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बंटवारे का दर्द: ‘अनजान शख़्स’ के नाम लिखे ख़तों से उभरती लाहौर के एक मकान की कहानी

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Source :- BBC INDIA


लाहौर के पते पर भेजा गया पहला पत्र

इमेज स्रोत, Arif Shamim

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर, मैंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए एक डॉक्युमेंट्री बनाई थी. उसका नाम था – लेटर्स फ़्रॉम पार्टीशन

उसे बनाए 19 साल बीत चुके हैं और इन वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन क्या 1947 की पीढ़ी में विभाजन या बंटवारे का दर्द कम हुआ है?

हाल ही में, बॉलीवुड के जाने-माने निर्देशक इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ ने उपमहाद्वीप के विभाजन के दर्द, जुदाई के दुख और अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम की कहानी बयां की है.

तो क्या यह 1947 के ख़ूनी विभाजन को याद रखने वाली आखिरी पीढ़ी है? शायद यह सच हो, लेकिन मेरा अनुभव अलग है और मैं इसे इसी तरह याद रखना चाहता हूं.

इस कहानी को बताने के लिए हमें अतीत में जाना होगा, विभाजन के उस दौर में, जब लाखों जानें कुर्बान हुईं.

चलिए लाहौर चलते हैं, जहाँ अमृतसर से उजड़ कर आए मेरी अम्मी के मौसा और मेरे रिश्ते के नाना चौधरी मोहम्मद लतीफ़ को शहर के एक मिडिल क्लास इलाक़े कृष्ण नगर में एक घर अलॉट हुआ. घर का पता था – 32 पांडू स्ट्रीट.

हरकिशन दास बेदी का पहला पत्र

उन्हें वहां रहते हुए कुछ ही दिन हुए थे कि उनके पते पर एक ख़त आया. भेजने वाले ने ख़त के लिफाफे पर पता लिखा था –

To The Occupant

House No 32 Pandoo Street

Krishan Nagar, Lahore

यह ख़त हरकिशन दास बेदी ने लिखा था, जो विभाजन के दौरान इसी घर में रह रहे थे. बेदी साहब ने कुछ साल पहले ही बड़े प्यार से इस घर को बनवाया था.

उन्हें पता चला कि वापस लौटने का एकमात्र रास्ता ये है कि सरकार इसके लिए राज़ी हो. साथ ही मकान के मौजूदा मालिक की सहमति हो और वह आपको आपकी चीज़ें देने पर राज़ी हों.

इस कोशिश में हरकिशन दास बेदी लाहौर गए, लेकिन दुर्भाग्यवश चौधरी लतीफ घर पर नहीं थे, इसलिए वे अपना कोई भी सामान साथ नहीं ले जा सके.

वे वापस लौट आए और अपना पहला ख़त लिखा, जो कुछ इस तरह था-

‘मुझे लगा गड़बड़ बंद होगी और हम लाहौर में ही रहेंगे’

हरकिशन दास बेदी का लिखा एक और ख़त

तस्लीम,

मैं आपको यह ख़त एक इंसान के तौर पर लिख रहा हूँ. उम्मीद है आप यह नहीं सोचेंगे कि एक हिंदू आपको पत्र लिख रहा है. हम सबसे पहले इंसान हैं, हिंदू और मुसलमान बाद में.

मुझे पूरी उम्मीद है कि आप भी एक इंसान के तौर पर मेरे ख़त का जवाब देंगे.

मैं 17 सितंबर को कृष्णा नगर स्थित 32 पांडू स्ट्रीट स्थित अपना घर देखने गया था. वहाँ पहुँचकर मुझे पता चला कि मेरा घर किसी और को अलॉट कर दिया गया है, इसलिए मैं अपना कोई भी सामान घर से नहीं ले जा सका.

मैं बच्चों के कपड़ों का एक छोटा सा बक्सा अपने साथ ले जाना चाहता था, लेकिन सिपाही ने मुझे उसे ले जाने की अनुमति नहीं दी.. खैर, जाने दो. अब मैं अपने मतलब की बात पर आता हूँ.

मैं सनातन धर्म हाई स्कूल में अंग्रेजी और गणित का शिक्षक था. मेरे शागिर्द हिंदू, मुस्लिम और सिख थे और मेरी नज़र में उनमें कोई भेद नहीं था. आप चौधरी सिराज दीन से पूछ सकते हैं, मैंने और दीनानाथ ने उनके घर की हर तरह से रक्षा की.

वे कृष्णा नगर में नहीं रहते थे, लेकिन हमने उनके घर को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होने दिया.

स्कूल बंद था. लाहौर में बहुत अफरा-तफरी मची हुई थी. मैं अपने बच्चों के साथ छुट्टी मनाने गया था और मेरा तमाम सामान घर पर ही था. मुझे लगा था कि गड़बड़ बंद हो जाएगी. और हम लाहौर में ही रहेंगे, चाहे पाकिस्तान हो या न हो.

लेकिन कुदरत ने ऐसा होने नहीं दिया, मैं समय पर लाहौर नहीं लौट सका और मेरा सारा सामान वगैरह जाता रहा.

जिस दिन मैं अपने घर गया, मेरी किताबें, फर्नीचर और मेरा कुछ सामान वहाँ मौजूद था, मगर मैं उसे अपने साथ ना ला सका और खाली हाथ लौट आया.

ख़ैर, मैं आपको थोड़ी परेशानी दूंगा. मेरे लोहे के बक्से में कुछ बहुत अहम कागज़ात हैं…बैंक की पासबुक, डाकख़ाने की पासबुक, इंश्योरेंस पालिसियाँ, कुछ रॉयल्टी के काग़ज़ और किताबों के एग्रीमेंट्स हैं.

अगर आपको ये चीजें मेरे बक्से में मिलें, तो आपको इन्हें रजिस्टरी करवा कर ज़रूर भेज दें. लोहे के बक्से की चाबियां कांच की अलमारी में थीं, और 17 सितंबर को मैंने लोहे का बक्सा खुला हुआ पाया.

मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि डाकघर की पासबुक, रॉयल्टी के कागजात और किताबों के एग्रीमेंट्स को डाक से मेरे पते पर भेज दें.

कृपया बीमा कंपनी की पॉलिसी साथ में भेजें, और बॉक्स में मेरे घर का रजिस्ट्री और दो रजिस्ट्री रखी हैं. ये सभी मेरे लिए बहुत अहम दस्तावेज़ हैं.

आशा है आप ये सब चीज़ें भेजने की कृपा करेंगे. आप देख सकते हैं कि ये कागज़ात मेरे लिए कितने क़ीमती हैं. मैं क्या लिखूँ? मैं बेघर हूँ, मेरे पास पैसे नहीं हैं, और मेरी नौकरी चली गई है, मैं कुछ नहीं कर सकता. मुझे नहीं पता कि मेरा बाक़ी ज़िंदगी कैसे गुजरेगी.

आपकी मदद से मेरी मुश्किलें कुछ हद तक कम हो सकती हैं. आपके लिए ये महज कागज़ात होंगे, लेकिन मेरे लिए ये ज़िंदगी का सहारा हैं. इस मानवीय संबंध और भाईचारे के नाम पर मैं आपसे मदद का अनुरोध करता हूँ.

मेरी लाइब्रेरी में बहुत सारी किताबें हैं. आप उन्हें एक बोरी में डालकर स्टोर में रख सकते हैं. हालात सुधरते ही मैं आकर उन्हें ले जाऊँगा. जिन चीज़ों की आपको ज़रूरत नहीं है, उन्हें भी एक बोरी में डाल दीजिए. आप बर्तन और फर्नीचर इस्तेमाल कर सकते हैं.

मेरी लाइब्रेरी में कई पुरानी और नायाब किताबें हैं. कृपया उन्हें भी एक बोरी में सुरक्षित रख लें. हालात सुधरते ही मैं उन्हें वापस ले लूंगा.

अगर आपको होशियारपुर या जालंधर से कोई काम करवाना हो या कुछ ऑर्डर करना हो, तो मुझे ज़रूर लिखें, मुझे आपके लिए वह काम करने में ख़ुशी होगी.

मैं ख़ुद से दुआ करता हूं कि हालात बेहतर हो जाएं..और हम हिंदू और मुसलमान भारत और पाकिस्तान में अमन और सुकून के साथ ज़िंदगी गुज़ार सकें.

आपका शुभचिंतक

हरकिशन दास बेदी, बी.ए, बी.टी

मार्फ़त पंजाब बुकस्टोर, माई हीरा गेट, जालंधर शहर

पांडू स्ट्रीट पर चौधरी लतीफ़ और हरकिशन दास बेदी का घर अब मौजूद नहीं है. उसकी जगह पर एक नई इमारत बन गई है.

इमेज स्रोत, Arif Shamim

इस ख़त के जवाब में चौधरी लतीफ़ ने भी उन्हें एक पत्र लिखा था. मैंने उस पत्र की खोज में भारत में अमृतसर, जालंधर और दिल्ली की यात्रा की, लेकिन चौधरी लतीफ़ का कोई पत्र नहीं मिला. मुझे उनके किसी वंशज का भी पता नहीं चला.

मेरे पास बस एक ही सुराग था. जालंधर बुक डिपो, माई हीरा गेट, जालंधर.

इसके अलावा मुझे कुछ नहीं पता था. मुझे यह भी डर था कि आधी सदी बाद भी यह एक किताबों की दुकान ही रहेगी, लेकिन मेरा इरादा पक्का था.

सौभाग्यवश, दुकान मिल गई और यह भी पता चला कि हरकिशन दास बेदी का देहांत हो चुका है, लेकिन चौधरी लतीफ़ के पत्रों का कोई सुराग नहीं मिला.

इसका कारण आपको बाद में पता चलेगा, लेकिन चौधरी लतीफ़ के पत्रों का जवाब ज़रूर मिलता था.

पढ़िए हरकिशन दास बेदी का लिखा एक और ख़त –

ख़त

जालंधर शहर

जनाब मुहम्मद लतीफ साहब,

अदाब,

मुझे आपका नवाज़िश-नामा मिला. मैंने आपके ख़त को दो-तीन दफ़ा पढ़ा. और पढ़कर यह महसूस किया कि यह ख़त मुझे एक सच्चे रफ़ीक़ की तरफ़ से मिला है.

मैंने आपके लिखे हुए ख़त को कई दोस्तों को पढ़कर सुनाया, और सभी ने यही कहा कि अगर सभी हिंदू और मुसलमान वही भावनाएँ रखते जो आपने अपने पत्र में व्यक्त की हैं, तो भारत में यह ख़ूनख़राबा कभी नहीं होता. और हम, भारत और पाकिस्तान में रहने वाले, अपने-अपने वतन को और ऊँचा उठा लेते. लेकिन ईश्वर ने ऐसा नहीं चाहा.

जब मैं सोचता हूँ कि हिंदुओं और मुसलमानों ने अपने ही देशवासियों के साथ क्या किया, तो मेरा शरीर काँप उठता है. और मेरी दिली इच्छा है कि काश इन घटनाओं के घटित होने से पहले ही मैं अपनी आँखें हमेशा के लिए बंद कर लेता, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इनके बारे में बताने की भी ज़रूरत न पड़े.

खैर, हम, नेक हिंदू और मुसलमान, जो कुछ हुआ उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं. यह एक पागलपन था, जिसने हिंदू और मुसलमान दोनों की आंखें बंद कर दीं. और सबसे बुरी बात यह है कि यह सब धर्म और आस्था के नाम पर हुआ. कोई भी धर्म इस तरह के रक्तपात की अनुमति नहीं देता. शायद कुदरत ने हमारी परीक्षा ली, लेकिन हम इस परीक्षा में बुरी तरह असफल रहे और दुनिया के सामने अपना चेहरा नहीं दिखा सकते.

खैर, मैं प्रार्थना करता हूं कि भारत और पाकिस्तान में शांति और व्यवस्था बनी रहे. और हम पहले की तरह फिर से एक जगह से दूसरी जगह स्वतंत्र रूप से आ-जा सकें.

जो कुछ भी हुआ है, वह सत्ता की राजनीति का नतीजा है और इसमें एक संत समान व्यक्ति की बलि चढ़ गई है. मैं आपकी भावनाओं और विचारों का तहे दिल से सम्मान करता हूँ और शायद भविष्य में हम सच्चे दोस्तों की तरह एक-दूसरे के सहयोगी साबित हो सकें.

आपकी सहानुभूति और संवेदना के लिए मैं आपका हार्दिक आभारी हूँ. और आपसे…एक अच्छे इंसान से, यही उम्मीद थी कि आप हर संभव तरीके से दूसरों की मदद करके दिली सुकून का अनुभव करेंगे.

मुझे खेद है कि आप जैसे नेक इंसान को इस गड़बड़ी में चोट पहुँची और पूर्वी पंजाब में नौकरी करने के बावजूद आपको पाकिस्तान जाना पड़ा. लेकिन हमारे भाइयों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि पश्चिमी पंजाब में हिंदू-सिख और पूर्वी पंजाब में एक मुसलमान का रहना नामुमकिन हो गया.

शुक्र है कि आप अपने परिवार के साथ लाहौर सुरक्षित पहुँच गए. लेकिन संपत्ति का नुकसान निश्चित रूप से खेदजनक है. आशा है कि दोनों देशों में संपत्ति के संबंध में जल्द ही कोई निर्णय लिया जाएगा और शायद हम संपत्ति का आदान-प्रदान कर सकें. इससे हमारी परेशानियाँ कुछ हद तक कम हो जाएँगी.

फिलहाल तो किस्मत को कोसने के अलावा कोई विकल्प नहीं है…

अब मैं जालंधर में एक दोस्त के साथ रहता हूँ. मेरे बच्चे होशियारपुर के एक गाँव में हैं. मेरे पास न तो अपना घर है और न ही कोई नौकरी, और मैं बहुत दयनीय जीवन जी रहा हूँ. सरकार ने निजी स्कूलों में काम करने वालों को नौकरी नहीं दी है. मुझे इस बात की बहुत चिंता है कि मैं अपने बच्चों का पेट कैसे भरूंगा.

ये किताबें मेरी ज़िंदगी भर की अनमोल धरोहर थीं, और मैंने इन्हें सितंबर में इस घर में आते ही देखा था. मुझे पूरा विश्वास है कि आप इन किताबों की हिफ़ाज़त करेंगे, और हालात सामान्य होते ही मैं इन्हें वापस ले लूंगा. आप मेरे घर में रहिए और इसका ख्याल रखिए. मौजूदा हालात में मैं और क्या लिख ​​सकता हूँ?

मैं बहुत चिंतित और असहाय महसूस कर रहा हूँ क्योंकि मेरा अपना घर नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है कि आप हर संभव तरीके से मेरी मदद करने की कोशिश करेंगे.

आपका शुभचिंतक

हरकिशन दास बेदी, बी.ए.बी.टी

मार्फ़त पंजाब बुकस्टोर, माई हीरा गेट

जालंधर शहर

अब इस ख़त को ध्यानपूर्वक पढ़ें और यह भी याद रखें कि इसे एक हिंदू ने लिखा था जिसे 1947 के विभाजन के दौरान लाहौर छोड़कर जालंधर आना पड़ा था.

यह वह समय था जब विभाजन के कारण भड़की नफरत की आग ने लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया था.

मेरी कहानी चौधरी मुहम्मद लतीफ और हरकिशन दास बेदी की कहानियों से जुड़ती है. चौधरी लतीफ़ के निधन के बाद, जब उनके कमरे की सफाई हो रही थी, तब कुछ ऐसे ख़त मिले जिनके बारे में परिवार में किसी को पता नहीं था.

ये ख़त हरकिशन दास बेदी के थे. मैं सोचने लगा कि उन्मादी माहौल में भी शांति और व्यवस्था की बात करने वाले लोग कौन रहे होंगे?

शायद ऐसे लाखों और लोग हों, शायद करोड़ों लोग आज भी ऐसा ही सोचते हों और ये सब ‘सत्ता की राजनीति’ हो. शायद हम लड़ना ही नहीं चाहते.

कुछ साल पहले जब एक युवक ने लिंक्डइन पर मुझे मैसेज भेजा और मुझसे बात करने की इच्छा जताई, तो इस बात पर मेरा विश्वास और भी मजबूत हो गया.

मैंने उसे अपना नंबर दिया और उसका फोन तुरंत बज उठा.

अगले कुछ वाक्यों में उसने जो कहा, वह मुझे जीवन में पत्रकारिता का सार लगा. वह लड़का हरकिशन दास बेदी का पोता था.

उसने मुझे बताया, “एक दिन मेरी माँ परिवार के एक बच्चे को गणित पढ़ा रही थीं और उन्होंने उसे बताया कि तुम्हारे दादाजी एक महान गणितज्ञ थे और उन्होंने गणित पर किताबें लिखी थीं. बच्चे ने कहा कि मैं भी देखना चाहता हूँ और उसने इंटरनेट पर खोजना शुरू कर दिया. लेकिन जैसे ही उसने हरकिशन दास बेदी का नाम टाइप किया, आरिफ़ शमीम नाम सामने आ गया क्योंकि उन्होंने बेदी पर एक डॉक्युमेंट्री बनाई थी.”

उस युवक ने कहा कि उसका पूरा परिवार अपने बुजुर्ग के बारे में लिखने के लिए मुझे धन्यवाद देना चाहता है. हरकिशन दास बेदी भारत में शिक्षा और अध्यापन से भी जुड़े हुए थे.

पढ़िए उनका लिखा एक और ख़त-

भारत के विभाजन के दौरान, करीब एक करोड़ 20 लाख लोग शरण की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन कर गए.

इमेज स्रोत, Getty Images

मार्फत पंजाब बुकस्टोर, जालंधर सिटी

22 जनवरी 1948

मेरे शफीक और मोहसिन मोहम्मद लतीफ साहब

मैं ठीक हूँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ. खबर है कि आपने जो रजिस्ट्री भेजी थी, वह मुझे मिल गई है.

उसमें मेरे घर की रजिस्ट्री, दो प्लॉटों की रजिस्ट्री, बीमा कंपनी की पॉलिसी और डाकघर व बैंक की पासबुक हैं. आप जैसे अच्छे इंसान का मैं जितना भी शुक्रिया अदा करूँ, कम है.

मुझे आपसे एक शिकायत है. आपने डाकघर के फॉर्म के साथ एक रुपये का नोट भेजा है. इससे मुझे बहुत दुख हुआ है. क्या आप मुझे इतना लाचार समझते हैं कि मैं आपके लिए अपनी जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकता? मुझे यह बात पूरी तरह से महसूस हुई है. भविष्य में मुझ पर इतना दबाव न डालें.

जब आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हैं, तो मुझे भी आपके लिए कुछ करने का मौका देना चाहिए. आपने मेरे इतने सारे दस्तावेज़ भेजे और उनके रजिस्ट्री का खर्च उठाया. क्या यह मेरे लिए आपके सामने नतमस्तक होने के लिए काफी नहीं था?

मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि भविष्य में आप मुझे नौकर समझकर मुझ पर इतना दबाव न डालें और मुझे भी आपकी सेवा करने का मौका दें.

मैं एक-दो दिन से बीमार हूँ और चार-पाँच दिन से कुछ खाया भी नहीं है. जैसे ही मैं ठीक हो जाऊँगा, अमृतसर जाकर आपका काम करूँगा…

मुझे यह लिखते हुए गर्व हो रहा है कि मेरा घर एक ऐसे शिक्षक को अलॉट किया गया है जो वास्तव में एक संपूर्ण इंसान हैं.

खैर, मैं आपकी तारीफ़ नहीं कर रहा हूँ. मेरा दिल इस बात का गवाह है.

केवल खुदा ही जानता है कि भविष्य में हमारा रिश्ता कितना गहरा होगा.

बैठक की चिमनी के नीचे एक हारमोनियम पड़ा था. इस हारमोनियम के ऊपर कुछ किताबें थीं और उनमें एक फाइल थी, जिसमें अमेरिका और इंग्लैंड के बीच मेरे पत्राचार का रिकॉर्ड था.

साथ ही भारत सरकार के कुछ लाइसेंस और दो बिल भी थे, एक पेंसिल का और एक विदेशी टूथपेस्ट का.

आपको इस फाइल का ध्यान रखना चाहिए. मुझे लगता है कि आपने किताबें एक बोरी में डालकर छोड़ दी होंगी. मेरे छोटे से कमरे में कागज के 20 रीम और देशी कागज का एक रीम था.. क्या ये कागज वहीं पड़े हैं या सरकार उन्हें ले गई है? आपको लिखना होगा…

मेरे छोटे से कमरे में मेज पर ‘हाई स्कूल ज्योमेट्री’ नाम की एक किताब पड़ी थी. मैंने इस किताब का आधा भाग एडिट कर लिया था. अगर संभव हो तो आप इसे अलग से भेज दें या अपने पास रख लें.

मैं बाद में इसे मंगवा लूँगा. यह किताब मैंने खुद लिखी है, जिसका आधा भाग मैंने संशोधित कर लिया है. बाकी आधा भाग अभी संशोधित करना बाकी है, उसके बाद इस किताब को दोबारा छापा जाना है…

आपका शुभचिंतक

हरकिशन दास बेदी

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SOURCE : BBC NEWS