाना बंद कर दिया है.
इनमें से कुछ कर्मचारी जम्मू चले गए हैं, जबकि कुछ अन्य छिपकर रहने के लिए मजबूर हो गए हैं. चिट्ठी में उन्हें ‘अपने तौर-तरीक़े बदलने’ की चेतावनी दी गई है.
एक कश्मीरी पंडित कर्मचारी ने दावा किया कि यह चिट्ठी टेलीग्राम ऐप के जरिए जारी की गई.
बीबीसी अब तक इस चिट्ठी की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं कर पाया है.
हमने जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक नलिन प्रभात और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (साइबर) से प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया है. जवाब मिलने पर इस ख़बर को अपडेट किया जाएगा.
चिट्ठी में क्या कहा गया है?

यह चिट्ठी अब तक अज्ञात रहे चरमपंथी संगठन ‘यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल’ के ‘मीडिया समन्वयक’ अहमद बिलाल के नाम से जारी की गई है.
यह संगठन पहली बार इसी साल जुलाई में चर्चा में आया था, जब उसने प्रतिबंधित संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के पूर्व कमांडर बुरहान वानी की 10वीं पुण्यतिथि पर कुछ पोस्टर जारी किए थे.
इस संगठन ने आरोप लगाया है कि कश्मीर में तैनात पंडित कर्मचारियों को ‘नई दिल्ली का समर्थन प्राप्त है’, और वे स्थानीय लोगों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं.
इस चिट्ठी में कथित तौर पर कश्मीरी “रेजिस्टेंस सपोर्टर्स एंड फ़ाइटर्स” के उत्पीड़न और उनकी संपत्तियों की ज़ब्ती का आरोप लगाया गया है.
प्रशासन ने हाल के महीनों में उन सैकड़ों कश्मीरी परिवारों की संपत्तियां ज़ब्त की हैं, जिनके किसी परिजन पर मादक पदार्थों के कारोबार और चरमपंथ से संबंध रखने के आरोप हैं.
चिट्ठी में राजस्व विभाग के पंडित कर्मचारियों का ज़िक्र करते हुए कहा गया है, “हमारे पास उनके परिवार के सदस्यों और उनके ठिकानों सहित पूरी जानकारी है. इस बार वे जम्मू में भी नहीं छिप सकेंगे, क्योंकि ज़रूरत पड़ने पर हम उनका वहां भी पीछा करेंगे. ‘वर्क फ़्रॉम होम’ का बहाना अब नहीं चलेगा.”
चिट्ठी से कश्मीरी पंडितों में फैला डर

इस चिट्ठी के जारी होने के बाद घबराए हुए सैकड़ों पंडित कर्मचारी या तो छिप गए हैं या जम्मू चले गए हैं, जबकि पुलिस और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का प्रशासन इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है.
केंद्र सरकार के एक विशेष पैकेज के तहत सरकारी नौकरी पाने वाले लगभग 9,000 प्रवासी कश्मीरी पंडित कर्मचारी कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में होटलों, निजी अपार्टमेंट और सरकारी टाउनशिप में रहते हैं.
बीबीसी ने कम से कम तीन ऐसे कर्मचारियों से बात की, जिन्होंने दावा किया कि वे अपनी सुरक्षा के लिए कश्मीर में अपने मूल निवास स्थानों से हटकर ‘सुरक्षित स्थानों’ पर चले गए हैं और डर के कारण दफ़्तर नहीं जा रहे हैं.
इन कर्मचारियों में से दो ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर फ़ोन पर बात की.
उनका कहना है कि उनके विभागों ने मौखिक रूप से उन्हें कम से कम स्वतंत्रता दिवस समारोहों की समाप्ति तक छुट्टी पर रहने का निर्देश दिया है.
इनमें से एक कर्मचारी ने कहा, “मुझे पुलिस अधिकारियों और अन्य चिंतित लोगों के बहुत सारे फ़ोन आते हैं. वे यह जानना चाहते हैं कि मैं ठीक हूं या नहीं. मुझे नहीं पता कि हालात कब बेहतर होंगे और कब हम ड्यूटी पर वापस जा सकेंगे.”
इन कर्मचारियों का कहना है कि प्रशासन ने उनकी ड्यूटी व्यवस्था में बदलाव की कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं की है.
दक्षिण कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की एक टाउनशिप में रहने वाले एक कर्मचारी ने कहा, “ऐसे आदेश राजनीतिक विवाद का कारण बन जाते हैं और बीजेपी सरकार खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहती.”
एक अन्य युवा कश्मीरी पंडित कर्मचारी ने बताया कि उनके माता-पिता उनकी सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं.
वे दोनों 1990 के दशक में हुए बड़े पैमाने पर पलायन के दौरान जम्मू चले गए थे.
इस युवा कश्मीरी पंडित ने कहा कि वह नौकरी छोड़कर निजी क्षेत्र में जाने पर विचार कर रहे हैं.
युवक ने बताया, “किसी को नहीं पता कि कल क्या होने वाला है. मैं बहुत डरा हुआ हूं. मैं पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना काम कर रहा था और मुझे समझ नहीं आता कि आख़िर मैं दुश्मन कैसे बन गया.”
दो हमले और बढ़ता ख़तरा
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यह धमकी भरी चिट्ठी दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और कुलगाम ज़िलों में हुए दो हमलों में जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक हेड कॉन्स्टेबल और छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मज़दूरों की हत्या के दो हफ्ते से भी कम समय में सामने आई है.
यह चिट्ठी 2021-2022 की दर्दनाक घटनाओं की याद दिलाती है, जब ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने कश्मीरी पंडितों, प्रवासी मज़दूरों और कुछ पत्रकारों को भी इसी तरह की धमकियां दी थीं.
ये एक प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन है जिसे सुरक्षा एजेंसियां लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी मानती हैं. उन धमकियों के बाद अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के कई लोगों और प्रवासी मज़दूरों की हत्या कर दी गई थी.
मारे गए लोगों में श्रीनगर के जाने-माने कश्मीरी पंडित माखन लाल बिंद्रू भी शामिल थे, जिनकी फ़ार्मेसी अच्छी गुणवत्ता वाली दवाओं के लिए कश्मीर में बहुत मशहूर थी.
बीबीसी को पता चला है कि प्रशासन ने कश्मीर के सभी पुलिस स्टेशनों को मौखिक निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि 2021 जैसी स्थिति को दोबारा होने से रोकने के लिए उनके इलाक़े में पंजीकृत प्रवासी मज़दूर सूरज डूबने से पहले अपने रहने की जगहों पर लौट जाएं.
उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के रहने वाले नाई आरिफ़ अहमद ने बीबीसी को बताया कि अनंतनाग में पुलिस हेड कॉन्स्टेबल की हत्या के अगले दिन स्थानीय पुलिस स्टेशन के कुछ पुलिसकर्मियों ने उन्हें मौखिक रूप से शाम 6 बजे से पहले अपनी दुकान बंद करने का निर्देश दिया.
मध्य कश्मीर के बडगाम ज़िले में एक सस्ता सैलून चलाने वाले अहमद ने कहा, “मुझे उनकी बात माननी ही पड़ी, वरना पुलिस स्टेशन से बुलावा आ जाएगा. ग्राहक आम तौर पर शाम को शेव या बाल कटवाने आते हैं, लेकिन हमारे हाथ में कुछ नहीं है. हम क्या ही कर सकते हैं?”
जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के सबसे बड़े बाज़ार ‘लाल चौक’ में सैकड़ों प्रवासी मज़दूर भुनी हुई मूंगफली से लेकर ताज़े जूस तक बेचकर अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं.
12 अगस्त की शाम श्रीनगर में मौसम साफ़ था और सूरज पीर पंजाल की पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा.
एक युवा प्रवासी मज़दूर पैरामिलिट्री जवानों की टुकड़ी के पुकारे जाने के बाद भागने लगा.
झारखंड के इस युवक ने अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त बताया, “हमें शाम 6 बजे से पहले काम समेटने के लिए कहा गया है, लेकिन पहले ही 7 बज चुके हैं. मैं एक बार पुलिस स्टेशन जा चुका हूँ. मैं दोबारा वहां जाकर समय बर्बाद नहीं करना चाहता,”
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि हालात सुधारने के लिए ‘एरिया डोमिनेशन एक्सरसाइज’ के तहत श्रीनगर और अन्य जगहों पर सड़कों पर केंद्रीय अर्धसैनिक बल, बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ़) समेत अन्य सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं.
सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने का यह कदम आने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोहों को ध्यान में रखकर उठाया गया है.
पुलिस अधिकारी ने कहा, “हमने संवेदनशील जगहों पर गश्त बढ़ा दी है. सुरक्षा बलों की मौजूदगी से लोगों को अपनी ज़िंदगी सामान्य रूप से जीने का भरोसा मिलता है और डर कम होता है.”
सुरक्षा व्यवस्था की विफलता
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प्रधानमंत्री के विशेष पुनर्वास पैकेज के तहत कश्मीर घाटी के अलग-अलग हिस्सों में लगभग 9,000 कश्मीरी पंडितों को सरकारी नौकरी और रहने की जगह दी गई है.
इस योजना की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2008 में की थी और बाद में 2015 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे अपग्रेड किया था.
इस पैकेज को कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की दिशा में एक अहम कदम माना जाता है. 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में हिंसा शुरू होने के बाद पंडितों को जम्मू और देश के अन्य हिस्सों में पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा था.
मोदी सरकार ने 2015 में सत्ता में आने से पहले अपने चुनाव अभियान में कश्मीर में पंडितों के पुनर्वास को एक अहम मुद्दा बताया था.
गृह मंत्री अमित शाह समेत बीजेपी सरकार ने बार-बार कहा है कि अनुच्छेद 370 हटाने से कश्मीर में चरमपंथ ख़त्म हो गया है. हिंसा के फिर से शुरू होने और उस पर सरकार की प्रतिक्रिया ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
एक कश्मीरी पंडित कर्मचारी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि सरकार ऐसे मामले रोकने में बेबस दिखाई दे रही है.
जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा, “अमित शाह ने संसद में कहा था कि अनुच्छेद 370 हटाने से जम्मू-कश्मीर चरमपंथ से मुक्त हो जाएगा और हमारे विस्थापित समुदाय के लिए एक सुरक्षित जगह बनेगी.”
“फिर भी आज 2026 में उसी समुदाय के सरकारी कर्मचारियों से एक बार फिर कहा जा रहा है कि वे अपनी जान को ख़तरा होने के कारण अपने काम की जगहों से दूर रहें.”
उन्होंने आगे कहा, “केंद्र सरकार और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का प्रशासन, जो जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहा है, दोनों बातें एक साथ नहीं कर सकता. वे एक तरफ़ तो प्रेस ब्रीफिंग में आतंकवाद पर जीत का दावा नहीं कर सकते और दूसरी तरफ़ किसी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए डर पैदा करने वाली काम से जुड़ी पाबंदियां भी नहीं लगा सकते.”
जम्मू-कश्मीर के कुलगाम विधानसभा क्षेत्र से विधायक और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीएम) के नेता मोहम्मद यूसुफ़ तारिगामी ने कश्मीरी पंडितों को दी गई धमकियों की निंदा की है.
उन्होंने कहा, “ये धमकियां कश्मीर की सबको साथ लेकर चलने और मिल-जुलकर रहने की परंपरा पर हमला हैं. राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर इनकी साफ़ तौर पर निंदा की जानी चाहिए.”
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