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हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के बढ़ते मामले

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सुबह के करीब दस बजे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के बांदा शहर में धूप की तपिश ऐसी है मानो सूरज आग बरसा रहा हो.

सड़कों पर चलते हुए ऐसा महसूस हो रहा है जैसे पैरों के नीचे से गर्म आंच उठ रही हो. ऊपर से तेज धूप शरीर के खुले हिस्सों को झुलसा रही है.

खुली धूप में बिना छांव खड़े होना मुश्किल हो रहा है. इंसान हो या जानवर, हर कोई छांव की तलाश में है.

बुंदेलखंड का बांदा जिला हमेशा से गर्म इलाका रहा है, लेकिन विशेषज्ञ लगातार पड़ती गर्मी को चिंताजनक मान रहे हैं.

उनका कहना है कि बांदा में जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में स्थिति और चिंताजनक हो सकती है.

पर्यावरण विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए सिर्फ मौसम को जिम्मेदार नहीं मानते बल्कि घटते जंगलों, कटते पहाड़ों और नदियों से लगातार हो रहे रेत खनन को इसकी मुख्य वजह बताते हैं.

प्रोफेसर साहा

इस साल अप्रैल और मई में बांदा का तापमान कई बार 46 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा. भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों में कई दिनों तक बांदा देश के सबसे गर्म शहरों में शामिल रहा. हालात ऐसे थे कि मौसम विभाग को रेड और ऑरेंज एलर्ट जारी करना पड़ा.

बांदा कृषि विश्वविद्यालय में मौसम विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर दिनेश साहा बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “बांदा में पिछले एक हफ़्ते से तापमान बढ़ रहा है. यहां तापमान 45, 46,और 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया.”

बांदा में गर्मी

प्रोफ़ेसर साहा कहते हैं, “हमारे शरीर के लिए 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान ठीक नहीं है. 40 डिग्री सेल्सियस के ऊपर बढ़ने वाला हर आधा डिग्री हमारे स्वास्थ्य और रहन-सहन को प्रभावित करता है.”

बांदा शहर में दोपहर में जनजीवन ठप हो जाता है. दुकान के अंदर दुकानदार तो मौजूद हैं लेकिन सड़कों पर इक्का-दुक्का लोग ही नज़र आते हैं.

बांदा रेलवे स्टेशन के पास दुकान के सामने बैठे विजय पाल सिंह सड़क से गुजरने वालों को एक टक निहार रहे हैं.

रामपाल सिंह कहते हैं, “बांदा जिला पहले भी गर्म होता था, लेकिन इतनी गर्मी नहीं होती थी. शरीर में पानी की कमी हो रही है. लोगों की तबीयत बिगड़ रही है. रात में हमारे सामने वाले दुकानदार को एडमिट होना पड़ा.”

व्यापार पर असर

गर्मी में काम करना कितना मुश्किल

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क्या गर्मी का असर लोगों के कारोबार पर भी पड़ा है?

इस सवाल के जवाब में रामपाल सिंह कहते हैं, “बाज़ार तो सुबह दस-ग्यारह बजे खुल जाता है लेकिन पब्लिक नहीं रहती. पब्लिक शाम साढ़े छः-सात बजे के बाद निकलती है.”

स्थानीय लोगों का कहना है कि लगातार भू-जल स्तर भी घटता जा रहा है. तालाब, कुएं और हैंडपंप का पानी सूख रहा है.

रामपाल सिंह कहते हैं, “धरती के नीचे वाटरलेवल डाउन हो रहा है. पहले सत्तर से अस्सी फुट पर पानी मिल जाता था लेकिन अभी तो ड़ेढ सौ फुट पर पानी मिलता है.”

इस तपन में होटल, चाय और नाश्ते की दुकान लगाने वालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आग के सामने खड़े होकर काम करना है. होटल चलाने वाले बताते हैं कि उनके यहां खाना कम समय में ही खराब हो जाता है.

स्थानीय निवासी संजय गुप्ता की बांदा बाईपास पर सड़क किनारे चाय और समोसे की दुकान है. गुप्ता बताते हैं कि दोपहर में बारह बजे से तीन बजे तक कोई ग्राहक नहीं आता है.

संजय गुप्ता

वो बताते हैं, “बांदा में पेड़-पौधे बहुत कम हैं. दूसरी तरफ ज्यादातर नदी, नहर और तालाब सूख गए हैं. पेड़-पौधे होते तो इतनी गर्मी महसूस न होती.”

वहीं, बांदा रेलवे स्टेशन के बाहर होटल चलाने वाले शिवा बताते हैं, “तेज गर्मी के कारण खाने-पीने की चीजें सड़ जाती हैं. इतनी गर्मी में एसी-कूलर भी काम नहीं कर रहे हैं.

खेतों में काम करना कितना मुश्किल?

खेतों में काम करना मुश्किल हो गया है.

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बांदा का इलाका हमेशा से कठिन रहा है. यहां की पथरीली ज़मीन, कम हरियाली और पानी की कमी के कारण गर्मियां पहले भी तेज़ पड़ती थीं, लेकिन अब हालात पहले से ज्यादा खराब हो गए हैं.

इस तपिश का सबसे ज्यादा असर किसान, मजदूर और रिक्शा चालकों पर पड़ रहा है.

पप्पू निषाद केन नदी के किनारे मध्य दोपहरी में सब्जी के खेत में सिंचाई कर रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “इस तरह की धूप है कि खेती बचाना मुश्किल हो रहा है. अगर सिंचाई करते समय कपड़ा भीग जाता है तो लपट (लू) लगने का डर होता है.”

पप्पू निषाद

शोभा देवी दिहाड़ी मजदूर हैं. दोपहर की चिलचिलाती धूप में सड़क पर मिट्टी डाल रही हैं.

वो कहती हैं, “गर्मी पड़ती रहती है हम काम करते रहते हैं. हम काम नहीं करेंगे तो हमारा खर्चा-पानी कहाँ से आएगा? मजबूरी में करना ही पड़ता है. प्राइवेट में छुट्टी नहीं होती है.”

मुन्ना लाल भदोही से बांदा ठेके पर काम कर रहे हैं. दोपहर का समय है. एक दीवार के सहारे लगी टीन के नीचे मुन्ना लाल अपने साथियों के साथ खाना बना रहे हैं.

मुन्ना लाल गर्मी के बारे में पूछने पर कहते हैं, “गर्मी तो बहुत पड़ रही है. सुबह पांच बजे से काम में लगते हैं. दस बजे तक करते हैं. फिर खाना बनाते हैं.”

“नवंबर में जब आये थे तब सुबह नौ बजे से काम शुरू करते थे. धूप ज्यादा है तो काम करने में तकलीफ ज्यादा होती है. बुखार हो जाता है. हरारत हो जाती है. दवा खानी पड़ती है.”

क्या आमदनी पर कोई असर पड़ रहा है? इस सवाल पर मुन्ना लाल कहते हैं, “पहले काम ज्यादा होता था तो दिनभर का पंद्रह सौ रुपये बन जाते थे, लेकिन अभी तो सात सौ रुपये ही बन पाते हैं.”

घटते जंगल, बढ़ती तपिश

बांदा में लगातार जंगल घट रहे हैं.

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स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित बांदा में अवैध खनन के खिलाफ शिकायत करते रहे हैं. वे बांदा में पेड़ों के कटान, बालू खनन और पहाड़ों के कटान को बढ़ती तपिश का एक प्रमुख कारण मानते हैं.

उनका कहना है, “सुनियोजित लूट के कारण बांदा में आज स्थिति 48 डिग्री तापमान तक पहुंच चुकी है.”

वे दावा करते हैं, “बुंदेलखंड में बहने वाली केन, बेतवा, बागे, रंज, उर्मिल, धसान और यमुना किसी भी नदी में बालू नहीं बची है.”

“जो बालू पानी को रिचार्ज करता है या पानी को बैलेंस करता है, वह अब नदियों में बचा नहीं है. बांदा की जीवनदायिनी केन पूरी तरह मृतप्राय हो चुकी है.”

“केन के किनारे लगभग सभी गांवों में भूजल संकट है. अगर हम अभी भी नहीं चेते तो आने वाले दिनों में हमें बांदा में भूजल का विकराल संकट देखने को मिलेगा.”

इस बारे में जब हमने बांदा के माइनिंग ऑफिसर राज रंजन से बात की तो उनका कहना था कि खनन का गर्मी या भू-जलस्तर कम होने में कोई रोल नहीं है.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “केन नदी में माइनिंग एक प्रोसेस के तहत हो रही है. सारे एनवायर्नमेंटल पक्ष का ख्याल रखते हुए माइनिंग परमिशन ली जाती है. ज्यादा माइनिंग सोनभद्र और हमीरपुर में होती है.”

रंजन का कहना है, “वहां प्रोडक्शन और माइनिंग ज्यादा है वहां ज्यादा गर्मी होनी चाहिए. जहां तक रही भू-जलस्तर नीचे जाने की बात तो इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. हमें कई विशेषज्ञों ने बताया कि कर्क रेखा बांदा से गुजरती है इसलिए गर्मी वहां ज्यादा पड़ती है.”

मंती देवी

‘जर्नल ऑफ एक्सटेंशन सिस्टम्स’ में प्रकाशित एक अध्ययन, जिसे बांदा कृषि विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अर्जुन प्रसाद वर्मा और अन्य शोधकर्ताओं ने तैयार किया है.

इस अध्ययन के अनुसार, पिछले तीन दशकों में बांदा ज़िले में जंगलों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है.

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के 1991 से 2022 तक के आंकड़ों पर आधारित जर्नल ऑफ एक्सटेंशन सिस्टम्स में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, सामान्य वृद्धि दर के आधार पर भौगोलिक क्षेत्रफल में -4.74 प्रतिशत, घने जंगलों के क्षेत्रफल में -16.87 प्रतिशत और खुले जंगलों के क्षेत्रफल में -14.96 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. वहीं, कुल वन क्षेत्रफल -15.54 प्रतिशत की दर से घट रहा है.

कृषि प्रसार विभाग में सहायक प्रोफे़सर अर्जुन प्रसाद बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “बांदा पूरे भारत ही नहीं दुनिया का सबसे गर्म शहर बन चुका है. फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के डाटा के आधार पर हमने अध्ययन किया और पाया कि बांदा जिले का जियोग्राफिकल एरिया पिछले तीन दशकों से लगातार कम होता जा रहा है.”

उन्होंने कहा, “जिस तरह जंगल का एरिया तेजी से घट रहा है आने वाले समय में प्रत्येक वर्ष तापमान में बढ़ोतरी ही होगी. कम होने के आसार नहीं दिख रहे हैं. इसकी बड़ी वजह वनों की कटाई, खनन गतिविधियां और पेड़-पौधों को काटकर खेतों का विस्तार करना है.”

हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन की परेशानियां

बांदा में गर्मी

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जहां बढ़ती गर्मी ने एक तरफ आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित किया है. वहीं, दूसरी तरफ जानवरों के लिए भी यह कठिन समय साबित हो रहा है.

जानवर पालने वाले किसानों ने बताया इस समय तालाबों और नदियों में पानी सूखने के कारण भैंसों को नहला पाना मुश्किल है.

लोकु यादव किसान हैं उनके पास कई जानवर हैं लेकिन इस गर्मी में जानवरों को पालना मुश्किल साबित हो रहा है.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में वे कहते हैं, “इस तपन में सबको समस्या है लेकिन जानवरों की समस्या कोई नहीं समझ रहा है. नदियों और तालाबों में पानी सूख गया है, जानवरों को कहां पानी पिलाएं, कहां नहलाएं कुछ समझ नहीं आता है.”

“हमारी भैंसों का दूध घट गया है. जो भैंस पहले तीन लीटर दूध देती थी अब वह एक लीटर दे रही है.”

वहीं, दूसरी ओर बांदा शहर के सरकारी अस्पताल में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के कई मामले आ रहे हैं. डॉक्टर बताते हैं कि इससे बच्चे और बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित हैं.

सरकारी अस्पताल में ट्रामा सेंटर प्रभारी डॉक्टर विनीत सचान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “हमारे यहां इस समय डायरिया, पेट, दर्द, उल्टी, चक्कर और फीवर के ज्यादा मरीज आ रहे हैं. जिसमें बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा हैं.”

उन्होंने बताया, “हीट स्ट्रोक में बॉडी का तापमान बढ़ जाता है. इसमें बॉडी में ड्राइनेस हो जाती है, जबान सूखने लगती है और चक्कर आता है. इसमें बच्चों को ज्यादा खतरा होता है क्योंकि बच्चे कोमल होते हैं. बुजुर्गों में ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है इसलिए उनमें रेजिस्टेंस पावर कम हो जाती है.”

इस समय बांदा में आम लोगों को किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए?

इस सवाल के जवाब में डॉक्टर सचान कहते हैं, “हीट ज़्यादा होने से वातावरण में ऑक्सीजन का लेवल डाउन होने लगता है, इससे ब्रेन पर सीधा प्रभाव पड़ता है. इसलिए दस बजे से चार बजे के बीच बाहर न निकलें.”

वे कहते है. “यदि निकलें तो खाना खा कर और साथ में पानी, गमछा, छाता लेकर निकलें. कॉटन के कपड़े पहनें तो ज्यादा अच्छा होगा. खाने में तैलीय पदार्थ, बाहर के कटे फल और इन्फेक्टेड चीजें न खाएं. पानी की मात्रा ज्यादा से ज्यादा लें.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS