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सी-सेक्शन डिलीवरी के बाद पेट को पहले जैसा बनाने के उपाय

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Source :- BBC INDIA

सी-सेक्शन सर्जरी के बाद एक महिला का पेट

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सी-सेक्शन यानी सिजेरियन डिलीवरी के बाद कई महिलाओं का पेट महीनों बाद भी सामान्य नहीं दिखाई देता है.

इसी वजह से लोगों के बीच अक्सर यह धारणा बन जाती है कि “सी-सेक्शन होने के बाद पेट हमेशा के लिए बाहर निकल जाता है.”

सोशल मीडिया पर इसे ‘सी-सेक्शन पाउच’ कहा जाता है और इस पर काफ़ी चर्चा भी होती है.

लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसके पीछे सिर्फ़ सर्जरी ज़िम्मेदार नहीं होती, बल्कि प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में होने वाले बदलाव भी इसकी बड़ी वजह होते हैं.

गर्भावस्था के दौरान बढ़ते हुए बच्चे के लिए पेट की मांसपेशियां, त्वचा और कनेक्टिव टिश्यू काफ़ी ज़्यादा खिंच जाते हैं. डिलीवरी के बाद इन सभी हिस्सों को पहले जैसी स्थिति में आने में समय लगता है.

कुछ महिलाओं में मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं, पेट की मांसपेशियों के बीच गैप बन जाता है, त्वचा ढीली पड़ जाती है या वजन बढ़ जाता है. इन वजहों से पेट पहले से ज़्यादा उभरा हुआ दिखाई दे सकता है.

इसलिए डिलीवरी के तुरंत बाद पेट का पहले जैसा न दिखना ज़्यादातर मामलों में शरीर की सामान्य रिकवरी प्रक्रिया का हिस्सा होता है.

ऐसे में सवाल यह है कि सी-सेक्शन के बाद पेट बाहर रहने की असली वजह क्या होती है और किन लक्षणों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

‘सी-सेक्शन पाउच’ क्यों दिखाता है?

सी-सेक्शन सर्जरी के बादत उभरा हुआ पेट

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डिलीवरी के बाद पेट के उभरे हुए दिखने के पीछे कई कारण हो सकते हैं.

गर्भावस्था के दौरान पेट की मांसपेशियों और कनेक्टिव टिश्यू पर ज़्यादा दबाव पड़ने की वजह से कुछ महिलाओं में पेट की सीधी मांसपेशियों के बीच दूरी बढ़ जाती है.

इस स्थिति को ‘डायस्टेसिस रेक्टी’ कहा जाता है. इसके अलावा बढ़ा हुआ वजन, त्वचा का ढीलापन, हार्मोनल बदलाव, शरीर में पानी जमा होना और डिलीवरी के बाद शारीरिक गतिविधि कम हो जाना भी पेट के आकार को प्रभावित कर सकता है.

सी-सेक्शन के बाद जब ऑपरेशन का घाव भरता है, तो वहां बनने वाले टिश्यू की वजह से पेट के निचले हिस्से में हल्की-सी सिलवट या उभार दिखाई दे सकता है.

इसी वजह से कई महिलाओं को लगता है कि उनका पेट सिर्फ़ ऑपरेशन की वजह से बाहर निकल आया है. जबकि ज़्यादातर मामलों में यह शरीर के ठीक होने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होता है.

डिलीवरी के बाद पेट की मांसपेशियों को पूरी तरह ठीक होने में सिर्फ़ कुछ हफ़्ते नहीं, बल्कि कई महीने लग सकते हैं. मांसपेशियों, त्वचा और टिश्यू को पहले जैसी स्थिति में लौटने के लिए शरीर को पर्याप्त समय चाहिए.

इसलिए धैर्य रखना, संतुलित आहार लेना और एक्सपर्ट की सलाह से नियमित व्यायाम करना बेहद ज़रूरी है.

हालांकि अगर सी-सेक्शन के बाद तेज़ दर्द, असामान्य सूजन, बुखार या ऑपरेशन वाली जगह पर कोई गांठ महसूस हो, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.

क्या सी-सेक्शन की वजह से पेट बाहर निकला हुआ दिखता है?

सी-सेक्शन पाउच

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इस बारे में हमने डॉ. नेहा अभिजीत पवार से बात की. वह मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में गायनी कंसल्टेंट हैं.

उन्होंने बताया, “जिसे लोग ‘सी-सेक्शन पाउच’ कहते हैं, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह गर्भावस्था के दौरान शरीर में होने वाले बदलाव हैं. प्रेग्नेंसी के समय पेट की मांसपेशियां काफ़ी ज़्यादा खिंच जाती है. “

“वहीं, सी-सेक्शन के लिए लगाया गया चीरा और उसके बाद बनने वाला निशान भरने की प्रक्रिया के दौरान नीचे की तरफ़ हल्का-सा फोल्ड बना सकता है. इसी वजह से पेट का निचला हिस्सा थोड़ा ज़्यादा उभरा हुआ नज़र आ सकता है.”

उन्होंने कहा, “हालांकि इसके लिए सिर्फ़ सर्जरी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. शरीर की बनावट, त्वचा की लचक, घाव भरने की प्रक्रिया और पेट की मांसपेशियों की मज़बूती जैसे कई फैक्टर मिलकर तय करते हैं कि पेट का आकार कैसा दिखेगा. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पेट का उभार सिर्फ़ सी-सेक्शन की वजह से ही होता है.”

मुख्य वजहें क्या हैं?

  • पेट की दीवार (एब्डोमिनल वॉल) का ज़्यादा खिंच जाना
  • कोर यानी पेट और कमर के आसपास की मांसपेशियों का कमज़ोर पड़ जाना
  • पेट की सीधी मांसपेशियों के बीच गैप आ जाना (डायस्टेसिस रेक्टी)
  • शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होना
  • त्वचा का ढीला पड़ जाना
  • शरीर में पानी रुकना और हार्मोनल बदलाव
  • डिलीवरी के बाद रिकवरी के दौरान शारीरिक गतिविधियां कम हो जाना

ज़्यादातर मामलों में डिलीवरी के बाद पेट का बाहर निकला हुआ दिखना किसी सर्जरी में हुई गड़बड़ी का संकेत नहीं होता. बल्कि यह शरीर के प्राकृतिक रूप से ठीक होने और गर्भावस्था व प्रसव के दौरान हुए बदलावों से उबरने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होता है.

सी-सेक्शन के बाद पेट को पहले जैसा होने में कितना वक़्त लगता है?

सी-सेक्शन के बाद एक महिला

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इस बारे में डॉ. नेहा पवार बताती हैं, “सी-सेक्शन के बाद शुरुआती घाव भरने में आमतौर पर 6 से 8 हफ़्ते का समय लगता है. लेकिन एब्डोमिनल वॉल को पूरी तरह रिकवर होने में 6 महीने से लेकर एक साल या उससे भी ज़्यादा समय लग सकता है.”

“इस दौरान धीरे-धीरे मांसपेशियां मज़बूत होती हैं, कनेक्टिव टिश्यू की मरम्मत होती है और त्वचा में भी कसाव वापस आने लगता है.”

उन्होंने कहा, “रिकवरी की रफ़्तार हर महिला में अलग होती है. यह खानपान, शारीरिक गतिविधि, स्तनपान, ओवरऑल हेल्थ और कितनी बार प्रेग्नेंसी हुई है, जैसे कई फै़क्टर्स पर निर्भर करती है.”

“इसलिए महिलाओं को अपने शरीर को पर्याप्त समय देना चाहिए और अपनी रिकवरी की तुलना किसी दूसरी महिला से नहीं करनी चाहिए.”

डायस्टेसिस रेक्टी क्या है?

डायस्टेसिस रेक्टी

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डायस्टेसिस रेक्टी एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भावस्था के दौरान कनेक्टिव टिश्यू के ज़्यादा खिंचने की वजह से पेट की दोनों सीधी मांसपेशियां एक-दूसरे से अलग हो जाती हैं.

यह डिलीवरी के बाद होने वाली एक आम समस्या है और यह सामान्य प्रसव (नॉर्मल डिलीवरी) के साथ-साथ सी-सेक्शन के बाद भी हो सकती है. इसकी मुख्य वजह डिलीवरी का तरीक़ा नहीं, बल्कि गर्भावस्था के दौरान शरीर में होने वाले बदलाव होते हैं.

इस बारे में डॉ. नेहा पवार बताती हैं, “डायस्टेसिस रेक्टी होने पर महिलाओं का पेट उभरा हुआ या फूला हुआ दिखाई दे सकता है. इसके अलावा कोर मसल्स कमज़ोर पड़ सकती हैं और कमर या पीठ में असहजता भी महसूस हो सकती है.”

“ज़्यादातर मामलों में यह समस्या डिलीवरी के बाद पहले एक साल के भीतर अपने आप काफ़ी हद तक ठीक हो जाती है. लेकिन अगर मांसपेशियों के बीच का गैप लंबे समय तक बना रहता है, तो एक्सपर्ट की निगरानी में फ़िज़ियोथेरेपी और कोर मसल्स को मज़बूत करने वाले ख़ास व्यायाम काफ़ी फायदेमंद साबित हो सकते हैं.”

हमने एक्सपर्ट से यह भी पूछा कि क्या डायस्टेसिस रेक्टी की जांच घर पर की जा सकती है या इसके लक्षणों का ख़ुद पता लगाया जा सकता है.

इस बारे में मुंबई सेंट्रल स्थित वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स की प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रिचा भारद्वाज ने जानकारी दी.

डॉ. रिचा ने बताया, “महिलाएं घर पर इसकी शुरुआती जांच ख़ुद कर सकती हैं, लेकिन यह किसी विशेषज्ञ की जांच का विकल्प नहीं है. स्त्री रोग विशेषज्ञ या महिलाओं के स्वास्थ्य में विशेषज्ञता रखने वाले फिजियोथेरेपिस्ट यह सही तरीक़े से जांच सकते हैं कि पेट की मांसपेशियों के बीच कितना गैप है और कोर मसल्स कितनी अच्छी तरह काम कर रही हैं. इसके आधार पर वे सही इलाज और रिकवरी का प्लान बता सकते हैं.”

उन्होंने कहा, “अगर लंबे समय तक पेट का उभार बना रहे, दर्द हो या इसकी वजह से रोज़मर्रा के काम करने में परेशानी होने लगे, तो बिना देरी किए किसी विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए.”

सी-सेक्शन के बाद एक्सर्साइज़ कब शुरू करनी चाहिए?

एकसरसाइज़ करती महिला (सांकेतिक तस्वीर)

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सी-सेक्शन के बाद महिलाएं अक्सर पूछती हैं कि पूरी तरह रिकवरी के लिए कौन-से व्यायाम सबसे फ़ायदेमंद हैं और शुरुआत में किन एक्सरसाइज़ से बचना चाहिए.

इस बारे में डॉ. रिचा भारद्वाज बताती हैं, “शुरुआती दिनों में हल्के ब्रीदिंग एक्सरसाइज़, पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़, डीप कोर एक्टिवेशन और धीरे-धीरे पैदल चलना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है. ये एक्सरसाइज़ ऑपरेशन के बाद भर रहे टिश्यू पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना मांसपेशियों की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे वापस लाने में मदद करती हैं.”

उन्होंने कहा, “रिकवरी के शुरुआती दौर में तेज़ दौड़ना, भारी वजन उठाना, पेट की हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज़, सिट-अप्स, क्रंचेस और प्लैंक जैसे व्यायाम नहीं करने चाहिए. ख़ासकर अगर डायस्टेसिस रेक्टी की समस्या हो, तो ये एक्सरसाइज़ पेट की दीवार पर दबाव बढ़ा सकती हैं और रिकवरी की प्रक्रिया को धीमा कर सकती हैं.”

कौन सी एक्सरसाइज़ सबसे ज्यादा फ़ायदेमंद है?

पेल्विक फ़्लोर एक्सरसाइज़

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इस बारे में पनवेल के बैलेन्सिया फ़िज़ियोथेरेपी सेंटर की डॉ. प्रियंका धारगलकर बताती हैं, “रिकवरी के शुरुआती दौर में डायाफ्रामेटिक ब्रीदिंग (पेट से गहरी सांस लेने की एक्सरसाइज़), पेल्विक फ्लोर मसल्स को एक्टिव करना, कोर मसल्स को हल्के-हल्के मज़बूत करने वाली एक्सरसाइज़ और नियमित वॉक पर ध्यान देना चाहिए.”

“इसके बाद धीरे-धीरे रोजमर्रा के कामों के लिए ताकत बढ़ाने वाली एक्सरसाइज़ और फिर पिलाटीज़ की ओर बढ़ा जा सकता है.”

उन्होंने कहा, “हालांकि शुरुआत में ऐसी कोई भी एक्सर्साइज़ नहीं करनी चाहिए जिससे पेट की दीवार पर ज़्यादा दबाव पड़े. इसमें पारंपरिक सिट-अप्स, क्रंचेस, बहुत ज्यादा इंटेंस प्लैंक, भारी वजन उठाना और हाई-इम्पैक्ट एक्सरसाइज़ शामिल हैं.”

“जब तक ऑपरेशन का घाव अच्छी तरह भर न जाए और कोर मसल्स पर बेहतर नियंत्रण न आ जाए, तब तक इन एक्सरसाइज़ से बचना जरूरी है.”

क्या इस दौरान पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़ करनी चाहिए?

पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़ के बारे में डॉ. प्रियंका धारगलकर बताती हैं, “पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां, पेट की गहरी मांसपेशियां, डायाफ्राम और पीठ की मांसपेशियां मिलकर एक यूनिट की तरह काम करती हैं.”

“जब पेल्विक फ्लोर की ताकत और इन मांसपेशियों के बीच तालमेल बेहतर होता है, तो कोर मसल्स को फिर से मज़बूती और स्थिरता मिलने में मदद मिलती है. इससे पेट की कार्यक्षमता सुधरती है, शरीर का पोस्चर बेहतर रहता है और डिलीवरी के बाद रिकवरी भी तेज होती है.”

उन्होंने आगे कहा, “हालांकि रिकवरी या रिहैबिलिटेशन का मकसद सिर्फ पेट का आकार कम करना या उसे पहले जैसा दिखाना नहीं होना चाहिए. असली लक्ष्य शरीर की ताकत, स्थिरता और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता को बेहतर बनाना होना चाहिए.”

क्या सी-सेक्शन के निशान की वजह से चलने-फिरने में दिक्कत होती है? क्या पेट पर बेल्ट बांधना फायदेमंद है?

सी-सेक्शन के बाद ज़्यादातर महिलाएं चाहती हैं कि उनका शरीर जल्द से जल्द पहले जैसा दिखने लगे. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रिकवरी के लिए शरीर को पर्याप्त समय देना बेहद ज़रूरी होता है.

कई महिलाएं बहुत जल्दी हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज़ शुरू कर देती हैं, पेट की एक्सरसाइज़ ग़लत तरीके से करती हैं, स्तनपान के दौरान बहुत सख्त डाइट फ़ॉलो करने लगती हैं या फिर सोशल मीडिया पर दूसरी महिलाओं से अपनी रिकवरी की तुलना करने लगती हैं.

कुछ महिलाएं सिर्फ एब्डॉमिनल बेल्ट या पेट बांधने वाले सपोर्ट बेल्ट पर भरोसा करती हैं, लेकिन कोर मसल्स को मज़बूत बनाने वाली एक्सरसाइज़ पर ध्यान नहीं देतीं.

जबकि गर्भावस्था और सी-सेक्शन के बाद रिकवरी का आधार धैर्य, संतुलित आहार, धीरे-धीरे बढ़ाई गई शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त आराम होता है.

सी-सेक्शन के दौरान जहां चीरा लगाया जाता है, उस जगह के घाव को पूरी तरह भरने के लिए भी समय चाहिए. इसलिए जल्दबाजी में ज़्यादा मेहनत करना या शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालना रिकवरी को प्रभावित कर सकता है.

डॉ. रिचा भारद्वाज बताती हैं, “सी-सेक्शन के बाद घाव भरने की प्रक्रिया के दौरान स्कार टिश्यू स्वाभाविक रूप से बनते हैं.”

“कुछ महिलाओं में ये टिश्यू ज़्यादा सख्त हो सकते हैं, जिसकी वजह से कुछ गतिविधियों में खिंचाव, असहजता या हल्की परेशानी महसूस हो सकती है.”

उन्होंने आगे बताया, “जब घाव पूरी तरह से भर जाए और डॉक्टर इसकी अनुमति दे दें, तब प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा किए जाने वाले स्कार मोबिलाइजेशन तकनीक से टिश्यू की लचक बेहतर हो सकती है, असहजता कम हो सकती है और शरीर की गतिविधियां आसान हो सकती हैं. लेकिन घाव पूरी तरह भरने से पहले उस जगह पर मसाज करना या उसे छेड़ना नहीं चाहिए.”

कई महिलाएं सी-सेक्शन के बाद पेट पर बेल्ट या बेली बाइंडर का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि क्या इससे पेट की चर्बी वास्तव में कम होती है या इससे कितनी मदद मिल सकती है.

डॉ. भारद्वाज बताती हैं, “डिलीवरी के बाद इस्तेमाल किए जाने वाले एब्डॉमिनल बाइंडर या बेल्ट, ख़ासकर सी-सेक्शन के बाद शुरुआती कुछ हफ्तों में, पेट को अस्थायी सहारा देकर महिलाओं को ज्यादा आराम महसूस करा सकते हैं. चलने, खांसने या रोजमर्रा के काम करते समय इससे सपोर्ट मिलने का एहसास हो सकता है.”

उन्होंने आगे कहा, “लेकिन ये बेल्ट पेट की अलग हुई मांसपेशियों को वापस नहीं जोड़ते और न ही पेट की चर्बी को हमेशा के लिए कम कर सकते हैं. इनका इस्तेमाल सिर्फ डॉक्टर की सलाह के अनुसार और सही तरीके से करना चाहिए. इसके साथ नियमित व्यायाम और रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम भी जरूरी होता है. लंबे समय तक सिर्फ बेल्ट पर निर्भर रहना सही उपाय नहीं है.”

सी-सेक्शन से जुड़े आम मिथक और उनके जवाब

सवाल – सी-सेक्शन के बाद पेट को लेकर कौन-से आम मिथक दूर किए जाने चाहिए?

डॉ. नेहा पवार: एक आम ग़लतफ़हमी यह है कि सी-सेक्शन की वजह से पेट हमेशा के लिए बड़ा रह जाता है. जबकि वास्तव में गर्भावस्था के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों का इसमें ज्यादा योगदान होता है.

कुछ लोगों को लगता है कि डिलीवरी के तुरंत बाद ज्यादा और तेज एक्सरसाइज़ शुरू करने से जल्दी रिकवरी हो जाती है. लेकिन बहुत जल्दी या ग़लत तरीके से व्यायाम शुरू करने से रिकवरी की प्रक्रिया धीमी हो सकती है. सुरक्षित तरीके से और धीरे-धीरे किया गया रिहैबिलिटेशन ज़्यादा बेहतर और स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद तरीका है.

सवाल – हर्निया, तेज दर्द या असामान्य सूजन जैसे किन लक्षणों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए?

डॉ. नेहा पवार: अगर दर्द लगातार बना रहे या बढ़ता जाए, ऑपरेशन वाली जगह के आसपास लालिमा बढ़े, बुखार आए, बदबूदार डिस्चार्ज हो, ज्यादा सूजन दिखाई दे या घाव से खून निकल रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

खांसने या जोर लगाने पर अगर पेट में कोई उभार ज़्यादा साफ दिखाई देता है, तो यह हर्निया का संकेत हो सकता है.

महिलाओं को तेज़ पेट दर्द, लगातार सुन्नपन या दर्द के साथ होने वाली सूजन को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. समय पर जांच कराने से किसी भी जटिलता का पता लगाया जा सकता है, सही समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है और गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है.

सवाल – वजन, हार्मोन, स्तनपान और उम्र का पेट की रिकवरी पर क्या असर पड़ता है?

डॉ. नेहा पवार: डिलीवरी के बाद रिकवरी पर कई चीजों का असर होता है. अगर वजन ज़्यादा हो, तो घाव भरने में अधिक समय लग सकता है. वहीं हार्मोन में होने वाले बदलाव कनेक्टिव टिश्यू की मरम्मत को प्रभावित कर सकते हैं.

स्तनपान कुछ महिलाओं में धीरे-धीरे वजन कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन इसका असर हर महिला में अलग-अलग होता है.

उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की लचक कम हो सकती है और मांसपेशियों के पहले जैसी स्थिति में आने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है. इस वजह से पेट में होने वाले बदलाव ज़्यादा दिखाई दे सकते हैं.

इसके अलावा जेनेटिक्स, खानपान, नींद, शारीरिक गतिविधि और पहले हुई गर्भधारण की संख्या जैसे कई फैक्टर भी रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हर महिला की रिकवरी अलग होती है, इसलिए सभी के लिए एक जैसा परिणाम या “परफे़क्ट बॉडी” की उम्मीद रखना न तो वास्तविक है और न ही चिकित्सकीय रूप से सही.

जीवनशैली में कोई बड़ा बदलाव करने, डाइट बदलने, दवाएं लेने या एक्सरसाइज़ शुरू करने से पहले डॉक्टर और योग्य विशेषज्ञों की सलाह लेना ज़रूरी है.

अपने शरीर और लक्षणों की सही जांच करवाकर डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही जीवनशैली में बदलाव करना बेहतर होता है. बिना डॉक्टर से सलाह लिए खुद से इलाज करना नुक़सानदायक हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS