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1933 में एक धुंध भरी रात को पर्सी शॉ घर लौट रहे थे, तभी सड़क किनारे उन्हें एक रोशनी दिखाई दी और वो अचानक रुक गए.
कहा जा रहा है कि वह एक बिल्ली थी. बिल्ली पर कार की हेडलाइट की रोशनी पड़ी और उसकी आँखों ने उस रोशनी को सीधे वापस उनकी ओर रिफ़्लेक्ट दिया.
पर्सी की बड़ी भतीजी ग्लेंडा शॉ ने 2022 में बीबीसी के ‘विटनेस हिस्ट्री’ पॉडकास्ट को बताया, “यह एक संयोग था. उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिससे रोशनी रिफ़्लेक्ट हुई और उन्हें रुकने पर मजबूर होना पड़ा. जब उन्होंने देखा तो उन्हें एहसास हुआ कि वह सड़क की ग़लत तरफ़ थे. अगर वह सीधे आगे बढ़ जाते तो खाई में गिर जाते.”
उस घटना ने न सिर्फ़ उनकी जान बचाई, बल्कि माना जाता है कि इसी से शॉ को सड़क पर निशान बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले रिफ्लेक्टिव स्टड का आविष्कार करने की प्रेरणा मिली. ब्रिटेन में इन्हें आम तौर पर ‘कैट्स आइज़’ कहा जाता है.
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1976 में शॉ की मौत तक करीब डेढ़ करोड़ कैट्स आइज़ बनाए जा चुके थे. इन स्टड और इनके अलग-अलग रूपों का इस्तेमाल आज भी दुनिया भर की सड़कों पर किया जाता है.
उनकी बड़ी भतीजी के मुताबिक़, शॉ का विज्ञान से कोई नाता नहीं था.
उन्होंने कहा, “उन्हें भौतिक विज्ञान, रोशनी की रिफ़्लेक्शन बगैरह के बारे में जानकारी नहीं थी. उन्होंने इसे ख़ुद ही समझा.”
हालाँकि उनका डिज़ाइन सीधे बिल्ली की आँख की बनावट पर आधारित नहीं था, लेकिन शॉ ने उस रात दिखाई दी रोशनी की रिफ़्लेक्शन की नकल करने की कोशिश की. इसके लिए उन्होंने काँच की छोटी-छोटी गोलियों का इस्तेमाल किया.
बिल्लियों की आंखें कैसे ‘चमकती’ हैं
हालाँकि, असली बिल्ली की आँखें अँधेरे में इसलिए चमकती हुई दिखाई देती हैं क्योंकि रेटिना के पीछे ‘टेपेटम ल्यूसिडम’ नाम की टिश्यू की एक रिफ़्लेक्टिव लेयर होती है.
टेनेसी यूनिवर्सिटी की वेटरिनरी ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट और क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफ़ेसर ब्राइडी फ़ूट बताती हैं कि यह एक ख़ास संरचना है, जो इंसानों में नहीं होती.
‘टेपेटम ल्यूसिडम’ का लैटिन में अर्थ ‘चमकदार परत’ होता है.
यह रिफ़्लेक्टिव लेयर बिल्ली की आँख को एक तरह के आईने में बदल देती है. इससे कम रोशनी में भी उसकी देखने की क्षमता बेहतर होती है और उसे रात में शिकार करने में मदद मिलती है.
यह आँख को उस रोशनी को दोबारा पकड़ने का मौका देती है, जो आम तौर पर आँख से निकल जाती.

फ़ूट कहती हैं, “जब भी रोशनी की कोई किरण किसी फ़ोटोरेसेप्टर पर नहीं पड़ती, तो उसे रोशनी की खोई हुई किरण माना जाता है.”
लेकिन आँख के जिस हिस्से में ‘टेपेटम ल्यूसिडम’ होता है, वहाँ यह रोशनी उससे टकराकर वापस आती है और किसी दूसरे फ़ोटोरेसेप्टर तक पहुँच सकती है.
फ़ूट कहती हैं, “इसकी वजह से रात में जब रोशनी कम होती है, तो पुतली काफ़ी फैल जाती है. इसी कारण ऐसा लगता है कि आँख से बहुत तेज़ रोशनी वापस आ रही है.”
इससे ‘रिफ्लेक्टिव लेयर’ का कुछ हिस्सा आँख से बाहर भी निकल जाता है.
बिल्ली की आँखों में दिखाई देने वाली इस चमक का रंग अलग-अलग हो सकता है. यह नारंगी और पीले से लेकर हरे रंग तक हो सकता है. यह उनके ऊतक में मौजूद पिगमेंट पर निर्भर करता है.
लेकिन यह रिफ्लेक्टिव लेयर सिर्फ़ बिल्लियों में नहीं होती. इसी वजह से आपको दूसरे जानवरों की आँखें भी अँधेरे में चमकती हुई दिखाई दे सकती हैं.
फ़ूट कहती हैं, “कुत्तों, बिल्लियों, घोड़ों और मवेशियों जैसे सभी जानवरों में टेपेटम होता है.”
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कैट-आई कैमरे
शॉ के आविष्कार के कई दशक बाद अब आधुनिक इंजीनियर बिल्ली की आँख की बनावट से प्रेरणा लेकर हाई-टेक कैमरा तकनीक विकसित कर रहे हैं.
इन कैमरों का इस्तेमाल रोबोट, ड्रोन और बिना ड्राइवर चलने वाले वाहनों में किया जा सकता है.
दक्षिण कोरिया के कोरिया एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर यंग मिन सॉन्ग ऐसा कैमरा बनाना चाहते थे, जो अलग-अलग तरह की रोशनी में काम कर सके और भीड़ के बीच माहौल में भी वस्तुओं को पहचान सके.
इसके लिए उन्होंने सबसे पहले बिल्ली की आँख में मौजूद ‘टेपेटम ल्यूसिडम’ की नकल करने की कोशिश की.
असली बिल्ली की आँख में यह ऐसी कोशिकाओं से बना होता है, जिनमें राइबोफ़्लेविन और ज़िंक से बने छड़ के आकार के क्रिस्टल होते हैं. ये क्रिस्टल रोशनी को रिफ़्लेक्ट करते हैं.
सॉन्ग बताते हैं कि रासायनिक इंजीनियरिंग के ज़रिए इस नैनो संरचना को दोबारा बनाना काफ़ी मुश्किल साबित हुआ.
इसलिए उनकी टीम ने इसकी जगह इमेज सेंसर के पीछे रिफ्लेक्ट करने वाली सिल्वर की एक परत लगाकर आर्टिफ़िशियल रिफ्लेक्टर बनाया.
इससे कैमरे की दिखाई देने वाली रोशनी को सोखने की क्षमता 52 फ़ीसदी बढ़ गई.
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इसके बाद सॉन्ग ने बिल्ली की आँख की एक और ख़ासियत पर ध्यान दिया. तेज़ रोशनी में उसकी पुतली एक पतली, खड़ी दरार जैसी हो जाती है.
शोध से पता चलता है कि इससे बिल्लियों को दूरी का अंदाज़ा लगाने में मदद मिल सकती है. इसकी वजह से वे आसपास की घनी वनस्पति के बीच छिपे शिकार को पहचान सकती हैं.
सॉन्ग ने सोचा कि अगर वह बिल्ली की आँख से प्रेरित ऐसे कैमरे बनाएं जिनमें पुतली खड़ी हो, तो इससे आसपास के बेकार या बिखरे हुए बैकग्राउंड को हटाने में मदद मिल सकती है. इसके बाद आप किसी भी चीज़ को साफ़ तौर पर देख सकते हैं.
आधुनिक कंप्यूटर विज़न सिस्टम पहले से ही ऐसे व्यस्त या चीज़ों से भरे दृश्य में किसी वस्तु को अलग कर सकते हैं. ठीक वैसे ही जैसे स्मार्टफ़ोन का पोर्ट्रेट मोड किसी व्यक्ति के पीछे के बैकग्राउंड को धुंधला कर देता है.
लेकिन ऐसा करने के लिए अक्सर काफ़ी ज़्यादा कंप्यूटिंग क्षमता की ज़रूरत होती है. सॉन्ग का विचार था कि इस क्षमता का कुछ हिस्सा कैमरे के अंदर ही विकसित किया जाए.
इसके लिए उन्होंने कैमरे के अपर्चर को बिल्ली की आँख की खड़ी पुतली जैसा आकार दिया. अपर्चर कैमरे के लेंस में वह छेद होता है, जिससे रोशनी उसके सेंसर तक पहुँचती है.

इस विचार को परखने के लिए सॉन्ग की टीम ने चीज़ों से भरे बैकग्राउंड वाली वस्तुओं की तस्वीरें खींचीं.
इसके लिए उन्होंने एक सामान्य गोल अपर्चर और एक खड़ी आकृति वाले अपर्चर, दोनों का इस्तेमाल किया.
गोल अपर्चर से खींची गई तस्वीर में वस्तु और उसके पीछे का बिखरा हुआ बैकग्राउंड, दोनों साफ़ दिखाई दिए. लेकिन खड़ी आकृति वाले अपर्चर से खींची गई तस्वीर में वस्तु काफ़ी ज़्यादा साफ़ दिखाई दी.
फ़िलहाल अपर्चर को हाथ से बदलना पड़ता है. यह बिल्ली की आँख की तरह रोशनी के स्तर के हिसाब से अपने-आप नहीं बदलता. सॉन्ग का कहना है कि भविष्य में वह इस समस्या का समाधान करना चाहते हैं.
क्या दूसरे जानवरों की आँखों से भी मिल सकती है मदद?
बिल्ली की आँख से प्रेरित कैमरे के अलावा, सॉन्ग और उनके साथियों ने दूसरे जानवरों की आँखों से प्रेरणा लेकर भी कई कैमरे बनाए हैं.
उनका मानना है कि प्रकृति से प्रेरणा लेकर ऐसे सैकड़ों डिज़ाइन तैयार किए जा सकते हैं.
2013 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय अर्बाना-शैंपेन में रहते हुए उन्होंने मक्खी की आँख से प्रेरित एक कैमरा बनाया था.
इसके बारे में सॉन्ग कहते हैं, “मक्खियों की आँखें उभरी हुई होती हैं और वे एक साथ हर दिशा में देख सकती हैं.”
वे कहते हैं, “इस कैमरे का देखने का दायरा बहुत बड़ा है और यह वस्तुओं को बहुत तेज़ी से पहचान सकता है.” उनके मुताबिक़, ये खूबियाँ इसे रोबोटिक ड्रोन में इस्तेमाल के लिए उपयोगी बनाती हैं.
उनकी लैब ने एक और कैमरा बनाया है, जिसे बाज़ की आँख से प्रेरित होकर तैयार किया गया है.
यह कैमरा अपने देखने के दायरे के बीच वाले हिस्से की साफ़ और बड़ी तस्वीर लेता है, जबकि आसपास के बड़े हिस्से को कम रिज़ॉल्यूशन में रिकॉर्ड करता है.
सॉन्ग कहते हैं, “आप यह सोच सकते हैं कि किसी ख़ास काम के लिए कौन-सा जानवर सबसे उपयुक्त हो सकता है.”
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सॉन्ग कहते हैं, “इनकी कुल आठ आँखें होती हैं… सामने, दोनों तरफ़ और यहाँ तक कि पीछे भी. ये हर दिशा में देख सकती हैं. साथ ही, सामने वाली आँखों की मदद से ये सिर्फ़ एक आँख से ही किसी चीज़ की सटीक दूरी का पता लगा सकती हैं.”
वह बताते हैं कि इन मकड़ियों की रेटिना एक के ऊपर एक कई परतों में होती है. इसी वजह से वे दूरी का बहुत सटीक अंदाज़ा लगा सकती हैं और अपने लक्ष्य से चूके बिना बेहद सटीक छलाँग लगा सकती हैं.
सॉन्ग का कहना है कि इसी सिद्धांत पर बनाया गया कैमरा उन कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनमें दूरी की बेहद सटीक माप ज़रूरी होती है. मिसाइल गाइडेंस सिस्टम इसका एक उदाहरण है.
सॉन्ग कहते हैं कि आज ज़्यादातर आधुनिक कैमरा सिस्टम, जैसे आपके फ़ोन का कैमरा, मुख्य रूप से इंसानी आँख की नकल करते हैं. लेकिन जानवरों की देखने की क्षमता से प्रेरित कैमरों का इस्तेमाल ख़ास कामों के लिए किया जा सकता है, “रोबोट, उद्योग, ड्रोन या अगली पीढ़ी के किसी भी रोबोटिक सिस्टम में.”
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