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केंद्र सरकार देश में वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है। पेट्रोल में एथेनॉल के बाद अब सरकार डीजल में 15% तक आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol) मिलाने की अनुमति देने की तैयारी कर रही है। यह जानकारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने दी है।
क्या कहा केंद्रीय मंत्री ने?
केंद्रीय मंत्री गडकरी ने बताया कि सरकार आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की कोशिशें तेज कर रही है और इसी के तहत वह अपने बायोफ्यूल प्रोग्राम के अगले चरण की तैयारी कर रही है। गडकरी ने कहा कि एथेनॉल को सीधे डीजल में नहीं मिलाया जा सकता, इसलिए सरकार एथेनॉल से आइसोब्यूटेनॉल बनाने की तकनीक पर काम कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि आइसोब्यूटेनॉल डीजल का विकल्प बन सकता है। सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि आइसोब्यूटेनॉल डीजल का प्रभावी विकल्प बन सकता है और इससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
गडकरी ने कहा कि इस टेक्नोलॉजी ने पायलट प्रोजेक्ट्स के दौरान अच्छे नतीजे दिए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले सालों में इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकेगा। उन्होंने कहा, “हमने 100% एथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल पर दो जेनरेटर सेट सफलतापूर्वक चलाए हैं। इससे साबित होता है कि ऐसे इंजन बनाए जा सकते हैं जो इन ईंधनों पर चल सकें।”
आइसोब्यूटेनॉल क्या है?
आइसोब्यूटेनॉल को अगली पीढ़ी का बायोफ्यूल माना जाता है। इसकी एनर्जी डेंसिटी ज्यादा है और यह मौजूदा डीजल इंजनों के साथ बेहतर ढंग से काम करता है। यह कई पारंपरिक बायोफ्यूल की तुलना में कम उत्सर्जन करता है। नीति निर्माताओं का मानना है कि इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम हो सकती है और देश में बनने वाले बायोफ्यूल की मांग बढ़ सकती है।
गडकरी का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने E20 एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे दावों का खंडन किया था। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 10 बिंदुओं में स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम वैज्ञानिक अध्ययन, वैश्विक अनुभव और नियामकीय सुरक्षा उपायों पर आधारित है। इस कार्यक्रम के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाया जाता है। मंत्रालय ने उन दावों को खारिज कर दिया कि एक लीटर एथनॉल बनाने में 10,000 लीटर पानी खर्च होता है और कहा कि एथनॉल बनाने के लिए सिर्फ वही अतिरिक्त चावल इस्तेमाल किया जाता है जो देश की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के बाद बचता है।
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