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रील्स देखने की आदत आपका क्या-क्या नुक़सान कर रही है?

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Source :- BBC INDIA

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आजकल मन नहीं लगता, हर चीज से परेशानी लगती है, बिस्तर से उठने का दिल नहीं होता समेत कई ऐसी चीजें हैं जो लगातार होने लगे तो ये संदेह हो सकता है कि मानसिक स्वास्थ्य ठीक भी है या नहीं.

लेकिन एक इंसान कैसे अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जान सकता है, कब आपका परेशान होना एक गंभीर बीमारी बन जाता है.

डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी और तनाव से जूझ रहे किसी व्यक्ति को कब डॉक्टर की मदद की ज़रूरत पड़ती है और हम सभी को अपना मेंटल हेल्थ ठीक रखने के लिए क्या कुछ करने की ज़रूरत है.

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब हमने मनोवैज्ञानिक डॉ. कोमलप्रीत कौर से जानने की कोशिश की.

साइकोलॉजिस्ट और साइकैट्रिस्ट, दोनों में क्या फर्क?

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी पत्रकार प्रियंका धीमान(बाएं) ने मनोवैज्ञानिक डॉ. कोमलप्रीत कौर(दाएं) से बातचीत की.

साइकोलॉजिस्ट वह मेंटल हेल्थ प्रोफे़शनल हैं, जो हमारी सोच को, हमारी भावनाओं को, हमारे बर्ताव को समझने में हमारी मदद करते हैं.

साइकोलॉजिस्ट काउंसलिंग और साइकोथेरेपी के साथ भावनात्मक मुश्किलों से निकलने में हमारी मदद करता है.

दूसरी तरफ़, साइकैट्रिस्ट वह मेडिकल डॉक्टर है जो दवाइयों के साथ मरीज का इलाज करता है. साइकोलॉजिस्ट दवाइयां नहीं देते.

जब किसी की मानसिक बीमारी बहुत गंभीर हो जाती है तो उस समय दवाइयों की ज़रूरत पड़ती है, जो एक साइकैट्रिस्ट ही मरीज को लिख सकता है.

कई मामले ऐसे होते हैं जहां साइकोलॉजिस्ट और साइकैट्रिस्ट दोनों एक टीम की तरह भी काम करते हैं.

कौन से शुरुआती लक्षण होते हैं, जिनसे ये पता चल सकता है कि व्यक्ति को साइकोलॉजिकल मदद की ज़रूरत है?

अगर कोई शख़्स दो हफ्तों से ज़्यादा समय से परेशान है, बिना किसी बात के ही चिंता में है, बहुत ज्यादा सो रहा है या बहुत कम सो रहा है, भूख बहुत ज़्यादा भूख लग रही है या बहुत कम लग रही है.

बहुत ज़्यादा तनाव या परेशानी में रहने लगा है या फिर उसने अपने आप को लोगों से अलग कर लिया है, किसी से मिलता-जुलता नहीं है.

वो सारे काम न करना जहां से उसे पहले खुशी मिली थी, जब इस तरह के लक्षण दिखने लगें तो मतलब कोई न कोई परेशानी है. उस समय आपको मेंटल हेल्थ प्रोफ़ेशनल की ज़रूरत पड़ती है.

मानसिक बीमारी या डिप्रेशन के कारण क्या होते हैं?

मानसिक बीमारी के कुछ कारण हमारे जीन्स पर निर्भर करते हैं और कुछ हमारे आसपास के माहौल पर (सांकेतिक तस्वीर)

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कुछ चीजें हमारे जीन्स पर निर्भर करती हैं और कुछ हमारे आसपास के माहौल पर.

मान लीजिए अगर आपके परिवार में किसी को डिप्रेशन जैसी बीमारी थी, तो इसकी आशंका रहती है कि आप भी उससे प्रभावित हो सकते हैं.

अगर परिवार में तनावपूर्ण माहौल हो तो दूसरे सदस्य भी नकारात्मक सोचना शुरू कर देते हैं.

वे दुनिया के बारे में भी नकारात्मक सोचते हैं और वे भविष्य के बारे में नकारात्मक सोचने लगते हैं. उन्हें आगे कोई उम्मीद नजर नहीं आती.

ऐसे में बहुत ज़रूरी होता है इन चीजों की उसी समय पहचान करना.

डिप्रेशन, तनाव और एंग्जायटी में क्या फर्क है?

तनाव परिस्थितियों के अनुसार होता है, जब परिस्थितियां ठीक हो जाती हैं तो तनाव भी चला जाता है.

डिप्रेशन का मतलब है कि जब आप अतीत की किसी दर्दभरी याद को बार-बार जी रहे हों और एंग्जायटी का मतलब है जब आपको भविष्य के बारे में कोई चिंता होती है.

बिना किसी कारण या फिर कारण होने पर भी चिंता हो रही है और वह आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित कर रही है.

अच्छी मानसिक सेहत के लिए व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाना ज़रूरी है (सांकेतिक तस्वीर)

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अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्या करें

हर रोज़ कम से कम आधा घंटा अपने लिए समय निकालिए. व्यायाम कीजिए, सैर कीजिए, अच्छा भोजन कीजिए, जंक फूड से दूर रहिए.

मेडिटेशन करना, डीप ब्रीदिंग करना.

ये सारी चीजें आपकी मदद करती हैं, आपको हर रोज़ सक्रिय और सकारात्मक बनाए रखने में मदद करती हैं.

इन गतिविधियों से हमारे हैप्पी हार्मोन रिलीज़ होते हैं.

सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर कितना असर

डॉ. कोमलप्रीत कौर ने कहा कि लगातार रील्स देखने से लोग अपनी भावनाओं को सही तरीके से समझ और संभाल नहीं पाते हैं (सांकेतिक तस्वीर)

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जब आप इंस्टाग्राम और दूसरी सोशल साइट्स पर लगातार रील्स देखते हैं तो एक रील में कोई और इमोशन होता है, दूसरी रील में कोई और इमोशन होता है, तीसरी में कोई और इमोशन होता है.

इस दौरान हमारी भावनाएँ बहुत तेजी से बदल रही होती हैं और वैसे में हमारा दिलो-दिमाग उसे सही तरीके से प्रोसेस नहीं कर पाता.

हमें यह पता ही नहीं चलता कि हमें अपनी भावनाओं को कैसे प्रोसेस करना है.

साथ ही इतनी सारी चीजें जो हम स्क्रीन पर खोल रहे हैं, वे सभी टैब हमारे दिमाग में भी खुल रहे हैं.

इस वजह से ब्रेन फॉग जैसे स्थिति होती और दरअसल ऐसे में ये समझ ही नहीं आता कि हम कौन सा फ़ैसला लें.

मेंटल हेल्थ को मज़बूत रखने के लिए क्या करें

डॉ. कोमलप्रीत के मुताबिक, मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का इलाज विभिन्न प्रकार की थेरेपी के ज़रिए किया जा सकता है (सांकेतिक तस्वीर)

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वर्कप्लेस का हमारी मेंटल हेल्थ पर बहुत असर होता है. वर्क-लाइफ बैलेंस यानी सबसे पहले अपनी पर्सनल और प्रोफ़ेशनल लाइफ के बीच संतुलन बनाना सीखना बहुत ज़रूरी है.

जब कोई शख्स घर जा रहा हो तो ऑफिस की बात ऑफिस में रहे और जब ऑफिस जा रहा हो तो घर की बात घर में रहे. यह संतुलन होना बहुत ज़रूरी है.

ऐसा न हो कि जब आप घर जा रहे हों तो ऑफिस की सारी परेशानियां अपने साथ लेकर जाएं. और यदि ऑफिस आ रहे हों तो घर की परेशानियां अपने साथ लेकर आ रहे हों. इसलिए हमें सीमाएं तय करना सीखना होगा.

आप ब्रीदिंग एक्सरसाइज (सांस से जुड़ी कसरत) को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लीजिए. जैसे बॉक्स ब्रीदिंग, बटरफ्लाई ब्रीदिंग, डीप ब्रीदिंग, फोर सेवन एट ब्रीदिंग.

जब भी एक घंटे या दो घंटे का समय मिले, ये ब्रीदिंग एक्सरसाइज कीजिए. इससे आपका पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय रहेगा, जो शांत रहने में मदद करता है.

जब हम शांत रहते हैं तो फैसले भी सही तरीके से ले पाते हैं, हमारी परफॉर्मेंस भी अच्छी आती है और हमारे रिश्ते भी, चाहे वे कार्यस्थल के हों या घर के, सही बने रहते हैं. और जब सब सही रहेगा तो अपने आप ही सब ठीक हो जाएगा.

महिलाओं की मेंटल हेल्थ किन कारणों से प्रभावित होती है?

डॉ. कोमलप्रीत का कहना है कि अच्छी मानसिक सेहत के लिए वर्क-लाइफ़ बैलेंस बनाए रखना बहुत ज़रूरी है (सांकेतिक तस्वीर)

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दरअसल, एक पारंपरिक सेटअप में औरतों को एक साथ कई चीजें करनी पड़ती है. घर, बच्चे, करियर, फाइनेंस, सब कुछ वो बैलेंस करती हैं.

ऐसी परिस्थितियों में एक महिला काम पर गई है तो उसके दिमाग में हमेशा यह चलता रहता है कि घर पर बच्चे क्या कर रहे होंगे, पति क्या कर रहा होगा, घर जाकर मुझे यह काम देखना है,उनके दिमाग़ में बहुत कुछ चल रहा होता है.

इसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है. वहीं, जो महिलाएं काम-काजी नहीं हैं, जिन्होंने अपना समय घर-परिवार और बच्चों को बड़ा करने में दे दिया, ऐसे में भी घर में एक सपोर्ट सिस्टम होना चाहिए.

ख़ासतौर पर जब बच्चे बड़े हो गए और अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं, तो वह महिला अकेलापन महसूस करने लगती है और डिप्रेशन में चली जाती है.

उनमें यह नकारात्मक विचार आने लगता है कि मैं बेकार हो गई हूं. उसके बाद महिला का डिप्रेशन काफी बढ़ सकता है. इन परिस्थितियों में काउंसलिंग की ज़रूरत पड़ती है.

इलाज किस प्रकार किया जाता है?

महिला की सांकेतिक तस्वीर

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हम सीबीटी (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) जैसी थेरेपी करते हैं, जो व्यक्ति की सोच को फिर से ठीक करने में मदद करती है.

इसके बाद डीबीटी (डायलेक्टिकल बिहेवियरल थेरेपी) दी जाती है, जो व्यक्ति की भावनाओं पर सीधे काम करती है.

इसी तरह, हिप्नोथेरेपी और एनएलपी (न्यूरो-लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग) जैसी थेरेपी भी दी जाती हैं, जो नई सोच और नए व्यवहारिक पैटर्न विकसित करने में सहायता करती हैं.

इसके अलावा, गेस्टाल्ट थेरेपी का उपयोग किया जाता है, जो शरीर, मन और भावनाओं के समग्र संतुलन पर कार्य करती है.

बच्चे एक-दूसरे से अपनी तुलना बहुत करते हैं. उन पर माता-पिता का दबाव, समाज का दबाव और स्वयं से जुड़ी अपेक्षाओं का भी काफी बोझ होता है.

जब वे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते, तो नकारात्मक सोच की ओर बढ़ने लगते हैं. वे अपने बारे में नकारात्मक बातें सोचने और कहने लगते हैं, जिसकी वजह से धीरे-धीरे डिप्रेशन की ओर बढ़ सकते हैं.

इसमें माता-पिता की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. नौकरीपेशा माता-पिता अक्सर अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते. इसकी भरपाई के लिए वे उनकी लगभग हर मांग पूरी करने की कोशिश करते हैं. परिणामस्वरूप बच्चों को कभी “ना” सुनने की आदत नहीं पड़ती.

ऐसे में जब उन्हें किसी बात के लिए “ना” कहा जाता है या बाहर की दुनिया से अस्वीकार का सामना करना पड़ता है, तो उन्हें उसे स्वीकार करने में कठिनाई होती है और वे मानसिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं.

माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की उचित मांगों को स्वीकार करें, लेकिन जहां जरूरत हो वहां तर्क और समझ के साथ “ना” कहना भी सीखें, ताकि बच्चे जीवन की वास्तविकताओं का सामना करना सीख सकें.

माता-पिता के लिए ज़रूरी है कि उनकी बातों को ध्यान से सुनें और दूसरे बच्चों से उनकी तुलना न करें (सांकेतिक तस्वीर)

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बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास में माता-पिता की क्या भूमिका होनी चाहिए?

जब बच्चे छोटे होते हैं, तो वे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं. जिस तरह एक कुम्हार कच्ची मिट्टी को आकार देता है, उसी तरह माता-पिता भी बच्चों के व्यक्तित्व और सोच को आकार देते हैं.

बच्चे जो भी अच्छा काम करते हैं, माता-पिता को उनकी कोशिशों की सराहना करनी चाहिए. इससे बच्चों को यह महसूस होता है कि उनकी मेहनत और प्रयास के कारण उन्हें सकारात्मक परिणाम मिले हैं.

हालांकि, केवल बच्चे की प्रशंसा करने के बजाय उसके प्रयासों की तारीफ करना अधिक महत्वपूर्ण है.इससे उनमें अहंकार विकसित होने की संभावना कम रहती है. बच्चों को नकारात्मक लेबल नहीं देने चाहिए.जैसे-

, “तुम बहुत सुस्त हो” या “तुम तो फेल हो जाओगे.”इस तरह की बातें बच्चों के आत्मविश्वास को नुकसान पहुंचाती हैं और वे खुद को वैसा ही मानने लगते हैं.

बच्चे को कभी यह न कहें कि “तुम बुरे हो.”इसके बजाय यह कहें कि “तुम्हारा यह व्यवहार या यह काम गलत है.”

व्यक्ति और उसके व्यवहार में अंतर करना बहुत जरूरी है.

इसके अलावा, बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना भी आवश्यक है.उनके साथ बिना टोके और बिना किसी व्यवधान के समय बिताएं.उन्हें हर समय सलाह देने के बजाय उनके साथ खेलें, बातचीत करें और उनकी दुनिया को समझने की कोशिश करें.

आजकल बच्चों और माता-पिता के बीच भावनात्मक जुड़ाव कम होता जा रहा है.इस रिश्ते और बॉन्डिंग को फिर से मजबूत करना बेहद जरूरी है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों को ध्यान से सुनें.कई बच्चों को लगता है कि उनके माता-पिता उन्हें समझते नहीं हैं.अक्सर जब कोई बच्चा अपनी गलती बताने की हिम्मत करता है, तो माता-पिता उसे डांटना शुरू कर देते हैं.ऐसी स्थिति में बच्चा अगली बार अपनी बात साझा करने से कतराने लगता है।

इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ बैठें, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनें और ऐसा माहौल बनाएं जिसमें बच्चा बिना किसी डर के अपनी समस्याएं और भावनाएं व्यक्त कर सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS