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30 साल पहले इस फिल्म में दिखाया गया था 2 हीरोइनों का किसिंग सीन, सेंसर बोर्ड ने नहीं चलाई थी कैंची

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Source :- LIVE HINDUSTAN

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30 साल पहले एक फिल्म आई थी जिसमें दो हीरोइनों का किसिंग सीन था। इस फिल्म पर बैन लगा दिया गया था और बहुत विवाद भी हुआ था। दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म में शबाना आजमी ने लीड रोल प्ले किया था।

भारतीय सिनेमा में आज बोल्ड कंटेंट पर फिल्में बनना आम बात हो सकती है, लेकिन आज से ठीक 30 साल पहले इस विषय पर बात करना भी एक बहुत बड़ा टैबू माना जाता था। सोचिए ऐसे माहौल में एक ऐसी फिल्म आई थी जिसमें दो हीरोइनों का किसिंग सीन दिखाया गया था। इस फिल्म ने रिलीज होते ही पूरे देश में तहलका मचा दिया था और बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई थी।

फिल्म का नाम

इस फिल्म का नाम था ‘फायर’, जिसे मशहूर डायरेक्टर दीपा मेहता ने निर्देशित किया था। इस फिल्म की सबसे खास और चौंकाने वाली बात ये थी कि इसमें कोई छोटे-मोटे कलाकार नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की दिग्गज एक्ट्रेस शबाना आजमी ने लीड रोल प्ले किया थी। उनके साथ नंदिता दास थीं, जिन्होंने फिल्म में उनकी पार्टनर का रोल प्ले किया था।

सेंसर बोर्ड ने बिना कट किए दी थी मंजूरी

आमतौर ऐसी फिल्मों पर सेंसर बोर्ड कैंची चला देता है, लेकिन ‘फायर’ के साथ ऐसा नहीं था। मई 1998 में भारत के सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने फिल्म की कहानी को ‘भारतीय महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण’ मानते हुए इसे बिना किसी कट के ‘A’ सर्टिफिकेट के साथ पास कर दिया था। हालांकि, पहले उन्होंने फिल्म के एक कैरेक्टर का नाम ‘सीता’ (नंदिता दास का किरदार) से ‘नीता’ करने की शर्त रखी थी, लेकिन बाद में मूल नाम को ही हरी झंडी दे दी थी।

थिएटर्स में तोड़फोड़

13 नवंबर 1998 को फिल्म रिलीज हुई और शुरुआती तीन हफ्तों तक देश के 42 थिएटर्स में हाउसफुल रही। लेकिन असली ड्रामा इसके बाद शुरू हुआ। दिसंबर 1998 की शुरुआत में इस फिल्म के खिलाफ देशव्यापी हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि ये फिल्म भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। एक प्रदर्शनकारी महिला ने तो यहां तक कह दिया था, ‘अगर महिलाओं की शारीरिक जरूरतें लेस्बियन रिश्तों से पूरी होने लगीं, तो शादी की संस्था ढह जाएगी।’

दिलीप कुमार के घर के बाहर अनोखा विरोध

जब इस विवाद में दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार और महेश भट्ट खुलकर दीपा मेहता के समर्थन में आए, तो प्रदर्शनकारियों ने विरोध का एक अजीब तरीका अपनाया। लगभग 60 प्रदर्शनकारी अंडरवियर पहनकर दिलीप कुमार के घर के सामने धरने पर बैठ गए, जिसके बाद दिलीप कुमार को पुलिस सुरक्षा देनी पड़ी।

सरकार का यू-टर्न और सुप्रीम कोर्ट की एंट्री

विवाद इतना बढ़ा कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने तोड़फोड़ करने वालों को बधाई दे डाली। भारी दबाव में आकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म को दोबारा जांच के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेज दिया। ऐसे में दीपा मेहता, दिलीप कुमार और महेश भट्ट ने देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों (आर्टिकल 14, 19, 21 और 25) और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिलीप कुमार ने साफ कहा कि मामला फिल्म के कंटेंट का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जिंदगी पर हो रही गुंडागर्दी का है। इसके समर्थन में 32 मानवाधिकार और एलजीबीटीक्यू संगठनों ने भी सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया।

आखिरकार जीत किसकी हुई?

तमाम विरोध के आगे न तो मेकर्स झुके और न ही न्याय व्यवस्था। सेंसर बोर्ड ने दोबारा जांच के बाद 12 फरवरी 1999 को एक बार फिर फिल्म को बिना किसी कट के पास कर दिया और 26 फरवरी 1999 से फिल्म दोबारा सिनेमाघरों में शांतिपूर्ण ढंग से चलने लगी। अगर आप ये फिल्म देखना चाहते हैं तो अमेजन प्राइम वीडियो पर देख सकते हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN