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टीएमसी

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पाँच जून, 2024 को दिल्ली में इंडिया गठबंधन ने आख़िरी बैठक की थी. इसके ठीक दो साल बाद छह जून को दिल्ली में ही इस प्रमुख विपक्षी गठबंधन की बैठक हुई है.

इन दो सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. तब 25 क्षेत्रीय पार्टियों ने बैठक में हिस्सा लिया था. इस बार ये संख्या घटकर 23 रह गईं.

तब पार्टी की बैठक में ग़ैर कांग्रेसी पाँच मुख्यमंत्री शामिल हुए थे. इस बार महज़ एक ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला थे.

अब आम आदमी पार्टी, आरजेडी, टीएमसी, डीएमके समेत अन्य कई पार्टियों के लिए राजनीतिक समीकरण बदल गया है.

हालांकि गठबंधन को मज़बूत करने के लिए इंडिया ब्लॉक ने अब हर दो महीने में बैठक करने का फ़ैसला किया है.

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इस बैठक में भी एसआईआर के मुद्दे को ज़ोरदार ढंग से आगे बढ़ाने के संकेत दिए गए हैं. साथ ही, संसद सत्र के दौरान एलओपी राहुल गांधी की अध्यक्षता में विपक्षी दलों की बैठक किए जाने का भी फ़ैसला हुआ है.

जिन पाँच अहम मुद्दों पर इस विपक्षी गठबंधन में सहमति बनी है, उसमें एक प्रमुख मुद्दा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से जुड़ा है.

बीजेपी के उभार के बाद देश भर में क्षेत्रीय पार्टियां कमज़ोर हुई हैं. क्षेत्रीय पार्टियों से चुनौती न केवल बीजेपी को मिलती थी बल्कि कांग्रेस को भी मिलती थी.

ऐसे में इंडिया गठबंधन में अभी कांग्रेस मज़बूत स्थिति में है. अभी के हालात में आरजेडी और टीएमसी जैसी पार्टियां कांग्रेस को बहुत झुकाने की स्थिति में नहीं हैं.

नियमित बैठक से इंडिया गठबंधन का क्या लाभ होगा

दो साल के बाद हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक में फैसला हुआ कि अब से हर दो महीने में नियमित बैठक होगी.

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वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने इंडिया ब्लॉक की बैठक के बाद घोषित हुए पाँच मुद्दों में सबसे ज़्यादा अहम इस बात को माना कि वे हर दो महीने में एक बैठक करेंगे. उनका मानना है कि इसी से आगे का रास्ता निकलेगा.

वह कहती हैं, “इंडिया गठबंधन ने हर दो महीने में बैठक करने का फ़ैसला लिया है. बैठकर बात ही नहीं करेंगे, रणनीति ही नहीं बनाएंगे तो अलायंस का मतलब ही क्या है? फिर तो ये नारा ही है न.”

”बीते दो साल में ये गठबंधन एक ऑप्टिक्स, एक नारा बनकर रह गया था. अब हर दो महीने में मिलेंगे, भले लड़ेंगे-भिड़ेंगे, जो भी बातें होंगी और जो भी मुद्दे सामने आएंगे, इससे कुछ तो निकलेगा. तो मैं मानती हूँ कि सबसे अहम है.”

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का कहना है कि इस समय इंडिया ब्लॉक पर बहुत दबाव है. उनके दो कद्दावर नेता ममता बनर्जी और एमके स्टालिन चुनाव हार चुके हैं.

उन्होंने कहा, ”टीएमसी, डीएमके और सीपीआईएम के सत्ता से बाहर हो जाने से गठबंधन के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया था. कमज़ोर स्थितियों में दलों को अहसास हो रहा है कि अब जो भी उनके पास बचा है, उसे मिलकर बचाने की कोशिश करें.”

”इन कमज़ोरियों ने इन दलों को एक साथ आने पर मजबूर कर दिया. हालांकि इसमें डीएमके, कांग्रेस के चलते गठबंधन से दूर हो गया.”

नीरजा चौधरी

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हालांकि वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का ज़ोर इस बात पर है कि इंडिया गठबंधन को गठबंधन के ढांचे पर फोकस करना चाहिए. उनका मानना है कि उससे ही विपक्षी ब्लॉक को आगे बढ़ने और एकजुट रहने का आधार मिलेगा.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “बैठक होना तब तक सिर्फ़ फोटो-ऑप लगता है, जब तक यह गठबंधन अपने संरचनात्मक पहलुओं पर बैठकर बात नहीं करता. क्या गठबंधन का कोई दफ़्तर बनेगा?

इस गठबंधन के जो दूसरे अनुभवी नेता हैं, क्या उन्हें कुछ कमिटियों में रखा जाएगा ताकि वे इस गठबंधन को कोई रूप दे सकें.

इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, पर जहाँ तक मेरी जानकारी है, ऐसी कोई बात बैठक में नहीं हुई है.”

ब्लॉक की अगली बैठक हैदराबाद में एक अगस्त यानी दो महीने बाद होना तय हुआ है. पत्रकार रशीद किदवई और स्मिता गुप्ता दोनों ने ही कहा कि हैदराबाद में बैठक इसलिए रखी गई है क्योंकि वहाँ कांग्रेस की सरकार है.

ऐसे में ज़रूरी इंतज़ाम और मीडिया का ध्यान दोनों के बेहतर होने की संभावना है.

ममता बनर्जी को कितनी मदद करेगा इंडिया ब्लॉक

दो साल बाद हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी ने गले लगकर एक-दूसरे के प्रति इस तरह समर्थन जताया.

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वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता इंडिया ब्लॉक की बैठक के दौरान ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के गले मिलने की तस्वीर का हवाला देती हैं.

उन्होंने कहा, “एक समय उन्हें ब्लॉक का अध्यक्ष बनाने की मांग उठी थी. कई बार ऐसा भी हुआ कि नाराज़गी में वह अलायंस की मीटिंग में नहीं आईं. मगर अब जब उनकी पार्टी बिखरने की कगार पर है तो उन्हें इंडिया गठबंधन की बैकिंग चाहिए.”

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने कहा, “इस समय ममता बनर्जी को एक राजनीतिक संरक्षण की ज़रूरत है, क्या उन्हें इंडिया गठबंधन में कोई भूमिका मिलेगी ताकि आगे की लड़ाई के लिए तैयारी कर पाएं?”

रशीद किदवई का कहना है, “मैं जानता हूँ कि कांग्रेस में एक तबका चाह रहा है कि ममता की पार्टी निपट जाए और उनकी राजनीतिक धरोहर हमें मिल जाए.”

नीरजा चौधरी का कहना है कि “बैठक के बाद जो घोषणा की गई है कि निष्पक्ष चुनाव की मांग और एसआईआर को लेकर यह गठबंधन सीजेआई (सुप्रीम कोर्ट से चीफ़ जस्टिस) को पत्र लिखेगा, तो मैं मानती हूँ कि यह ममता को बैक करने के लिए किया जा रहा है.”

क्या राहुल गांधी का कद बढ़ेगा?

इंडिया गठबंधन ने आगामी संसद सत्र में हर दिन एलओपी की अध्यक्षता में विपक्षी दलों की बैठक करने का निर्णय लिया है.

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इंडिया ब्लॉक की प्रेसवार्ता में कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने बताया कि “इंडिया गठबंधन, मॉनसून सत्र में सदन में समन्वय बनाए रखेगा. हर सुबह लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ सभी विपक्षी दलों की बैठक होगी.”

इस घोषणा को वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी काफ़ी अहमियत देती हैं. उनका कहना है कि इससे इंडिया गठबंधन के अंदर कांग्रेस और राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़ा है.

दूसरी ओर रशीद किदवई कहते हैं कि इससे राहुल गांधी की लीडरशिप के प्रति संयुक्त विपक्ष के बीच स्वीकार्यता बढ़ेगी.

नीरजा चौधरी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “यह अहम है कि संसद सत्र के दौरान विपक्षी दल हर दिन जो मीटिंग करेंगे, वह एलओपी राहुल गांधी की अध्यक्षता में होगी.

यानी राहुल गांधी संसद के फ्लोर कोऑर्डिनेशन में विपक्ष की रणनीति की अध्यतक्षा करेंगे. राहुल गांधी को अब तक इंडिया ब्लॉक ने अपना संयोजक तय नहीं किया है, लेकिन एक क़दम उसकी ओर ले लिया है.”

नीरजा तर्क देती हैं कि “पहले रीजनल पार्टियां ही कांग्रेस की लीडरशिप को लेकर अडंगा लगाती थीं, जो अब कमज़ोर हो गई हैं.

लेकिन कांग्रेस बड़े भाई की तरह संवेदनशीलता के साथ व्यवहार नहीं करेगी तो मामला गड़बड़ हो सकता है.”

तमिलनाडु, आंध्र का प्रतिनिधित्व न मिलना कितनी बड़ी चिंता?

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता और नीरजा चौधरी ने इंडिया गठबंधन में तमिलनाडु से कोई प्रतिनिधित्व न मिलने को इस गठबंधन के लिए एक प्रमुख चिंता माना है.

पत्रकार नीरजा चौधरी ने याद दिलाया, “जब सभी रीजनल पार्टियां कांग्रेस की लीडरशिप को नहीं स्वीकारना चाहती थीं, तब सिर्फ़ डीएमके इसमें अपवाद थी.

उसने तो इंडिया गठबंधन में राहुल गांधी की अध्यक्षता की मांग की थी. लेकिन अब तो वो इंडिया ब्लॉक से ही हट गया है क्योंकि कांग्रेस विजय के साथ चली गई है.

विजय (टीवीके) भी इतनी जल्दी इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं होने वाले हैं. ऐसे में तमिलनाडु का इसमें (इंडिया ब्लॉक) कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का कहना है कि टीवीके के ऊपर कांग्रेस ने इतना दांव खेला पर वो गठबंधन में नहीं आया. जिस तरह सीपीआई को समझा-बुझाकर गठबंधन की बैठक में ले आए, उसी तरह डीएमके को भी लाया जा सकता था.”

रशीद किदवई का कहना है कि आंध्र प्रदेश और असम में इंडिया गठबंधन का कोई प्रतिनिधित्व नहीं हुआ, जबकि यहाँ पर उनकी घेरने की रणनीति होनी चाहिए थी.

जीत के लिए कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों को एक-दूसरे की ज़रूरत

पिछले साल अगस्त में इंडिया गठबंधन ने बैठक के बाद संयुक्त रूप से उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में बी. सुडर्शन रेड्डी के नाम की घोषणा की थी.

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वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता ने कहा कि कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि जिस राज्य में उसका असर है, वो वहां तो लीड ले सकती है, मगर जहाँ वो कमज़ोर हैं, वहाँ अपने सहयोगियों को आगे करे.

वे यूपी का उदाहरण देती हैं कि अब देखना होगा कि यहां कांग्रेस किस रणनीति पर आगे बढ़ेगी, यह गठबंधन में बहुत कुछ तय करेगा.

पत्रकार रशीद किदवई का कहना है कि सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों और इन क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस की ज़रूरत है, वे जितनी जल्दी ये समझ लेंगे, उनके गठबंधन का रास्ता आसान हो जाएगा.

543 लोकसभा सीटों में से 254 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस का वोट प्रतिशत एक अंक में है.

रशीद किदवई कहते हैं कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वोट शेयर एक अंक में है.

सीजेपी से इंडिया ब्लॉक क्या कोई चुनौती मिल रही है?

कॉकरोच जनता पार्टी ने बीते सप्ताह अपना पहला प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा था. यही मांग इंडिया गठबंधन ने भी उठाई है. (फाइल फोटो)

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वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का मानना है कि हाल में परीक्षाओं के दौरान सामने आईं अनियमितताओं के चलते युवाओं में जो ग़ुस्सा पनपा है, उसने न केवल सत्ता पक्ष के ख़िलाफ़ रोष ज़ाहिर किया है, बल्कि विपक्षी दलों के ख़िलाफ़ अपनी थकान भी दिखाई है और यह दोनों के लिए ही चेतावनी है.

वह कहती हैं, यह विपक्ष के लिए एक वेकअप-कॉल है कि शिक्षा मंत्री के ख़िलाफ़ इस्तीफे का मुद्दा तो वे पहले से उठा रहे थे, लेकिन युवा उनसे नहीं जुड़े. बल्कि वे एक शख्स पर भरोसा कर गए.

वे कहती हैं, “सीजेपी एक ऑनलाइन पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म है, वो ऑफलाइन क्या शेप लेगा, अभी हमें पता नहीं है.

यहाँ ऐसा लगता है कि इंडिया गठबंधन इस रणनीति पर है कि भले लोग सीजेपी के साथ शिक्षा के मुद्दे पर जुड़ रहे हों मगर जब बात वोट देने की आएगी तो स्थापित विपक्षी दलों को ही सत्ता से नाराज़ ऐसे लोग वोट देंगे.”

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SOURCE : BBC NEWS