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किसी भी सरकारी नौकरी में नियुक्ति से पहले एक तय प्रक्रिया होती है. उम्मीदवार परीक्षा पास करते हैं, उनके दस्तावेज़ों और चरित्र का सत्यापन होता है और फिर नियुक्ति पत्र जारी किया जाता है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी प्रक्रिया से जुड़े नियमों को लेकर एक नया आदेश जारी किया है और इसी आदेश के एक प्रावधान को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
सवाल उठते देख सरकार ने सफ़ाई भी जारी की है और कहा है कि मीडिया में इस आदेश की जो व्याख्या की जा रही है, वो भ्रामक है.
तो इस आदेश में ऐसा क्या है और इसके किस प्रावधान को विपक्षी पार्टियां और छात्र संगठन असंवैधानिक बता रहे हैं?
दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार में प्रमुख सचिव एम देवराज ने बीते 28 अक्तूबर को 21 पन्नों का एक आदेश जारी किया.
इसके तहत सरकारी नौकरियों में नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों के चरित्र (कैरैक्टर) और पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) की जांच के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए गए थे.
इसी आदेश के पैरा नंबर चार के एक प्रावधान में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसे संगठन का सदस्य है, जिसका घोषित उद्देश्य हिंसात्मक तरीक़ों से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है, तो उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है.
Department of Appointment And Personnel, Uttar Pradesh Govt.
सरकार ने आगे जोड़ा है कि व्यक्ति की उम्र 21 साल पूरी होनी चाहिए.
साथ ही उसने सत्यापन (वेरिफ़िकेशन) की तारीख़ से पिछले तीन सालों के भीतर अगर ऐसी किसी गतिविधि में हिस्सा लिया होगा तभी उसके ऊपर इस आदेश के नियम लागू होंगे.
आदेश में ये भी कहा गया है, “अगर इस दौरान उसके व्यवहार में बदलाव के ठोस और सकारात्मक प्रमाण उपलब्ध होते हैं, तो इस धारणा को चुनौती दी जा सकती है.”
उत्तर प्रदेश से बीजेपी के राज्यसभा सांसद राम प्रताप सिंह ने इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि देश में अराजकता फैलाने वालों के प्रति ऐसी ही कार्रवाई होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ”आपको सत्ता परिवर्तन करना है तो आप चुनाव में आइए. चुनाव में आप जीतते हैं तो सत्ता परिवर्तन होगा, लेकिन आप अगर ये चाहें कि गुंडई के बल पर, अराजकता के बल पर सत्ता परिवर्तन करेंगे तो ये होने वाला नहीं है.”
क्या कह रहे हैं विपक्षी दल?
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वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार के फ़ैसले पर तंज कसते हुए कहा है कि “जो ऐसे क़ानून बना रहे हैं, वो खुद जल्द बेरोज़गार होने जा रहे हैं.”
उनकी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर ने सरकार के फ़ैसले की तुलना अंग्रेज़ी शासन के दौर के नियमों से की है.
उनका कहना है कि “लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है. सत्ता बदलने की मांग करना और व्यवस्था को हिंसा से बदलना एक बात कैसे हो सकती है?”
कांग्रेस नेता आराधना मोना मिश्रा ने भी इस आदेश को “असंवैधानिक” बताया है.
उन्होंने कहा कि शिक्षा और नौकरी की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर इस आदेश का असर नहीं पड़ना चाहिए.
उन्होंने कहा, “इस देश का संविधान लोगों को शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी बात रखने, विरोध करने और प्रदर्शन करने का अधिकार देता है. इस अधिकार का उल्लंघन करना असंवैधानिक है. अगर कोई भड़काऊ बयान देता है या अशांति फैलाने की कोशिश करता है, तो वह अलग मामला है.”
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सरकार का यह आदेश ऐसे वक़्त में आया है, जब बीते तीन महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़े विरोध-प्रदर्शन दर्ज किए गए हैं.
इन प्रदर्शनों में स्टूडेंट्स को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए देखा गया है. उनमें से कई पर एफ़आईआर दर्ज होने के मामले भी सामने आए हैं.
ऐसे में कई लोग इस आदेश को विरोध प्रदर्शनों की आवाज़ को दबाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं.
आलोचकों का कहना है कि सरकार ऐसे आदेश के ज़रिए युवाओं में ख़ौफ़ पैदा करना चाहती है, उनके मन में ये डर बैठाना चाहती है कि अगर सरकार विरोधी किसी भी प्रदर्शन में शामिल हुए तो सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है.
‘शांतिपूर्ण और हिंसक प्रदर्शन के बीच फ़र्क़ कौन तय करेगा?’
ऐसा मानने वालों में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई कर रही अंजलि भी एक हैं. अंजलि एक स्टूडेंट एक्टिविस्ट भी हैं और दिशा नाम के एक छात्र संगठन से जुड़ी हैं.
वह कहती हैं, ”सरकार ने आदेश में भले ही हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल लोगों को अयोग्य ठहराने की बात कही हो, लेकिन आशंका है कि शांतिपूर्ण आंदोलनों को भी हिंसक बताकर उनमें शामिल लोगों को निशाना बनाया जा सकता है.”
उन्होंने नोएडा में मज़दूरों के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक रूप देकर कार्यकर्ताओं, स्टूडेंट्स और मज़दूरों पर गंभीर क़ानूनी कार्रवाई की गई.
छात्रा के मुताबिक़, यह आदेश असहमति जताने के संवैधानिक अधिकार पर हमला है और युवाओं को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहना चाहिए.
ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (रेडिकल) एक राजनीतिक मंच है जो सामाजिक-आर्थिक समानता, शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करता है.
इसके उत्तर प्रदेश महासचिव दिनकर कपूर सरकार के आदेश पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं, ”शांतिपूर्ण और हिंसक प्रदर्शन के बीच फ़र्क़ कौन तय करेगा?
सरकार किसी भी आंदोलन में शामिल लोगों पर गंभीर धाराओं में मुक़दमे दर्ज कर सकती है और फिर उन्हें हिंसक गतिविधियों में शामिल बताकर नौकरी से वंचित कर सकती है.
यूपी में पेपर लीक, भर्ती में गड़बड़ी और नई भर्तियां न निकलने से युवाओं में नाराज़गी है.सरकार को उनकी आवाज़ सुननी चाहिए, न कि कार्रवाई के ज़रिए उसे दबाने की कोशिश करनी चाहिए.”
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SOURCE : BBC NEWS




