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शिवसेना का इतिहास: बाल ठाकरे से उद्धव तक, एकनाथ शिंदे का वार सबसे घातक

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शिवसेना, महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक पार्टी, अपने गठन से लेकर अब तक कई बार आंतरिक विभाजन का सामना कर चुकी है। इन विभाजनों ने पार्टी की संरचना और राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला है। आइए, हम इन विभाजनों की क्रमवार समीक्षा करें।

**1. 1970 के दशक में पहली विभाजन**

1970 के दशक में, शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के नेता बंदू शिंगरे के बीच तनाव उत्पन्न हुआ। इस मतभेद के परिणामस्वरूप, शिंगरे ने ‘प्रति शिव सेना’ नामक एक नई पार्टी का गठन किया। हालांकि, यह पार्टी विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाई।

**2. 1991 में छगन भुजबल का विद्रोह**

दिसंबर 1991 में, शिवसेना के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत की। उन्होंने 18 विधायकों का समर्थन प्राप्त करने का दावा किया, जबकि उस समय शिवसेना के पास कुल 52 विधायक थे। हालांकि, विधानसभा स्पीकर के हस्तक्षेप के बाद, यह विभाजन स्थायी नहीं हो सका।

**3. 2005 में नारायण राणे का कांग्रेस में शामिल होना**

2005 में, शिवसेना के वरिष्ठ नेता नारायण राणे ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा। उन्होंने दावा किया कि उन्हें 42 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जबकि उस समय शिवसेना के पास 63 विधायक थे। हालांकि, यह दावा कभी साबित नहीं हो सका, और राणे की पार्टी को कोंकण क्षेत्र में ही सीमित सफलता मिली।

**4. 2006 में राज ठाकरे का महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (MNS) का गठन**

2006 में, बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (MNS) की स्थापना की। इससे पार्टी में आंतरिक विभाजन हुआ, लेकिन विधायकों की संख्या में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ। MNS ने 2009 के विधानसभा चुनावों में 13 सीटें जीतीं, लेकिन बाद में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर पड़ा।

**5. 2022 में एकनाथ शिंदे का विद्रोह**

2022 में, शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत की। उन्होंने 55 में से 40 विधायकों का समर्थन प्राप्त किया और गुवाहाटी में डेरा डाला। इस बगावत के परिणामस्वरूप, उद्धव ठाकरे की महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई, और पार्टी दो गुटों में विभाजित हो गई। शिंदे गुट को ‘असली शिवसेना’ का दर्जा मिला, जबकि उद्धव ठाकरे को ‘शिवसेना (यूबीटी)’ नाम और मशाल चिह्न के साथ संतोष करना पड़ा।

**6. 2026 में संभावित नई विभाजन**

2026 में, शिवसेना (यूबीटी) में फिर से विभाजन की संभावना जताई जा रही है। कहा जा रहा है कि पार्टी के छह सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को समर्थन पत्र सौंपा है, जिससे पार्टी के पास महज तीन सांसद रह जाएंगे। इससे पहले, अटकलें थीं कि पार्टी के कुछ विधायक भी दल बदल सकते हैं।

**निष्कर्ष**

शिवसेना के इतिहास में आंतरिक विभाजन पार्टी की राजनीति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हर विभाजन ने पार्टी की दिशा और महाराष्ट्र की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। हालांकि, पार्टी के संस्थापक बाल ठाकरे के नेतृत्व में शुरू हुआ यह सफर कई उतार-चढ़ावों से गुजरा है, लेकिन शिवसेना की राजनीतिक उपस्थिति आज भी मजबूत बनी हुई है।

यह लेख AI-जनित सामग्री है। कृपया इस लेख पर आधारित किसी भी कार्रवाई से पहले जानकारी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें।