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सऊदी-अमेरिका-इजरायल… हमले पर हमले फिर भी नहीं टूटे हूती; कहां से मिल रही ताकत?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोही पिछले 10 साल के हवाई हमलों के बावजूद और मजबूत हो गए हैं। सऊदी अरब, अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल के हमले उन्हें रोक नहीं सके। अब ये लाल सागर के जरूरी व्यापारिक रास्ते और सऊदी तेल ठिकानों पर हमला कर रहे हैं।

मिडिल ईस्ट में तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बाद अब यमन के ईरान समर्थित हूती और सऊदी अरब आमने-सामने हैं। इन सब के बीच एक ही सवाल है कि हूतियों पर पिछले 10 साल में सऊदी अरब, यूएई, अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल ने कई बार हवाई हमले किए। फिर भी हूती कमजोर नहीं हुए। उल्टे और मजबूत हो गए। अब ये लाल सागर के जरूरी व्यापारिक रास्ते और सऊदी तेल ठिकानों पर हमला कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि ईरान की मदद, पहाड़ी इलाका और सस्ते ड्रोन-मिसाइल इनकी ताकत बन गए हैं।

पहाड़ी इलाका इनका बड़ा फायदा

बताया जाता है कि हूती बड़े और पहाड़ी इलाके में फैले हुए हैं। वहां वे लड़ाके और हथियार छिपा सकते हैं। साथ ही तेल के ठिकानों और व्यापारिक रास्तों को निशाना बना सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र और विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान और उसके सहयोगी लेबनान तथा इराक से इन्हें ट्रेनिंग, हुनर और आधुनिक हथियार मिलते हैं। इनकी कट्टर सोच बाकी काम कर देती है।

न्यूयॉर्क की फर्म होराइजन एंगेज के रिसर्च प्रमुख माइकल नाइट्स कहते हैं कि ईरान के क्षेत्रीय साथियों में ये सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध, सोच में सबसे कट्टर और सबसे हमलावर हैं। ईरान ने इन्हें बहुत जल्दी तैयार कर दिया। जो काम हिजबुल्लाह को 20 साल में हुआ, हूतियों ने पांच साल में कर लिया।

हथियारों की लंबी लिस्ट

हूतियों के पास एक से बढ़कर एक हथियार है। बताया जाता है कि बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और ड्रोन हैं। कई हथियार ईरानी मॉडल जैसे दिखते हैं। ये खाड़ी देशों और इजरायल तक पहुंच सकते हैं। लाल सागर में जहाजों पर हमले के लिए उन्होंने एंटी-शिप मिसाइल और समुद्री ड्रोन भी चलाए हैं। इससे एक बड़ा व्यापारिक रास्ता खतरे में है। हालांकि ईरान कहता है कि वह हूतियों को हथियार नहीं देता। ऐसा करना संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध के खिलाफ होगा। लेकिन यमन जा रहे कई जहाजों से ईरानी हथियार और पुर्जे पकड़े गए हैं। 2024 की संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में हूतियों, ईरान और उसके अन्य साथियों के गहरे सैन्य रिश्ते बताए गए थे।

रिपोर्ट के अनुसार 2015 में हूती लड़ाके करीब 30 हजार थे। 2024 तक यह संख्या 3 लाख 50 हजार तक पहुंच गई। 2015 में सऊदी अरब ने यमन के गृहयुद्ध में हाउथियों के खिलाफ हमला किया था और समुद्री नाकाबंदी भी लगाई थी। इतना ही नहीं, हूती सस्ते ड्रोन और मिसाइल से सऊदी अरब के तेल ठिकानों और समुद्र में टैंकरों पर हमला कर सकते हैं। माना जाता है कि ईरान उन्हें गाइडेंस सिस्टम जैसे आधुनिक पुर्जे देता है। लेकिन ज्यादातर हथियार वे खुद बना लेते हैं।

दूसरी ओर सऊदी अरब के पास अमेरिका से मिले आधुनिक विमान और मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं। ईरान के खिलाफ युद्ध में इनका इस्तेमाल हुआ था। लेकिन महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का स्टॉक कितना चलेगा, यह साफ नहीं है। खतरा सिर्फ हूतियों से नहीं, इराक की ईरान समर्थित मिलिशिया से भी है। उन पर तेल पाइपलाइन पर हमले का आरोप लगते रहे हैं।

हवाई हमलों से फर्क नहीं पड़ता

जानकार बताते हैं कि हूतियों पर हवाई हमले से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसके लिए वे कारण भी बताते हैं। दरअसल, 2015 में सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ युद्ध शुरू किया। तब विद्रोहियों ने राजधानी सना समेत उत्तरी और मध्य यमन का बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया था। सऊदी को डर था कि सीमा पर हथियारबंद ईरानी प्रॉक्सी और बढ़ जाएगी। अगले सात साल सऊदी ने कई दौर के हवाई हमले किए। इनमें आम नागरिक भी मारे गए। यमनी सरकारी सेना और दक्षिणी अलगाववादी हाउथियों को पीछे नहीं धकेल सके। 2022 के युद्धविराम तक लड़ाई की रेखाएं ज्यादा नहीं बदलीं।

गाजा युद्ध शुरू होने के बाद हाउथियों ने लाल सागर में जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। उन्होंने इसे इजरायल की नाकाबंदी बताया। जनवरी 2024 से अमेरिका और ब्रिटेन ने हूतियों पर हमले किए। उसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेज हवाई अभियान चलाया। एक अमेरिकी अधिकारी ने एपी को बताया था कि करीब 2000 गोला-बारूद से 1000 से ज्यादा ठिकाने निशाने पर लिए गए। सिर्फ अमेरिकी गोला-बारूद की लागत 75 करोड़ डॉलर से ज्यादा बताई गई। इस दौरान हूतियों ने सात अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन गिरा दिए। हर ड्रोन की कीमत 3 करोड़ डॉलर से ज्यादा थी। 6 करोड़ डॉलर से महंगा एक F/A-18 लड़ाकू विमान विमानवाहक पोत से फिसल गया।

हफ्तों हमलों के बाद हूती अमेरिकी जहाजों पर हमला रोकने को राजी हुए। लेकिन इजरायल पर हमले जारी रहे। जवाब में इजरायल ने 2025 में हमले किए। इनमें हूती प्रधानमंत्री और अन्य बड़े नेता मारे गए। एक अहम बंदरगाह पर भी बार-बार हमले हुए। ईरान युद्ध के शुरुआती महीनों में हूती ज्यादातर अलग रहे। जुलाई में उन्होंने सऊदी पर हमले फिर शुरू कर दिए और सऊदी जहाजों की नाकाबंदी की घोषणा कर दी।

जमीन पर सेना के बिना जीत मुश्किल

इन युद्धों से साफ है कि इनके खिलाफ सिर्फ हवाई हमले काफी नहीं है। हमले के बाद इलाका कब्जाने के लिए जमीनी सेना चाहिए। यमन में हूतियों के दुश्मन खुद बंटे हुए हैं। जनवरी में वे एक-दूसरे से भी लड़े। एक तरफ सऊदी समर्थित सरकार के लड़ाके हैं, दूसरी तरफ यूएई समर्थित दक्षिणी अलगाववादी। यूएई कभी-कभी सऊदी का प्रतिद्वंद्वी रहा है और 2019 में यमन से पीछे हट गया था।

ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थॉमस जुनेउ कहते हैं कि आधी कहानी ईरानी मदद की है, और वह बहुत जरूरी है। बाकी आधी कहानी उनके दुश्मनों की कमजोरी है। यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता वाली सरकार टूटी हुई, कमजोर, बिखरी और भ्रष्ट है। हूतियों ने इसका फायदा उठाया है।

हाल के दिनों में हूती विरोधी सेनाएं कई ठिकानों से पीछे हट गई हैं। विद्रोही बाब अल-मंडेब की ओर बढ़ रहे हैं। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच का संकरा रास्ता है। सऊदी अरब बड़े जमीनी युद्ध में उतरने से हिचकिचा रहा है। इसमें लंबी लड़ाई और भारी नुकसान होगा। अमेरिका भी ईरान से जुड़ी समस्याओं में फंसा है और दूर रहना चाहता है।

दूसरी ओर सऊदी ने पिछले महीने तुर्की और पाकिस्तान से आपसी रक्षा समझौता किया। लेकिन अभी उसे चालू नहीं किया गया है। फिलहाल कूटनीति के रास्ते भी कम हैं। हूती सऊदी से नाकाबंदी हटाने की मांग कर रहे हैं। यह लंबे युद्ध में हार मानने जैसा होगा। इससे ईरान से और मदद का रास्ता भी खुल जाएगा। जुनेउ कहते हैं कि जब तक अमेरिका-ईरान तनाव नहीं सुलझता, सऊदी और ईरान के बीच खास प्रगति नहीं होगी। हूती इस वक्त बहुत जिद्दी हैं। फिलहाल कोई रियायत देने को तैयार नहीं हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN