Home National news hindi सऊदी अरब पर हूतियों के हमले रोकने में अमेरिका मदद क्यों नहीं...

सऊदी अरब पर हूतियों के हमले रोकने में अमेरिका मदद क्यों नहीं कर रहा, ये हैं चार कारण

6
0

Source :- BBC INDIA

सऊदी-अमेरिका

प्रकाशित

पढ़ने का समय: 10 मिनट

इस साल जुलाई में कई वर्षों से जारी संघर्ष के दोबारा भड़कने के बाद से ईरान समर्थित हथियारबंद समूह हूती ने पूरे सऊदी अरब में सैकड़ों हमले किए हैं.

रियाद के मुख्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हमले में 13 लोगों की मौत हो गई और 300 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हो गए.

मरने वालों में एक अमेरिकी नागरिक भी शामिल था. इन हमलों ने अब क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के विजन 2030 पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विजन 2030 का मक़सद सऊदी अरब को फ़ाइनैंशियल हब के रूप में विकसित करना है.

सऊदी अरब इतने हमले झेल रहा है, ऐसे में ज़्यादातर लोगों के मन में यही सवाल है कि अमेरिका उसकी मदद क्यों नहीं कर रहा है?

1. ऐतिहासिक वजहें

1945 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक किंग अब्दुलअज़ीज़ इब्न सऊद के बीच एक ऐतिहासिक मुलाक़ात हुई थी. दोनों के बीच एक मुद्दे पर गहरे मतभेद थे. अमेरिका इसराइल की स्थापना का समर्थन कर रहा था, जबकि सऊदी किंग इसके विरोध में थे.

इसके बावजूद, इस मुलाक़ात ने सुरक्षा के बदले तेल की व्यवस्था की नींव रखी.

1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद सऊदी और अमेरिका के संबंध और गहरे हो गए. इस क्रांति से ईरान में अमेरिका समर्थित राजशाही को सत्ता से हटा दिया गया था. 1990 में जब इराक़ ने कुवैत पर हमला किया और उसके बाद पड़ोसी सऊदी अरब को भी निशाना बनाने की धमकी दी, तब अमेरिकी सेना सऊदी अरब की मदद के लिए पहुँची.

1973 में सऊदी अरब ने अरब देशों के साथ मिलकर अमेरिका और उन अन्य देशों के ख़िलाफ़ तेल देने से इनकार किया, जिन्होंने उस साल अरब-इसराइल युद्ध में इसराइल का समर्थन किया था. इससे पश्चिमी देशों में आर्थिक मंदी को बढ़ावा मिला.

2001 में दोनों देशों के संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए, जब यह स्पष्ट हुआ कि अमेरिका पर 11 सितंबर के हमलों की साज़िश सऊदी नागरिकों ने रची थी और उन्हें अंजाम देने की ज़्यादातर ज़िम्मेदारी भी सऊदी नागरिकों की थी.

पिछले एक दशक में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ऐसे कई क़दम उठाए, जो अमेरिका को असहज करने वाले थे.

उन्होंने 2017 में क़तर की नाकेबंदी शुरू की, जो क्षेत्र में अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अड्डे की मेज़बानी करता है. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में सऊदी अरब के साथ रिश्तों में गर्मजोशी भरी लेकिन दूसरा कार्यकाल पूरी दुनिया के लिए अलग है तो इसमें सऊदी अरब भी अपवाद नहीं है.

ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में पहला विदेशी दौरा सऊदी अरब का किया था और दूसरे कार्यकाल में भी विदेशी दौरे का आग़ाज़ सऊदी से ही किया. लेकिन चीज़ें अचानक से बदलती क्यों दिख रही हैं?

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में इस बात को और ज़्यादा बल मिला है कि अमेरिका के भरोसे रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं है.

2021 में अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी एक अहम मिसाल है. इसके अलावा मिस्र में अमेरिका ने अपने सहयोगी होस्नी मुबारक का समर्थन वापस ले लिया था. इसके बाद मिस्र के राष्ट्रपति को सत्ता छोड़नी पड़ी थी.

सऊदी-अमेरिका

2. मिडटर्म इलेक्शन

जियोपॉलिटिक्स में कहा जाता है कि कोई भी दोस्ती हितों की पूर्ति से परे नहीं होती है. अमेरिका अब ऊर्जा के मामले में सऊदी पर निर्भर नहीं है. अमेरिका में शेल तेल के उत्पादन में आई तेज़ी ने उसे दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बना दिया है.

इससे विदेशी तेल आपूर्ति पर उसकी निर्भरता कम हो गई है. अमेरिका जितना कच्चा तेल आयात करता है, उसमें अब तक मध्य-पूर्व के बजाय कनाडा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा है. अब ट्रंप ने रूस से भी ऊर्जा आपूर्ति के लिए बात की है.

अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन होने जा रहा है और वहाँ के लोग बढ़ती महंगाई से ट्रंप से ख़फ़ा हैं. कांग्रेस पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी का जीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

मध्य-पूर्व मामलों की एक्सपर्ट जैस्मिन अल-गमाल अमेरिकी प्रसारक सीएनएन से कहा, ”अमेरिकी जनता यह नहीं समझ पा रही है कि अमेरिका मध्य-पूर्व में क्या कर रहा है. पेट्रोल की क़ीमतें और किराने के सामान की क़ीमतें क्यों बढ़ रही हैं. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस सब से उन्हें क्या हासिल हो रहा है.”

”ऐसे में आप समझ सकते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप इस समय सबसे आख़िरी चीज़ जो चाहेंगे, वह है मध्य पूर्व में और सैन्य कार्रवाई करना, जबकि उसका कोई स्पष्ट मक़सद न हो और उसका संबंध अमेरिकी नागरिकों के भले या उनकी आजीविका से न जुड़ता हो. ख़ासकर तब, जब मिडटर्म इलेक्शन नज़दीक हैं.

इसलिए अमेरिका इस समय काफ़ी मुश्किल स्थिति में है. मेरा मानना है कि अमेरिका सऊदी अरब का समर्थन करना चाहेगा, क्योंकि सऊदी अरब उसका एक अहम सहयोगी है. राष्ट्रीय सुरक्षा के नज़रिए से भी अमेरिका नहीं चाहेगा कि ऐसा लगे कि वह इस समय अपने सहयोगियों को अकेला छोड़ रहा है. लेकिन अमेरिका को इस स्थिति को अपने देश के घरेलू हालात के साथ संतुलित करना होगा और घरेलू परिस्थितियां मध्य-पूर्व में और सैन्य कार्रवाई करने के पक्ष में नहीं दिखती हैं.”

यमन

3. ट्रंप की अस्थिर नीतियां

अमेरिकी ब्रॉडकास्टर सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, सऊदी अरब का ग़लत आकलन यह था कि उसने अमेरिका के लगातार समर्थन पर भरोसा किया.

पिछले साल अमेरिका के साथ नया रक्षा समझौता करने और अमेरिका की ओर से प्रमुख ग़ैर-नेटो सहयोगी का दर्जा दिए जाने के बावजूद, सऊदी अमेरिकी प्रतिबद्धता में आती कमी को लेकर निराश हुआ है.

”सूत्रों ने उस समय सीएनएन को बताया था कि प्रिंस मोहम्मद ने पिछले महीने ट्रंप से दो बार फोन पर बात की और उनसे हूतियों पर हमला करने का आग्रह किया, लेकिन ट्रंप ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. इसके बजाय, वॉशिंगटन ने ओमान में हूतियों के साथ बातचीत की. इसका मक़सद इस समूह के साथ अपने संघर्षविराम को सुरक्षित रखना था. हूतियों ने स्पष्ट कर दिया था कि उनका युद्ध केवल सऊदी अरब के ख़िलाफ़ है. इससे अमेरिकी जहाज़ों को लाल सागर से बिना किसी बाधा के गुज़रने का रास्ता मिल गया.”

सऊदी अरब में अमेरिका के राजदूत रहे माइकल रैटनी ने कहा कि जिस सेना ने अमेरिका के साथ साझेदारी को अपनी पूरी समझ का आधार बनाया है, उसे अब एहसास हो रहा है कि ट्रंप कितने अप्रत्याशित हैं.

उन्होंने कहा, “सऊदी अरब की सेना की रणनीति या उसकी संरचना कभी ऐसी नहीं रही कि वह इन युद्धों को अकेले लड़े. अगर अमेरिका में कोई सामान्य राष्ट्रपति होता और ऐसी स्थिति पैदा होती, तो हम एक तर्कसंगत और सोच-समझकर अपनाई गई प्रक्रिया के तहत अपने सहयोगी की मदद करते.”

जैस्मिन अल-गमाल

उन्होंने कहा, “अब हमारे पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है. आख़िरकार, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि ट्रंप क्या सोचते हैं. और संभवतः इसी वजह से सऊदी अरब को लग रहा है कि वह असुरक्षित स्थिति में है. सऊदी अरब बस इतना चाहता था कि यह संघर्ष उससे जितना संभव हो, उतना दूर रहे और हूती उसके बदलाव और विकास की योजनाओं में बाधा न डालें. लेकिन अब वह ख़ुद इस संघर्ष के बीच में फँस गया है.”

अमेरिका से निराशा हाथ लगने के बाद सऊदी अरब ने दूसरे देशों की ओर रुख़ किया है. पिछले महीने क्राउन प्रिंस मिस्र गए, जहाँ उन्होंने राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से मुलाक़ात की. इसके कुछ सप्ताह बाद उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के उपराष्ट्रपति शेख मंसूर बिन ज़ायद को क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर चर्चा के लिए रियाद आमंत्रित किया.

फ्रांस ने सैन्य कर्मियों सहित रक्षा संसाधनों की तैनाती पर सहमति जताई. ब्रिटेन ने कहा कि वह सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरने में मदद के लिए एक विमान भेजेगा. अमेरिका के 100 से अधिक सैन्य सलाहकार भी ज़मीन पर मौजूद हैं. वे हाल ही में स्थापित संयुक्त सैन्य कमान के तहत ख़ुफ़िया जानकारी और हमलों के लिए लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता दे रहे हैं.

पिछले हफ़्ते सोमवार को रियाद में हुई आपात बैठक के बाद सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का रक्षा समझौते एक्टिवेट पर सहमति जताई. लेकिन सऊदी को अभी कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है.

रियाद-हूती

4. हूती सऊदी की समस्या

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से अटलांटिक काउंसिल की निदेशक और यमन के लिए अमेरिका की पूर्व उप विशेष दूत एलिसन माइनर ने कहा, “ट्रंप के मन में असल सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब के इस मौजूदा सैन्य अभियान में सफलता हासिल करने का कोई रास्ता है. यमन की सरकार को कुछ कामयाबी मिल सकती है, लेकिन हूतियों के नियंत्रण वाले सभी इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने के दावे पर संदेह ज़्यादा है.”

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सोमवार को कहा कि सऊदी अरब को अपनी रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन उन्होंने इस बारे में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि अमेरिका उसे किस तरह की मदद देगा. ट्रंप ने पत्रकारों से कहा है कि जवाबी सैन्य अभियान का अंजाम बहुत अच्छा होगा.

ट्रंप के पूर्ववर्ती जो बाइडन ने 2024 में खुले तौर पर स्वीकार किया था कि हूतियों के ख़िलाफ़ बमबारी अभियान के प्रभावी न होने के बावजूद उनके हमलों को रोकना मुश्किल है. उन्होंने कहा था, “क्या वे हूतियों को रोक पा रहे हैं? नहीं. क्या वे हमले जारी रखेंगे? हां.”

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की विश्लेषक दीना एस्फंदियारी और बेक्का वासर ने मंगलवार को जारी एक शोध टिप्पणी में कहा, “अमेरिका मौजूदा लड़ाई को काफ़ी हद तक सऊदी अरब की समस्या मानता है. इसकी एक वजह यह है कि वह ईरान के साथ जारी संघर्ष को सीमित करके मुख्य रूप से होर्मुज़ स्ट्रेट पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है.”

उन्होंने कहा, “रियाद संभवतः और ज़्यादा मदद मांगता रहेगा, लेकिन अमेरिका सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन को पहले से दी जा रही सहायता से आगे बढ़कर मदद देने की संभावना नहीं रखता.”

यमन हूती

अब्राहम एकॉर्ड्स

ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से ही चाहते हैं कि सऊदी अरब अब्राहम एकॉर्ड के तहत इसराइल से रिश्ते सामान्य करे. लेकिन सऊदी अरब इसके लिए अभी तक तैयार नहीं है. यूएई पर हमले रोकने में इसराइल ने मदद की है. इसराइली अख़बार हेरात्ज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ सऊदी अरब के साथ भी इसराइल सहयोग करना चाहता है लेकिन क्राउन प्रिंस इसके लिए तैयार नहीं हैं.

हेरात्ज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, नेतन्याहू हूतियों पर हमला करना चाहते हैं और सऊदी अरब की रक्षा करना चाहते हैं, ताकि सऊदी नेतृत्व को यह दिखाया जा सके कि इसराइल उसके लिए रणनीतिक रूप से कितना उपयोगी है. इसके ज़रिए वह सऊदी अरब को रक्षा समझौते और अब्राहम एकॉर्ड्स के तहत इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए भी राज़ी करना चाहते हैं.

हालांकि, मोहम्मद बिन सलमान ने अब तक इसका विरोध किया है. यह समझा जा सकता है कि एमबीएस इसराइल की किसी भी भूमिका को स्वीकार नहीं करना चाहते, या कम से कम उसकी भूमिका सार्वजनिक नहीं होने देना चाहते. ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे इस्लामी दुनिया में सऊदी अरब की स्थिति और प्रतिष्ठा को गंभीर नुक़सान पहुँच सकता है.

लेकिन यह स्थिति इस बात को भी दर्शाती है कि रियाद फ़िलहाल कितनी कठिन रणनीतिक परिस्थिति में फँसा हुआ है.

2019 में ड्रोन ने सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में स्थित अबकैक के एक तेल ठिकाने और खुरैस के एक तेल क्षेत्र को निशाना बनाया था. शुरुआत में हूतियों ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी. इसी अनुभव के कारण 2022 में अमेरिका के साथ पारस्परिक रक्षा संधि पर बातचीत शुरू हुई. लेकिन यह मुकाम तक नहीं पहुँचा.

इसके बावजूद, सऊदी अरब अमेरिका के साथ अधिक घनिष्ठ सुरक्षा साझेदारी की कोशिश करता रहा. नवंबर 2025 में क्राउन प्रिंस ने अमेरिका का दौरा भी किया. अमेरिका ने उसे एफ-35 लड़ाकू विमान बेचने पर सहमति जताई और उसके साथ एक नए रणनीतिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए.

दोनों देशों ने अपनी सैन्य साझेदारी में कई दशक लगाए हैं.

माइकल रैटनी की राय

माइकल रैटनी ने इस सवाल का जवाब दिया है कि अगर सऊदी अरब पर उसके कट्टर दुश्मन की ओर से हमला होता है, तो अमेरिका क्या करेगा? प्रमुख ग़ैर-नेटो सहयोगी का दर्जा दिए जाने का वास्तविक अर्थ क्या है? क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों से जुड़े बड़े फ़ैसलों में सऊदी अरब को किस हद तक शामिल किए जाने की उम्मीद करनी चाहिए, ख़ासकर तब, जब उन फ़ैसलों का सीधा असर सऊदी अरब और उसके पड़ोसी देशों पर पड़ता हो?

अमेरिका को यह भी उम्मीद रखनी चाहिए कि सऊदी अरब दूसरे रक्षा साझेदारों की तलाश करेगा. इसका मतलब मौजूदा साझेदारों की जगह नए साझेदार लाना नहीं, बल्कि अपनी रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करना और उनमें अतिरिक्त सहायता जोड़ना होगा.

हाल में हुआ मक्का समझौता इसका अच्छा उदाहरण है. इस समझौते के तहत सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये एक साथ आए हैं. इसे पारस्परिक रक्षा समझौते के रूप में पेश किया गया है.

तात्कालिक तौर पर सऊदी अरब के सामने वही दो विकल्प हैं, जो हमेशा से रहे हैं: सैन्य कार्रवाई और कूटनीति. फिलहाल सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान चला रहा है और एक तरह से उसके पास ऐसा न करने का विकल्प भी नहीं है. सऊदी अरब पर हमले हो रहे हैं और राजनीतिक रूप से उसके लिए जवाबी कार्रवाई करना जरूरी है.

रैटनी कहते हैं, ”लेकिन अंततः उम्मीद यही करनी चाहिए कि वह कूटनीति की ओर लौटेगा. यह कूटनीति भले ही अपूर्ण हो और संतोषजनक न लगे, लेकिन इससे संघर्ष को कम करने में मदद मिल सकती है.

संभव है कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत ईरान के साथ बातचीत से करनी पड़े. ऐसी खबरें आई थीं कि अरब खाड़ी देशों की ओमान में ईरानी वार्ताकारों के साथ बैठक करने की योजना थी. हालांकि, यह बैठक फिलहाल टलती दिखाई दे रही है.

लेकिन संभवतः यही वह दिशा है, जिस ओर यह संघर्ष आगे बढ़ेगा. इसमें ऐसी कूटनीतिक प्रक्रिया शामिल हो सकती है, जिसमें अमेरिका की भागीदारी जरूरी न हो. इसके तहत ईरान के साथ एक ऐसा समझौता या सह-अस्तित्व की व्यवस्था बनाने की कोशिश की जाएगी, जो असहज और अधूरी होने के बावजूद दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो. इससे हूतियों के साथ जारी संघर्ष को कम करने का रास्ता तैयार हो सकता है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS