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बिहार: नीरज कुमार और अनंत सिंह के विवाद में क्या ललन सिंह जेडीयू में अलग-थलग पड़ रहे हैं?

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Source :- BBC INDIA

ललन सिंह को संसद में जेडीयू की अहम आवाज़ के रूप में जाना जाता रहा है (फ़ाइल फ़ोटो)

बिहार में एमएलसी चुनावों में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आया.

केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वसनीय रहे ललन सिंह को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर कई सवाल उठे.

इस चुनाव में ललन सिंह की सहानुभूति बाहुबली विधायक अनंत सिंह के साथ साफ़ दिखी और नीरज कुमार से उनकी तल्ख़ी भी नहीं छुप पाई. नीरज कुमार एक समय में ललन सिंह के क़रीबी के तौर पर देखे जाते थे.

पटना स्नातक सीट से अनंत सिंह ने जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज सिंह को समर्थन किया था. यह समर्थन उन्होंने जेडीयू में रहते हुए किया था. ललन सिंह अनंत सिंह के इस रुख़ का विरोध से ज़्यादा बचाव करते दिखे जबकि नीरज कुमार और पार्टी की स्टेट यूनिट अनंत सिंह का खुलकर विरोध कर रहे थे.

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अनंत सिंह को जेडीयू ने पार्टी से बाहर निकाल दिया है. अनंत सिंह मोकामा से विधायक हैं. अनंत सिंह का इस लोकसभा क्षेत्र में अच्छा ख़ासा प्रभाव माना जाता है.

साल 2005 से अनंत सिंह को मोकामा में कोई हरा नहीं पाया है. जबकि इस दौरान विवाद और हिंसा की कई घटनाएं हुई हैं.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में मुंगेर से गैंगस्टर रहे अशोक महतो की पत्नी कुमारी अनिता को आरजेडी ने उम्मीदवार बनाया था. कुमारी अनिता के ख़िलाफ़ जेडीयू से ललन सिंह उम्मीदवार थे.

अनंत सिंह ख़ुद ललन सिंह का समर्थन कर रहे थे. अनंत सिंह इस दौरान जेडीयू और आरजेडी में भी रहे. निर्दलीय भी चुनाव लड़े लेकिन कोई उन्हें हरा नहीं पाया.

2020 में अनंत सिंह आरजेडी के टिकट पर मोकामा से विधायक बने थे लेकिन आर्म्स एक्ट केस में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था.

जीत नीरज कुमार की हुई और जीत के बाद की उनकी प्रतिक्रिया यह जताने वाली थी कि ललन सिंह ने उनके साथ ठीक नहीं किया.

नीरज कुमार की जीत के बाद संजय झा ने उन्हें बधाई दी

जीत के बाद नीरज कुमार ने कहा कि वह ललन सिंह से मिलने या उनका आशीर्वाद लेने नहीं जाएंगे.

उन्होंने पत्रकारों से इस मुद्दे पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा, “सवाल ही नहीं होता है. आख़िर मेरा गुनाह क्या था कि इतनी परेशानी झेलनी पड़ी.”

उन्होंने कहा, “मेरे मां-बाप और बुज़ुर्गों ने यही सिखाया है कि अगर कोई क़र्ज़ हो तो उसे निश्चित तौर पर वापस करना. मैं यह सियासी क़र्ज़ सूद समेत वापस करूंगा.”

वहीं अनंत सिंह ने अपने ख़िलाफ़ पार्टी की कार्रवाई के लिए नीरज कुमार जो ज़िम्मेदार ठहराया और ललन सिंह के साथ खड़े नज़र आए. शुक्रवार को जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि ‘आप ललन सिंह को क्या कहना चाहेंगे?’

अनंत सिंह ने नाराज़गी जताते हुए कहा, ”ललन बाबू बोलो या मंत्री जी बोलो. सीधे ललन बोलता है. पता है कितने करोड़ ललन हैं. सही भाषा बोला करो. ऐसा लगता है ललन नाम लेकर अपने चेले को बुला रहे हैं.”

अनंत सिंह ने कहा, “इस मामले में (पार्टी से निष्कासित किए जाने पर) जो नीरज कुमार ने कहा वही पार्टी ने किया. पूरा गांव जानता है.”

नीरज कुमार और ललन सिंह में मतभेद

ललन सिंह और निशांत कुमार (फ़ाइल फ़ोटो)

जेडीयू के इन दोनों नेताओं के बीच मतभेद इतने गहरे और स्पष्ट हो गए कि पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा को इस मुद्दे पर बयान देना पड़ा.

संजय झा ने कहा, “सियासी दलों में छोटे-मोटे मतभेद होते रहते हैं, ललन सिंह हमारी पार्टी (जेडीयू) के सम्मानित नेता हैं.”

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, “ललन सिंह और संजय झा के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर एक सियासी चर्चा बिहार में चल रही है, हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है यह सपष्ट तौर पर नहीं बताया जा सकता है.”

उनका कहना है, “नीतीश कुमार के सार्वजनिक जीवन से एक तरह से बाहर होने से जेडीयू में एक राजनीतक शून्य और दिशाहीनता दिखती है, जिसकी वजह से ऐसे विवाद सामने आ रहे हैं. पार्टी में अलग-अलग धड़े सक्रिय हैं.”

इस पूरे विवाद पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से नीरज कुमार ने कहा, “इंसान को कृतज्ञ होना चाहिए. मेरे ऊपर गंभीर आरोप लगाए गए थे, उसके बाद भी मैंने साल 2019 के चुनावों में ईमानदारी से उनके लिए (ललन सिंह) काम किया. मेरे ख़िलाफ़ आरोपों को कोर्ट ने पूरी तरह ख़ारिज कर मुझे क्लिन चिट दी, लेकिन आपने (ललन सिंह) एक बार भी मेरे पक्ष में स्पष्टीकरण नहीं दिया.”

उन्होंने कहा, “नीरज कुमार के बयान का मतलब पार्टी का बयान नहीं है और न ही पार्टी में कोई टूट हुई है. मेरा चरित्र हनन हुआ और जिसके कारण ऐसा हुआ वह ख़ामोश रहे, इसलिए मैंने बयान दिया.”

नीरज कुमार ने बताया कि दरअसल साल 2019 में अनंत सिंह के आवास पर एके-47 समेत अन्य हथियार बरामद हुए थे और आरोप लगाया गया था ये हथियार नीरज कुमार ने रखवाए थे.

नीरज कुमार की शिकायत यह है कि इस मामले में ललन सिंह ने वरिष्ठ नेता होने के बाद भी उनका साथ नहीं दिया और यहीं से दोनों के बीच एक विवाद शुरू हुआ.

नीरज कुमार कहते हैं, “मैं पार्टी में केवल नीतीश कुमार का कार्यकर्ता हूं और नेताओं का सहयोगी हो सकता हूं, लेकिन कार्यकर्ता केवल नीतीश कुमार का हूं.”

सुप्रीम कोर्ट ने अनंत सिंह को 1 दिसंबर तक सरेंडर करने को कहा है. उन्हें पार्टी ने भी छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है

ख़ास बात यह है कि नीरज कुमार, ललन सिंह और अनंत सिंह तीनों ही नेता भूमिहार समाज से आते हैं.

एमएलसी चुनाव प्रचार के दौरान जब पार्टी के दो नेताओं अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच मतभेद खुलकर सामने आए तो संजय झा ने कहा था कि इस विवाद को ख़त्म करने के लिए ललन सिंह को नियुक्त किया गया है.

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिन्दू’ के मुताबिक़ विवाद के दौरान अनंत सिंह से मिलने के बाद ललन सिंह ने नीरज कुमार की ओर इशारा करते हुए कहा था कि साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान कुछ पार्टी नेताओं ने ललन सिंह का विरोध किया था, जिनमें नीरज कुमार भी शामिल थे, लेकिन पार्टी ने उस समय नीरज कुमार के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की.

ललन सिंह को झटका?

नीतीश कुमार राजनीतिक तौर पर बहुत सक्रिय नहीं दिखते हैं और पार्टी के अंदर चल रहा विवाद भी खुलकर सामने आ गया है

जिन अनंत सिंह को लेकर ललन लिंह ने चुनाव प्रचार के दौरान सहानुभूति दिखाई, उन्हें 24 अक्तूबर को जेडीयू ने पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया. यही नहीं उनके साथ ही उनकी पत्नी नीलम देवी को भी छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया गया है.

यानी ललन सिंह की सहानुभूति अनंत सिंह को सियासी सुरक्षा नहीं दे पाई. वहीं शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दुलारचंद यादव की हत्या के मामले में अनंत सिंह की ज़मानत रद्द करते हुए उन्हें एक दिसंबर तक सरेंडर करने को कहा है.

बिहार के मोकामा विधानसभा क्षेत्र में दुलारचंद यादव की हत्या 30 अक्तूबर 2025 को हुई थी, जिसके बाद पूरे इलाक़े में तनाव फैला गया था. उस समय बिहार में विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव प्रचार चल रहा था.

नचिनेता नारायण कहते हैं, “एक बात स्पष्ट है कि ललन सिंह जेडीयू के संस्थापक सदस्यों में से हैं, जबकि संजय झा बीजेपी से आए हैं. इसलिए ललन सिंह को संजय झा को लेकर एक असहजता है. साथ ही दोनों नेताओं की अपनी-अपनी महत्वकांक्षा है, जिसका टकराव दिखता है.”

जेडीयू की बागडोर

माना जाता है कि निशांत कुमार को बिहार के पेचिदा सियासी समीकरण और अपनी पार्टी को समझने में अभी वक़्त लगेगा (फ़ाइल फ़ोटो)

माना जाता है कि बिहार में नीतीश कुमार के समर्थक उनके बेटे निशांत को एक उम्मीद की नज़र से देखते हैं कि पार्टी की बागडोर आख़िरकार वह ही संभालेंगे.

दरअसल इसके पीछे भारत में कई सियासी दलों का इतिहास रहा है. बिहार में देखें तो रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को उनके बेटे चिराग पासवान ने संभाल लिया और लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी की कमान तेजस्वी यादव के हाथ में है.

जबकि ऐसे कई उदारहण जिसमें क्षेत्रीय दलों पार्टी की विरासत परिवार के किसी सदस्य के पास नहीं गई तो पार्टी का भविष्य भी कमज़ोर होता दिखा.

जेडीयू में ललन सिंह की जगह

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के पास राजनीतिक अनुभव की कमी है, जबकि बार्टी में जारी विवाद में काफ़ी वरिष्ठ नेता शामिल हैं

नीतीश कुमार पर अक्सर यह आरोप भी लगता रहा है कि उनकी पार्टी में दूसरे नंबर पर कोई नेता कभी टिक नहीं पाता है और नीतीश ख़ामोशी से या खुले तौर पर ऐसे नेताओं को किनारे करते रहे हैं.

जुलाई 2021 में जेडीयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था.

फिर साल 2023 के अंत में उनसे वह ज़िम्मेदारी भी ले ली गई थी. वो पहले जेडीयू के बिहार प्रदेश के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

ललन सिंह को नीतीश कुमार के काफ़ी क़रीबी माना जाता रहा है. उन्होंने भी अपनी राजनीति की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी.

लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील मोदी की तरह ललन सिंह भी जेपी के छात्र आंदोलन से जुड़े हुए थे.

हालाँकि साल 2009-10 में ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच दूरी भी बढ़ी और वे पार्टी से भी दूर हो गए. फिर साल 2013 में वह पार्टी में वापस आ गए और काफ़ी सक्रिय हो गए.

जेडीयू में नंबर दो पर रहे नेता

ललन सिंह को नीतीश कुमार के काफ़ी क़रीबी माना जाता रहा है

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर सितंबर 2018 में जनता दल यूनाइडेट में शामिल हुए थे. उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बनाया गया था लेकिन 2020 में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया.

उसके बाद बारी आई नौकरशाह से राजनेता बने आरसीपी सिंह की. नीतीश कुमार के क़रीबी माने जाने वाले आरसीपी सिंह ने साल 2010 में नौकरी छोड़ जेडीयू का दामन थामा था.

नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा सांसद और जेडीयू का अध्यक्ष भी बनाया. वह केंद्रीय मंत्री भी बनाए गए थे, लेकिन अब वह भी पार्टी से बाहर हैं.

इसी तरह एक अन्य नेता उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष तक बनाया गया लेकिन पार्टी से उनके संबंध पूरी तरह बिगड़ गए. यहां तक कि ख़ुद नीतीश कुमार ने कह दिया था कि ‘उपेंद्र कुशवाहा जब चाहे पार्टी छोड़कर जा सकते हैं.’

इसी सिलसिले में पूर्व मुख्यमंक्षी जीतन राम मांझी का नाम भी जोड़ा जा सकता है, जिन्हें ख़ुद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी, लेकिन मांझी भी आज अपनी अलग पार्टी बनाकर केंद्र सरकार में मंत्री के पद पर हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS