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भारतीय रुपया वायदा में ओपन इंटरेस्ट आर्बिट्राज ट्रेडों से बढ़ा, बाजार हस्तक्षेप की संभावना

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अगले सप्ताह समाप्त होने वाले भारत के डॉलर–रुपया वायदा अनुबंध में बकाया पोजीशन 3.7 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई हैं—सिर्फ दो सप्ताह पहले के स्तर से तीन गुना से भी ज्यादा। बैंकरों के अनुसार, यह एक वर्ष से अधिक समय में सबसे ऊंचा ओपन इंटरेस्ट है। इस उछाल का व्यापक रूप से श्रेय आर्बिट्राज गतिविधियों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के संभावित हस्तक्षेप को दिया जा रहा है।

## ओपन इंटरेस्ट में उछाल की वजह क्या है?

ट्रेडरों का कहना है कि यह वृद्धि आर्बिट्राज ट्रेडों की वापसी को दर्शाती है—ऐसे लेनदेन, जिनमें विभिन्न बाजार खंडों के बीच मूल्य अंतर का लाभ उठाया जाता है। अपेक्षाकृत कम इस्तेमाल होने वाले रुपया वायदा बाजार में ये गतिविधियां फिर से सामने आई हैं, खासकर National Stock Exchange के वायदा बाजार और नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) बाजार के बीच।

कुछ ऋणदाता इन अंतर का लाभ उठाकर छोटे मुनाफे हासिल कर रहे हैं। तीन अज्ञात बैंकरों ने匿名 रूप से ऐसी पोजीशन लेने की पुष्टि की। HDFC Securities के करेंसी रिसर्च एनालिस्ट Dilip Parmar ने कहा, “बाजार में भागीदारी में यह भारी उछाल 5 अगस्त के बाद आया, जब निकट-माह के वायदा और एक महीने के फॉरवर्ड के बीच अंतर बढ़ना शुरू हुआ।”

## RBI की भूमिका: हस्तक्षेप और नियम

मार्च में RBI ने डिलिवरेबल रुपया बाजार में बैंकों की शुद्ध ओपन विदेशी मुद्रा पोजीशन पर सीमाएं लगा दी थीं। इसका उद्देश्य ऑनशोर डिलिवरेबल और नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड बाजारों के बीच होने वाले आर्बिट्राज ट्रेडों पर अंकुश लगाना था। ये ट्रेड एक समय 30 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गए थे, जिससे रुपया रिकॉर्ड निचले स्तरों पर दबाव में आ गया था।

हाल के सप्ताहों में RBI वायदा बाजार में भी सक्रिय रहा है। बैंकरों के अनुसार, उसने एक्सचेंज-ट्रेडेड वायदा के जरिए अमेरिकी डॉलर बेचे हैं और अस्थिरता पर काबू पाने तथा रुपये को समर्थन देने के लिए विभिन्न विदेशी मुद्रा खंडों में अपनी मौजूदगी बनाए रखी है।

## बाजार की गतिशीलता और मूल्य निर्धारण में विकृतियां

अगले गुरुवार समाप्त होने वाला अगस्त वायदा अनुबंध प्रति डॉलर लगभग 95.67 पर कारोबार कर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि यह न केवल 95.74 के स्थानीय स्पॉट रेट की तुलना में डिस्काउंट पर है, बल्कि डिलिवरेबल और नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड बाजारों में समान अनुबंधों की तुलना में भी कम मूल्य पर है।

वायदा बाजार में सीमित तरलता—जहां 2024 के अंत में नियामकीय सख्ती के बाद अब घरेलू बैंकों का दबदबा है—इन मूल्य असंतुलनों को और बढ़ाती दिख रही है। कम प्रतिस्पर्धा और कम भागीदार ऐसे आर्बिट्राज ट्रेडों की संभावनाओं को बढ़ाते हैं।

## रुपये के लिए इसका क्या मतलब है

आर्बिट्राज गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद, बैंकरों का मानना है कि मौजूदा वायदा और स्पॉट दरों के बीच का अंतर स्पॉट विनिमय दरों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने के लिए पर्याप्त बड़ा नहीं है। इस आर्बिट्राज संचय का पैमाना इस वर्ष की शुरुआत में देखे गए पिछले दौरों की तुलना में काफी छोटा है।

फिर भी, 2026 की शुरुआत से रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 6.5% कमजोर हुआ है, जिससे यह एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है। इसके पीछे डॉलर की मजबूत मांग, तेल की बढ़ती कीमतें और आगे और गिरावट से बचाव के लिए आयातकों द्वारा हेजिंग प्रमुख कारण हैं।

## मुख्य निष्कर्ष

– **ओपन इंटरेस्ट में विस्फोटक वृद्धि**: वायदा अनुबंध का ओपन इंटरेस्ट केवल दो सप्ताह में तीन गुना होकर 3.7 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया।
– **आर्बिट्राज गतिविधियों की वापसी**: NSE वायदा और NDF फॉरवर्ड के बीच के अंतर का लाभ उठाया जा रहा है।
– **नियामकीय सीमाएं**: शुद्ध ओपन विदेशी मुद्रा पोजीशन पर RBI की सीमा का उद्देश्य सट्टेबाजी वाले आर्बिट्राज दबाव को सीमित करना है।
– **केंद्रीय बैंक का संभावित हस्तक्षेप**: वायदा के जरिए डॉलर की बिक्री और विदेशी मुद्रा बाजारों में सक्रिय भागीदारी ने संभवतः रुपये को स्थिर करने में मदद की है।
– **स्पॉट रेट पर सीमित प्रभाव**: मौजूदा आर्बिट्राज ट्रेड महत्वपूर्ण होने के बावजूद, इनके स्पॉट रुपये को किसी भी दिशा में बहुत अधिक प्रभावित करने की संभावना कम है।

हालिया घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करते हैं कि मुद्रा के व्यवहार को प्रभावित करने में नियामकीय कदम, बाजार की संरचनाएं और आर्बिट्राज गतिविधियां किस तरह एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। RBI अपने हस्तक्षेपों को समायोजित करना जारी रखता है, ऐसे में बाजार पर नजर रखने वाले लोग रुपये की अगली चाल के संकेतों के लिए वायदा–स्पॉट अंतर, तरलता के पैटर्न और तेल की कीमतों पर करीबी नजर रखेंगे।

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