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रॉकेट के चांद से टकराने की घटना को वैज्ञानिकों के लिए ‘गिफ़्ट’ क्यों कहा जा रहा है?

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Source :- BBC INDIA

चंद्रमा के गड्ढों वाले हिस्से को करीब से देखा जा रहा है.

इमेज स्रोत, Reuters

स्पेसएक्स का एक भटका हुआ रॉकेट चंद्रमा पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. इससे चाँद पर एक बड़ा गड्ढा बन गया है और वैज्ञानिकों को एक अनूठा शोध अवसर मिला है जो भविष्य के मिशनों में मदद कर सकता है.

बुधवार को फ़ॉल्कन 9 रॉकेट का ख़ाली ऊपरी हिस्सा लगभग 8,700 किमी/घंटा (5,400 मील प्रति घंटा) की गति से आइंस्टीन क्रेटर के पास चंद्रमा से टकराया.

अमेरिका में स्थित बड़ी वेधशालाएं रॉकेट के टकराने से मिली जानकारी का विश्लेषण कर रही हैं.

इस घटना की पूरी जानकारी और इससे हम क्या सीख सकते हैं, यह जानने में कई दिन या हफ़्ते भी लग सकते हैं. लेकिन ग्रह भूवैज्ञानिकों के लिए, यह आकस्मिक टक्कर एक वैज्ञानिक गिफ़्ट है.

अंधेरे आकाश में एक रॉकेट तेज़ी से ऊपर की ओर जाता हुआ दिखाई दे रहा है, जिसके पीछे धुएं का गुबार उठ रहा है.

इमेज स्रोत, Reuters

चंद्रमा की ओर कैसे गया रॉकेट

स्पेस एक्स का फ़ॉल्कन 9 रॉकेट दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाला मॉडल है और इसे कई मिशनों पर अंतरिक्ष में भेजा जा चुका है.

इसका डिज़ाइन ऐसा है कि रॉकेट का एक हिस्सा पृथ्वी पर वापस आ जाता है, जबकि अन्य हिस्से अंतरिक्ष में ही अलग हो जाते हैं.

यह रॉकेट पिछले साल जनवरी में फ्लोरिडा से रवाना हुआ था, जिसमें दो लूनर लैंडर भेजे गए थे.

इस रॉकेट का काम ऊपरी चरण को इतनी ताक़त से दागना था कि दोनों लैंडर पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलकर चंद्रमा की ओर रुख़ कर सकें.

अगले 18 महीनों में, पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के हल्के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के साथ-साथ सूर्य से आने वाले प्रकाश ने भी एक हल्का सा धक्का दिया.

रॉकेट के उस हिस्से पर नज़र रखने वाले खगोलविदों ने आखिरकार यह पता लगाया कि उन छोटे-छोटे धक्कों ने इसे चंद्रमा की ओर जाने वाले मार्ग पर डाल दिया था और यह हर दिन गति पकड़ रहा था.

रॉकेट के चांद से टकराने की घटना बुधवार को लगभग 11:05 बजे के आस-पास हुई. इससे उत्पन्न हुई छोटी सी चमक इतनी धुंधली थी कि दूरबीन से भी इसे देखना संभव नहीं था.

शौकिया खगोलविदों के लिए भी उस चमक को देखने की संभावना बहुत कम रही होगी, क्योंकि वह चमक पल भर के लिए ही रही होगी. लेकिन उन्होंने शायद 100 किलोमीटर (62 मील) तक फैली धूल की एक लपट देखी होगी जो कई मिनट तक बनी रही.

यहां तक कि चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे अंतरिक्ष यान भी सही समय पर सही जगह पर मौजूद नहीं थे, इसलिए वे इस टक्कर को सीधे नहीं देख पाए. दक्षिण कोरिया के दनूरी ऑर्बिटर के पास इसे देखने का सबसे अच्छा मौका था, क्योंकि वह दुर्घटनास्थल के पास से कुछ ही समय पहले गुज़रा था. उसकी टीम ने कोरियाई मीडिया को बताया है कि कोई भी फुटेज तभी जारी किया जाएगा जब शोधकर्ता अपना विश्लेषण पूरा कर लेंगे.

अगले कुछ दिनों में, नासा का चंद्र पुनरावलोकन ऑर्बिटर उस स्थान की तस्वीरें लेने के लिए मौजूद होगा, जिससे दुर्घटना से पहले और बाद की छवियों की तुलना की जा सकेगी.

रंगीन छवि में आइंस्टीन क्रेटर दिखाई दे रहा है, जिसके भीतर एक छोटा क्रेटर भी है.

इमेज स्रोत, NASA

इंजीनियरों को भविष्य में क्या मिलेगी मदद

वैज्ञानिक शोध और संभवतः पहली तस्वीरें अमेरिका में स्थित शक्तिशाली दूरबीनों से मिलेंगी, जहाँ आकाश में अभी भी अँधेरा था. फिर भी, 385,000 किलोमीटर दूर चंद्रमा की सतह से टकराने वाली 14 मीटर की वस्तु का पता लगाना आसान नहीं होगा.

तस्वीर को साफ करने के लिए इमेज प्रोसेसिंग में घंटों, दिनों या यहां तक कि हफ्तों का समय लग सकता है, क्योंकि वैज्ञानिक डेटा की जांच और प्रसंस्करण करते हैं.

क्योंकि शोधकर्ताओं को रॉकेट का सटीक आकार, गति और प्रभाव बिंदु पहले से ही पता है, इसलिए यह टक्कर एक आकस्मिक दुर्घटना होने के बजाय एक दुर्लभ, नियंत्रित प्रयोग में बदल जाती है.

ग्रह वैज्ञानिकों के लिए यह एक स्वप्निल क्षण है क्योंकि यह उन्हें इस बात के मॉडल का परीक्षण करने की अनुमति देता है कि कैसे उल्कापिंडों के टकराने से गड्ढे बनते हैं, सतह पर मलबा बिखरता है और चंद्रमा के आंतरिक भाग में कंपन उत्पन्न होता है.

इसका वास्तविक व्यावहारिक महत्व है.

किसी उल्कापिंड के टकराने से कितनी चट्टान और धूल उड़ती है, यह समझने से इंजीनियरों को सुरक्षित लैंडर और भविष्य के चंद्र अड्डों को डिज़ाइन करने में मदद मिलेगी. साथ ही यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि उड़ने वाला मलबा कितनी दूर तक जा सकता है और आसपास की ज़मीन कितनी ज़ोर से हिल सकती है.

पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों और अन्य अंतरिक्ष मलबे के एक समूह का चित्रण.

इमेज स्रोत, Mark Garlick/Science Photo Library via Getty Images

ऐसा पहले भी हो चुका है

सतह के नीचे से फेंकी गई सामग्री चंद्रमा की भूविज्ञान के बारे में नए सुराग प्रदान करती है, जिससे वैज्ञानिकों को इस बारे में पहले से ही पता है कि लगभग 4.5 अरब साल पहले पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली का निर्माण कैसे हुआ था.

यह पहली बार नहीं है जब कोई मानव निर्मित वस्तु चंद्रमा से टकराई है. 1959 से लेकर अब तक दर्जनों अंतरिक्ष यान इससे टकरा चुके हैं, कुछ दुर्घटनावश और कई जानबूझकर विज्ञान के लिए.

सोवियत संघ का लूना 2 पहला मिशन था, जिसके बाद दशकों में नासा के रेंजर मिशन 1960 के दशक में, अपोलो युग के कई रॉकेट चरण और हाल ही में 2009 में एलक्रॉस मिशन आया, जिसे जानबूझकर पानी की बर्फ की खोज के लिए दुर्घटनाग्रस्त किया गया था.

2022 में हुई आखिरी पुष्ट आकस्मिक टक्कर, 2014 में लॉन्च किए गए एक चीनी चंद्र मिशन के बचे हुए बूस्टर के कारण हुई थी – यह इस बात की याद दिलाता है कि इस तरह का अंतरिक्ष मलबा आधी सदी से भी अधिक समय से चुपचाप हमारे सिर के ऊपर जमा हो रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS