Source :- BBC INDIA
इमेज स्रोत, Getty Images
प्रकाशित
पढ़ने का समय: 8 मिनट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी एसआईआर को वैध ठहराया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह चुनाव आयोग की ओर से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक सिद्धांत को लागू करने के लिए किया गया वैध अभ्यास है.
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को ख़ारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एसआईआर दरअसल ‘घुसपैठियों’ को हटाने के नाम पर पीछे के दरवाज़े से नागरिकता जांच करने की कोशिश है.
याचिका में आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग मनमाने तरीक़े से नागरिकता तय करने की शक्तियां अपने हाथ में ले रहा है और संसद के बनाए गए क़ानूनों, नियमों के साथ अपने ही मैनुअल में निर्धारित सीमाओं को अनुचित तरीक़े से पार कर रहा है.
बिहार में एसआईआर की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने वाले इस फ़ैसले का असर आगे होने वाले अन्य एसआईआर पर भी पड़ेगा.
सुप्रीम कोर्ट में बिहार मामले की सुनवाई जारी रहने के दौरान ही एसआईआर का दूसरा चरण शुरू हो चुका था, जिसमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम सहित 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 51 करोड़ मतदाता शामिल हैं.
जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने इसे न्यायपालिका के लिए ‘काला दिन’ बताया है तो इस मामले के याचिकाकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा कि उन्हें इस फ़ैसले से अचरज नहीं हुआ है.
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है.
नागरिकता पर अंतिम फ़ैसला नहीं माना जाएगा
इमेज स्रोत, Getty Images
चीफ़ जस्टिस ने खुली अदालत में फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत यह अधिकार है कि वह मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए नागरिकता की जांच करे.
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह जांच किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम फ़ैसला नहीं मानी जाएगी.
अगर चुनाव आयोग को लगे कि किसी व्यक्ति के पास ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं हैं या वह जांच में सफल नहीं हुआ है, तो वह मामला नागरिकता क़ानून के तहत अंतिम निर्णय के लिए केंद्र सरकार की सक्षम प्राधिकरण के पास भेज सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि एसआईआर ने रीप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स के तहत मतदाता सूची संशोधन की सामान्य प्रक्रिया की सीमाओं को कुछ हद तक विस्तार दिया लेकिन केवल इसी आधार पर इसे असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता.
अदालत ने माना कि यह प्रक्रिया एक असाधारण परिस्थिति में की गई थी लेकिन इसे अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं कहा जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची संशोधन से जुड़े प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया.
इस मामले में असोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स भी याचिकाकर्ता था. इसकी ओर से प्रशांत भूषण और नेहा राठी पेश हुए थे. इनकी उस दलील को भी सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया कि एसआईआर ने नागरिकता साबित करने का बोझ मतदाताओं पर डाल दिया.
हालांकि कोर्ट ने यह भी दोहराया कि एसआईआर में स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेज़ों के चयन में संतुलन बनाए रखना ज़रूरी होगा.
‘न्यायपालिका के लिए काला दिन’
इमेज स्रोत, Debajyoti Chakraborty/NurPhoto via Getty Images
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर काफ़ी प्रतिक्रिया आ रही है. प्रशांत भूषण ने इस फ़ैसले को भारत की न्यायपालिका के लिए काला दिन कहा है.
प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा है, ”सुप्रीम कोर्ट ने आख़िरकार एसआईआर प्रक्रिया को सही ठहराने वाला फ़ैसला सुना दिया. कई राज्यों में चुनाव होने के महीनों बाद यह फ़ैसला सुनाया गया है, जहाँ इसी एसआईआर के आधार पर चुनाव कराए गए थे. पूरी प्रक्रिया एक पक्षपाती चुनाव आयोग ने चलाई, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए और वह भी बेहद अपारदर्शी तरीक़े से. यह फ़ैसला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक काला दिन है.”
जाने-माने राजनीतिक टिप्पणीकार और एसआईआर का विरोध करते रहे योगेंद्र यादव ने एक्स पर लिखा है, ”मैं आज एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सुनने नहीं गया. इस मामले में एक याचिकाकर्ता होने के नाते और अदालत में बहस करने का अवसर मिलने के बावजूद, मुझमें उम्मीद, बेचैनी या कम-से-कम जिज्ञासा होनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. यह मामला बहुत पहले तय हो चुका था. अब सिर्फ़ फ़ैसले की भाषा और उसकी बारीकियों का इंतज़ार था.”
यादव ने लिखा है, ”मेरे अनुसार, इस मामले की दिशा पिछले वर्ष अगस्त में ही तय हो गई थी. तीन दिन तक एसआईआर के ख़िलाफ़ दलीलें सुनने के बाद अदालत ने उसकी संवैधानिक वैधता की जांच से ध्यान हटाकर ख़ुद को लगभग एक कंज्यूमर फोरम में बदल लिया, जहाँ संवैधानिक सिद्धांतों की जगह शिकायत निवारण और प्रशासनिक मध्यस्थता पर ज़ोर था.”
”असल में यह मामला उसी दिन तय हो गया था, जब सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग को बिहार चुनाव आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी. बिना पहले इस मामले पर फ़ैसला सुनाए और बिना यह सुनिश्चित किए कि एसआईआर के बाद मतदाता सूची में आई गंभीर खामियों को सुधारा जाए. इसके बाद जब चुनाव आयोग ने एसआईआर का दूसरा और तीसरा चरण शुरू कर दिया और अदालत आराम से उसकी संवैधानिकता पर बहस सुनती रही. तब एसआईआर एक अपरिवर्तनीय वास्तविकता बन चुका था.”
योगेंद्र यादव ने लिखा है, ”भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अब लाखों नागरिकों को मताधिकार से वंचित किए जाने को वैधता दे दी है. अब तक कम-से-कम 5.9 करोड़ लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं और यह संख्या आगे चलकर 10 करोड़ तक पहुँच सकती है. यह कल्पना से बाहर था कि अदालत अब एसआईआर को असंवैधानिक घोषित कर दे और उसके बाद हुए सभी चुनाव रद्द कर दे.”
‘बुनियादी सवाल अब भी अनुत्तरित’
इमेज स्रोत, ANI
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लिखा है, ”सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की एसआईआर कराने की शक्ति को बरकरार रखा है. लेकिन एक बुनियादी सवाल अब भी अनुत्तरित है. उन लाखों वैध भारतीय नागरिकों का क्या होगा जो एसआईआर प्रक्रिया से बाहर रह गए? क्या वे केवल इसलिए अपने संवैधानिक मतदान के अधिकार और कल्याणकारी योजनाओं के लाभ खो देंगे क्योंकि एसआईआर जल्दबाजी में कराई गई और उसमें कथित तार्किस विसंगति यानी लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी एल्गोरिद्म का इस्तेमाल किया गया?”
टीएमसी नेता और वकील कल्याण बनर्जी ने अदालत के फ़ैसले के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला केवल बिहार मामले तक सीमित था. सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार कहा कि उसकी टिप्पणियां सिर्फ़ बिहार एसआईआर के संदर्भ में हैं. बिहार मामले में उठाई गई प्रक्रियागत अनियमितताओं की बात को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया.”
”इस मामले में अदालत की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यह थी कि अगर किसी व्यक्ति का नाम इस आधार पर हटाया जाता है कि उसे नागरिक नहीं माना गया है, तो चुनाव आयोग के पास यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई व्यक्ति नागरिक है या नहीं. यानी चुनाव आयोग केवल चुनावी सूची के सीमित मक़सद से जांच कर सकता है, लेकिन नागरिकता पर अंतिम फ़ैसला देने का अधिकार उसके पास नहीं है.”
टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा ने एक्स पर लिखा, “आज सुप्रीम कोर्ट का बिहार एसआईआर पर फ़ैसला चुनाव आयोग की अव्यवहारिक, जल्दबाजी में की गई और भेदभावपूर्ण प्रक्रियाओं को मंज़ूरी देने जैसा है. इसके कारण पश्चिम बंगाल एसआईआर के बाद 27 लाख वैध मतदाता मतदान करने से वंचित रह गए और उनका भविष्य अब भी अनिश्चित बना हुआ है. न्याय होना चाहिए और न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए.”
‘निष्पक्ष चुनाव के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी थी’
इमेज स्रोत, ANI
बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर हमला तेज़ कर दिया. पार्टी ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी शुरू से ही एसआईआर का विरोध इसलिए कर रहे थे क्योंकि वह घुसपैठियों और फ़र्ज़ी मतदाताओं के पक्ष में खड़े थे.
बीजेपी का कहना है कि मतदाता सूची को गड़बड़ी से बचाने के लिए एसआईआर ज़रूरी था और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को संवैधानिक मान्यता दे दी है.
भारतीय जनता पार्टी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा, “कोर्ट ने आगे यह भी स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह प्रक्रिया बिल्कुल आवश्यक थी… हाल के वर्षों में शहरीकरण, पलायन, डुप्लीकेशन और नए निवासियों के आने जैसे कारणों से मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम जोड़े और हटाए गए हैं…”
“सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध माना है, इसे चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में बताया है और स्वतंत्र तथा पारदर्शी चुनाव कराने के लिए अनिवार्य माना है. इंडिया गठबंधन का वास्तविक चरित्र, जो सनातन धर्म को नुकसान पहुंचाने वाला और घुसपैठियों का संरक्षण करने वाला है, आज पूरी तरह उजागर हो गया है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
SOURCE : BBC NEWS







