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वक़्फ़ संशोधन बिल

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संसद के बजट सत्र के आख़िरी पड़ाव में पहले लोकसभा और फिर उसके अगले दिन राज्यसभा में वक्फ़ संशोधन विधेयक को मंज़ूरी मिल गई है.

वकीलों और एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय में वक़्फ़ कानून में लाए गए संशोधन का फायदा सरकार को हो सकता है. संसद और बाहर सिविल सोसाइटी के कड़े विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने जिन संशोधन को पारित करवाया है, उन पर अदालत में सवाल उठना तय है.

वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया है कि संसद के दोनों सदनों से पारित नए संशोधन से संविधान के कई प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील रऊफ़ रहीम ने बीबीसी कहा, “ऐसे कई बिंदु हैं जिनकी वजह से कानून पर कोर्ट में सवाल खड़े होंगे. हालांकि उनका आधार क्या होगा ये कानून के पेशे से जुड़े लोग तय करेंगे.”

बीबीसी
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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) जैसी कई संस्थाओं ने पहले ही नए कानून को कोर्ट में चैलेंज करने की घोषणा की है.

हालांकि वक़्फ़ संशोधन बिल अभी संसद के दोनों सदनों से पास हुआ है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये कानून बनेगा.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील एम आर शमशाद ने कहा, “नए कानून इस्लामिक परोपकार (वक़्फ़ के लिए दूसरा शब्द) को खत्म नहीं करेंगे. पांच साल बाद ये होगा कि प्रशासन कहेगा कि पांच साल पहले विवाद हुआ था और संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा. यानी सरकार को सबसे ज्यादा फायदा होगा.”

रहीम कहते हैं, “वक़्फ़ के मामले में मुझे काले दिन आते हुए दिखाई दे रहे हैं. यह एक अच्छे तरह से तैयार किया गया संशोधन विधेयक नहीं है बल्कि यह एक अच्छी तरह से तैयार किया गया कानून है. इसमें कई तरह का जाल है.”

‘वक़्फ़ भूमि अपना वक़्फ़ का कैरेक्टर खो देगी’

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सैयद जफर महमूद भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर बनी जस्टिस राजिंदर सच्चर कमेटी के पूर्व ओएसडी रहे हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, “वक़्फ़ की अधिकतर संपत्ति अपना वक़्फ़ कैरेक्टर खो देगी. बहुत कम संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति के रूप में बची रहेगी. बाकी संपत्ति खत्म हो सकती है.”

पूर्व केंद्रीय मंत्री के रहमान खान ने वक़्फ़ अधिनियम में 2013 में संशोधन किया था.

उन्होंने एक अनुमान लगाया था, “लगभग 1.25 लाख एकड़ वक़्फ़ भूमि (देश में 9.4 लाख एकड़ में से) जिस पर विभिन्न सरकारों ने अतिक्रमण कर लिया था, वो वक़्फ़ की संपत्ति नहीं रहेगी.”

राष्ट्रीय राजधानी सहित विभिन्न राज्यों की अतिक्रमण की गई वक़्फ़ भूमि, वक़्फ़ संपत्ति के रखवालों के साथ मुकदमे के अधीन भूमि, जिसे हड़प लिया था या अतिक्रमण कर लिया था उसका विवरण आसानी से उपलब्ध नहीं है.

वक़्फ़ संपत्तियों को कमर्शियल इस्तेमाल के लिए मामूली किराए पर दिया गया है. महमूद ने कहा, “जब ये कानून बन जाएगा तब देखना होगा कि इसका क्या होता है.”

उन्होंने कहा, “संसद में सरकार ने ये आश्वासन दिया है कि वक़्फ़ के मामलों में दखल नहीं किया जाएगा. ये सुनने में अच्छा लगता है. लेकिन राज्य वक़्फ़ बोर्ड के लोग ही फैसले लेंगे. उनकी मंजूरी के बिना कोई आवंटन नहीं होता. इसलिए भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा.”

प्रतिनिधित्व में फर्क

संविधान

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रहमान खान कहते हैं, “इस नजरिए से राज्य वक़्फ़ बोर्ड (एसडब्ल्यूबी) और केंद्रीय वक़्फ़ परिषद (सीडब्ल्यूसी) का गठन भी किया जाना चाहिए. सबसे पहले नए कानून के मुताबिक अधिकांश सदस्यों का मुस्लिम होना जरूरी नहीं है. यानी ऐसा हो सकता है कि जो लोग फैसले लेंगे उनमें ज्यादातर मुस्लिम नहीं होंगे.”

कानून कहता है कि बोर्ड और परिषद में कम से कम दो गैर-मुस्लिम सदस्य अनिवार्य होंगे. एक और बिंदु जो छूट गया है वो ये है कि नया संशोधन यह भी कहता है कि 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का मुस्लिम होना आवश्यक नहीं है. भले ही संवैधानिक रूप से वक़्फ़ को मुसलमानों द्वारा संचालित किया जाना आवश्यक है. ऐसा हमारे देश में अन्य धर्मों के निकाय के साथ भी है.

महमूद कहते हैं, “संविधान का अनुच्छेद 26 यह गारंटी देता है कि प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार है. इसके अलावा उन्हें संपत्ति का स्वामित्व रखने, उसे हासिल करने और उस पर प्रशासन करने का अधिकार है.”

“इस प्रकार मुसलमानों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है. वो अब केंद्रीय वक़्फ़ परिषद और राज्य वक़्फ़ बोर्डों में बहुमत में नहीं रहेंगे.”

महमूद कहते हैं, “किरायेदार आभासी तौर पर तब तक मालिक बन सकते हैं, जब तक अदालत ये न कहे कि संशोधन पर पुनर्विचार किए जाने तक कोई भी बदलाव नहीं किया जाना चाहिए.”

क्या है गंभीर समस्या

दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड

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रहीम कहते हैं ऐसे कई सारे बिंदु हैं जिनके जरिए वक़्फ़ की जमीन पर कब्जा किया जा सकता है.

वो कहते हैं, “उनमें से पहला ये है कि एक सरकारी अथॉरिटी है जो यह तय करेगा कि कोई संपत्ति वक़्फ़ है या नहीं. जैसे ही उन्हें लगेगा कि ये वक़्फ़ की संपत्ति है या नहीं. तो ये साबित करना आपकी जिम्मेदारी होगी कि ये असल में वक़्फ़ की संपत्ति है.”

रहीम ने कहा, “जैसे ही आप इस अथॉरिटी की नज़रों से बच निकलते हैं. आप दूसरे बिंदु में फंस जाते हैं. वह है लिमिटेशन एक्ट. पहले लिमिटेशन हमेशा के लिए था. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है वक़्फ़ हमेशा वक़्फ़ ही रहता है.”

“अब मान लीजिए कि कोई अतिक्रमण है और यह रिकॉर्ड में नहीं दिखाया गया है या फिर मुतवल्ली या केयरटेकर संपत्ति को अलग करके बेच देता है तो आप कोर्ट जा सकते थे. लेकिन अब आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आपको बताया जाएगा कि आपको तीन या पांच साल पहले कोर्ट जाना चाहिए था.”

रहीम ने कहा, “नए संशोधन से पहले के प्रभाव बदल जाएंगे. जैसे भूमि सुधार अधिनियम हो या फिर राज्य स्तर पर कोई कानून. कानून असंगत हो सकते हैं. लेकिन कोई विवाद होता है तो कौन सा कानून प्रबल होगा? इससे मुकदमेबाजी का सिलसिला शुरू हो जाएगा. हकीकत में एक रास्ता बनाया गया है.”

मुस्लिम होने का प्रमाण

वक़्फ़ संशोधन कानून

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शमशाद एक और अलग वजह सामने रखते हैं जिससे नए संशोधन को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

उन्होंने कहा, “कानूनी तौर पर ये संशोधन वक़्फ़ की उस पूरी योजना को प्रभावित करते हैं जिसकी इस्लाम में कल्पना की गई है. इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में संरक्षण भी हासिल है.”

“नए वक़्फ़ बनाने में ऐसी शर्तें हैं जिनसे गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. नए कानून के मुताबिक जो कोई भी नया वक़्फ़ बनाना चाहता है उसे यह साबित करना होगा कि वह मुसलमान है. यह साबित करना होगा कि वो कम से कम पांच साल से इस्लाम धर्म का पालन कर रहे हैं.”

वो कहते हैं, “कोई व्यक्ति मुसलमान है ये साबित करने का शुरुआती बिंदु क्या है? क्या ये इस बात से तय होगा कि कोई व्यक्ति दाढ़ी बढ़ाता है या फिर वो कैसे और कब नमाज़ पढ़ता है. इसका मकसद वक़्फ़ के निर्माण को प्रतिबंधित करना है.”

कई और पहलू ऐसे जोड़े गए हैं जिन पर शमशाद आपत्ति जताते हैं. उन्होंने कहा, “सरकार के अधिकारी ये तय करेंगे कि कोई व्यक्ति वक़्फ़ को जमीन देता है तो उससे उत्तराधिकार के अधिकार प्रभावित होंगे या नहीं.”

“एक मुसलमान के तौर पर मेरे संभावित उत्तराधिकारी के पास कोई अधिकार नहीं है. लेकिन संभावित उत्तराधिकारी को नया वक़्फ़ बनाने के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट मुहैया करवाना होगा.”

‘वक़्फ़ बाए यूजर’ को हटाए जाने से भी शमशाद और रहीम जैसे वकीलों को हैरानी हुई है.

शमशाद कहते हैं कि ‘वक़्फ़ बाए यूजर’ का सिद्धांत का मतलब है कि ऐसी संपत्ति जो मस्जिदों और कब्रिस्तानों जैसे धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए निरंतर उपयोग के कारण वक़्फ़ बन जाती है. भले ही इसे औपचारिक रूप से वक़्फ़ घोषित न किया गया हो.

“ये मौजूदा वक़्फ़ को प्रभावित करता है.”

रहीम कहते हैं, “इसे हटाया जाना संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. ये सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के भी विरुद्ध है जिनमें इस सिद्धांत को बरकरार रखा गया है.”

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वक़्फ़ बोर्डों के सामने सबसे बड़ी समस्या उन लोगों के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ना है जिनसे वक़्फ़ संपत्तियों की रक्षा करने की उम्मीद की जाती है, यानी मुतवल्ली या केयरटेकर.

रहीम कहते हैं, “नए संशोधन कहते हैं कि अगर कोई मुतवल्ली संपत्ति को अलग करने और उसे अवैध रूप से बेचने में संलिप्त है तो उसे संपत्ति बेचने के लिए केवल छह महीने की साधारण कारावास की सजा का सामना करना पड़ेगा.”

“गलत काम करने वाले को संरक्षण दिया गया है, जबकि इस तरह के किसी भी अन्य संपत्ति मामले में सजा पांच से 10 साल तक होती है. फिर से इसका अन्य कानूनों के साथ टकराव होता है.”

रहीम ने कहा, “नए कानून के कारण बहुत सी संपत्तियों का अवैध रूप से अधिग्रहण हो रहा है, जिसके लिए कानून में कोई प्रावधान नहीं है. धीरे-धीरे अधिकारों के साथ-साथ समाधान भी खत्म हो रहे हैं.”

रहीम उन पहलुओं के बारे में बात करते हैं जो कि सकारात्मक हैं. वो कहते हैं, “नए संशोधन यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी विवादों का निपटारा छह महीने के अंदर हो जाए. इसमें सुप्रीम कोर्ट के सामने अपील दायर करने का प्रावधान है. सबसे अहम बात यह है कि वक़्फ़ ट्रिब्यूनल का संचालन एक न्यायाधीश ही करेगा. एक और बात जिसकी ज़रूरत है, वो है कई और ट्रिब्यूनल की ज़रूरत.”

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