Source :- LIVE HINDUSTAN
भारत में PayPal, Oracle और फॉक्सवैगन (Volkswagen) जैसी बड़ी कंपनियों में छंटनी की खबरों के बीच कर्मचारियों को मिलने वाले सेवरेंस पैकेज (Severance Package) यानी नौकरी खत्म होने पर मिलने वाले मुआवजे पर भी चर्चा तेज हो गई है। PayPal ने भारत में करीब 220 नौकरियों में कटौती की है, जबकि ओरेकल (Oracle) में करीब 3,000 कर्मचारियों तक पर छंटनी का असर पड़ने की रिपोर्ट है। फॉक्सवैगन ग्रुप (Volkswagen Group) की भारतीय यूनिट भी अपने कर्मचारियों की संख्या में करीब 12% कटौती करने की योजना बना रही है। ऐसे समय में सेवरेंस पे (Severance Pay) नौकरी जाने के बाद कुछ समय के लिए आर्थिक सहारा जरूर देता है, लेकिन इस रकम पर टैक्स का नियम समझना भी बेहद जरूरी है।
भारत में सामान्य तौर पर नौकरी खत्म होने या रोजगार की शर्तों में बदलाव के कारण नियोक्ता या पूर्व नियोक्ता से मिलने वाला मुआवजा ‘Profits in lieu of salary’ यानी वेतन के बदले मिले लाभ के रूप में माना जा सकता है। ऐसी रकम आमतौर पर सैलरी हेड के तहत कर्मचारी की लागू इनकम टैक्स स्लैब रेट (Income Tax Slab Rate) के अनुसार टैक्स के दायरे में आती है। हालांकि, हर तरह के सेवरेंस पेमेंट (Severance Payment) पर एक जैसा टैक्स नहीं लगता। कुछ परिस्थितियों में कानून के तहत छूट भी मिल सकती है। उदाहरण के लिए, लागू श्रम कानूनों के तहत पात्र ‘वर्कमैन’ को दिया गया छंटनी मुआवज़ा – आयकर अधिनियम (Retrenchment Compensation Income Tax Act) की सेक्शन 10(10B) के तहत निर्धारित शर्तों के अधीन टैक्स छूट के योग्य हो सकता है।
इसके अलावा VRS (Voluntary Retirement Scheme) या वॉलंट्री सेपरेशन स्कीम (Voluntary Separation Scheme) के तहत मिलने वाली रकम पर सेक्शन 10(10C) के तहत अलग छूट का प्रावधान है। इसके तहत पात्र कर्मचारी को अधिकतम ₹5 लाख तक की छूट मिल सकती है और निर्धारित सीमा से अधिक रकम टैक्स योग्य हो सकती है। वहीं, नौकरी खत्म होने या रोजगार की शर्तों में बदलाव से जुड़ी ऐसी दूसरी कंपनसेशन, जो सैलरी हेड में खास रूप से शामिल नहीं होती, परिस्थितियों के अनुसार इनकम फ्रॉम अदर सोर्स के तहत टैक्स योग्य हो सकती है। इसलिए केवल भुगतान को ‘सेवरेंस’ या ‘कंपनसेशन’ नाम देने से उसका टैक्स ट्रीटमेंट तय नहीं होता।
ITR भरते समय सेवरेंस पे (Severance Pay) को सही तरीके से रिपोर्ट करना भी जरूरी है। टैक्स एक्सपर्ट के मुताबिक कर्मचारी को सबसे पहले कंपनी से फुल & फाइनल सेटलमेंट स्टेटमेंट और फॉर्म 16 लेना चाहिए और देखना चाहिए कि कंपनी ने सेवरेंस पेमेंट को किस तरह कैटेगराइज किया है, जो हिस्सा टैक्स योग्य है, उसे आमतौर पर ITR में इनकम फ्रॉम सैलरी के तहत दिखाना होता है, जबकि पात्र टैक्स छूट अलग से क्लेम की जा सकती है। इसके साथ फॉर्म 26AS, AIS और TDS की जानकारी को भी मिलाना जरूरी है, ताकि रिटर्न में कोई अंतर न रहे।
फुल एंड फाइनल सेटलमेंट में केवल सेवरेंस ही नहीं, बल्कि सैलरी एरियर्स, ग्रेच्युटी और अन्य भुगतान भी शामिल हो सकते हैं और हर घटक का टैक्स नियम अलग हो सकता है। सैलरी एरियर्स सामान्य तौर पर सैलरी के रूप में टैक्स योग्य होते हैं और पात्रता होने पर सेक्शन 89 के तहत राहत मिल सकती है। ग्रेच्युटी (Gratuity) को भी निर्धारित शर्तों और लागू सीमा के अधीन टैक्स छूट मिल सकती है। इसलिए नौकरी छोड़ते समय मिलने वाले पूरे पैकेज को एक ही रकम मानकर टैक्स की कैलकुलेशन नहीं करनी चाहिए।
कर्मचारियों को टर्मिनेशन या रिट्रेंचमेंट लेटर, इम्पलॉयमेंट एग्रीमेंट, सेपरेशन स्कीम, सेटलमेंट स्टेटमेंट, सेवा अवधि का प्रमाण, सैलरी कैलकुलेशन, एगजेम्पशन कैलकुलेशन (Exemption Calculation) और TDS से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। खास तौर पर सेक्शन 89 की राहत उपलब्ध होने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार फॉर्म 10E दाखिल करना जरूरी हो सकता है, यानी फुल एंड फाइनल सेटलमेंट का नाम नहीं, बल्कि उसमें शामिल प्रत्येक भुगतान की प्रकृति तय करती है कि उस पर कितना टैक्स लगेगा और कौन-सी छूट मिल सकती है।
SOURCE : LIVE HINDUSTAN




