Source :- LIVE HINDUSTAN

विदेश में पढ़ाई का सपना देखने वाले लाखों भारतीय छात्रों और उनके परिवारों के लिए हाल के महीनों में एक नई चिंता खड़ी हो गई है। भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है, जिसका सीधा असर विदेशों में पढ़ाई कर रहे छात्रों के खर्चों पर पड़ रहा है। स्थिति यह है कि जो एजुकेशन लोन एक-दो साल पहले पर्याप्त लग रहा था, वह अब कई छात्रों के लिए कम पड़ने लगा है। नतीजतन, छात्रों और उनके परिवारों को अतिरिक्त लोन लेने या अपनी बचत और निवेश तोड़ने की नौबत आ रही है। आइए जरा विस्तार से इसकी डिटेल्स जानते हैं।

पिछले 12 महीनों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में 10% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है। एक समय जहां 1 डॉलर की कीमत करीब 85 रुपये थी, वहीं अब यह 95 रुपये के आस-पास पहुंच गई है। सुनने में यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए इसका असर लाखों रुपये के अतिरिक्त खर्च के रूप में सामने आ रहा है।

मुंबई की एक उद्यमी सुनेत्रा बनर्जी का उदाहरण इस समस्या को अच्छी तरह समझाता है। उनकी बेटी अमेरिका की एक डिजाइन यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। सुनेत्रा के अनुसार, पहले साल में ही उनके परिवार को शुरुआती अनुमान से 7 से 8 लाख रुपये अधिक खर्च करने पड़े। सिर्फ ट्यूशन फीस ही नहीं, बल्कि हॉस्टल, खाने-पीने, रोजमर्रा के खर्च और यात्रा लागत भी काफी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि जो हवाई टिकट एक साल पहले करीब 96 हजार रुपये में मिल जाती थी, उसकी कीमत अब 1.6 लाख रुपये तक पहुंच गई है।

बैंक और एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) आमतौर पर एजुकेशन लोन रुपये में मंजूर करते हैं, जबकि विदेशी विश्वविद्यालय फीस डॉलर, यूरो या पाउंड में लेते हैं। जब रुपया कमजोर होता है, तो छात्रों को वही फीस चुकाने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यही कारण है कि पिछले एक साल में टॉप-अप एजुकेशन लोन की मांग लगभग तीन गुना तक बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में चार साल की अंडरग्रेजुएट डिग्री की कुल लागत सिर्फ रुपये की कमजोरी की वजह से 30 से 35 लाख रुपये तक बढ़ सकती है। कई छात्रों को अतिरिक्त 1 लाख से 6 लाख रुपये तक के टॉप-अप लोन की जरूरत पड़ रही है। हालांकि, अतिरिक्त लोन लेना भी आसान नहीं है। इसके लिए नए दस्तावेज, बैंक प्रक्रिया और कई बार विदेश में मौजूद छात्र को पावर ऑफ अटॉर्नी जैसी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 में भारतीयों ने विदेश में पढ़ाई और उससे जुड़े खर्चों के लिए लगभग 450 मिलियन डॉलर विदेश भेजे। वहीं देश में एजुकेशन लोन का कुल बकाया मार्च 2026 तक 1.55 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है।

एक्सपर्ट का मानना है कि जब तक रुपया मजबूत नहीं होता, विदेश में पढ़ाई का खर्च भारतीय परिवारों पर दबाव बनाए रख सकता है। ऐसे में छात्रों और अभिभावकों को विदेश में शिक्षा की योजना बनाते समय केवल फीस ही नहीं, बल्कि करेंसी एक्सचेंज रेट्स में संभावित बदलाव को भी ध्यान में रखना चाहिए, वरना पढ़ाई का सपना पूरा करने की कीमत उम्मीद से कहीं ज्यादा महंगी साबित हो सकती है।

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