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9/11 हमलों के एक हज़ार से ज़्यादा पीड़ितों की पहचान अब तक क्यों नहीं हो पाई?

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Source :- BBC INDIA

जूलियट स्कॉसो सिर्फ़ चार साल की थीं, जब 9/11 में उनके पिता, फायरफाइटर डेनिस स्कॉसो, की मौत हो गई.

इमेज स्रोत, Juliette Scauso

पिछले 25 साल से जूलियट स्काउसो के पास अपने पिता की ज़िंदगी के आख़िरी दिन की केवल एक निशानी है. वह है उनके पिता का बुरी तरह टूटा और दबा हुआ फ़ायरफ़ाइटर हेलमेट.

जूलियट के पिता डेनिस स्काउसो न्यूयॉर्क सिटी फ़ायर डिपार्टमेंट यानी एफ़डीएनवाई की उस यूनिट में 12 साल से काम कर रहे थे, जो ख़तरनाक केमिकल और दूसरे पदार्थों से जुड़े मामलों को संभालती है.

पहले 11 सितंबर 2001 को डेनिस की ड्यूटी नहीं थी. लेकिन ज़्यादा ओवरटाइम भुगतान के लिए उन्होंने उस दिन किसी दूसरे कर्मचारी के साथ अपनी शिफ़्ट बदल ली.

चार बच्चों के पिता डेनिस, लॉन्ग आइलैंड में रहते थे. स्काउसो परिवार को बताया गया कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का साउथ टावर गिरते समय शायद वह उसके अंदर थे. कई महीने बाद उनका हेलमेट मिला, जिस पर उनका बैज नंबर लिखा था.

जूलियट कहती हैं, “मैंने अपनी लगभग पूरी ज़िंदगी यह मानते हुए बिताई है कि मेरे पिता की मौत हो चुकी है. साथ ही मैंने इस सच्चाई के साथ जीना सीखा है कि हमें उनके अवशेष कभी नहीं मिले.”

पिता की मौत के समय जूलियट केवल चार साल की थीं. न्यूयॉर्क सिटी के मुख्य मेडिकल एग्ज़ामिनर के दफ़्तर के मुताबिक़, डेनिस स्काउसो उन एक हज़ार से ज़्यादा लोगों में शामिल हैं, जो 11 सितंबर के हमले में मारे गए थे, लेकिन उनके अवशेषों की अब तक पहचान नहीं हो सकी है.

उस दिन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों में क़रीब तीन हज़ार लोगों की मौत हुई थी.

पिछले महीने न्यूयॉर्क प्रशासन ने इन आतंवादी हमलों में मारे गए एक ऐसे व्यक्ति की पहचान की, जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई थी. पहचान होने वाला यह 1,654वां व्यक्ति था.

इसके लिए फ़ॉरेंसिक इन्वेस्टिगेटिव जेनेटिक जीनियोलॉजी यानी एफ़आईजीजी नाम की नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया. इस तकनीक में डीएनए के ज़रिए किसी व्यक्ति के परिवार और रिश्तेदारों का पता लगाया जाता है.

न्यूयॉर्क के मेडिकल एग्ज़ामिनर दफ़्तर में इंसानी अवशेषों की वैज्ञानिक जांच करने वाले विभाग की निदेशक एंजेला सोलेर कहती हैं, “इस तरीक़े से काफ़ी उम्मीद दिखाई देती है. इससे और परिवारों को अपने सवालों के जवाब मिल सकते हैं. उम्मीद है कि भविष्य में हम इस तकनीक से और अवशेषों की जांच कर पाएंगे.”

9/11 हमले के बाद से सोलेर का दफ़्तर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में मारे गए 2,753 लोगों के अवशेषों की पहचान करने की कोशिश कर रहा है. अब तक मारे गए लोगों में से 60 प्रतिशत की पहचान हो पाई है.

सोलेर कहती हैं, “मुझे लगता है कि लोगों की पहचान करने की यह दुनिया की सबसे मुश्किल कोशिशों में से एक रही है.”

25 साल बाद भी डीएनए मैचिंग जारी

9 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले ने दुनिया में काफ़ी कुछ बदल दिया (फ़ाइल फ़ोटो)

इमेज स्रोत, Spencer Platt/Getty Images

हमले में मारे गए लोगों की पहचान करना कई वजहों से मुश्किल रहा है. विमानों के टकराने और उनके ईंधन से लगी आग में इंसानी अवशेष बुरी तरह ख़राब हो गए थे.

सोलेर के मुताबिक़, कई मामलों में डीएनए की जांच के लिए शव का केवल छोटा-सा हिस्सा ही मिला.

स्काउसो बताती हैं कि हमला जिस समय हुआ, उस दौरान कई फ़ायर फ़ाइटर अपनी शिफ़्ट बदल रहे थे. इनमें से कुछ अपनी ड्यूटी पूरी होने के बाद भी मदद के लिए रुक गए थे.

उस वक्त उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए जो भी अतिरिक्त वर्दी या सुरक्षा का सामान मिला, उसे पहन लिया.

इस वजह से बाद में मिले कुछ फ़ायरफ़ाइटर ऐसी वर्दी पहने हुए थे, जिन पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम लिखा था. इससे उनकी पहचान करना और मुश्किल हो गया.

9/11 के दूसरे हमले वाली जगहों के मुक़ाबले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में मरने वालों की संख्या भी बहुत ज़्यादा थी.

अमेरिकन एयरलाइंस की फ़्लाइट 77 जब पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मुख्यालय) से टकराई थी, तब उसमें मारे गए 184 लोगों में से पांच लोगों के अवशेष ऐसी ही हालत की वजह से कभी पहचाने ही नहीं जा सके.

नेशनल पार्क सर्विस के मुताबिक़, यूनाइटेड एयरलाइंस की फ़्लाइट 93 पेंसिल्वेनिया के शैंक्सविल में एक खेत में जा गिरी थी, उसमें सवार सभी 40 पीड़ितों की पहचान हो गई थी. क्योंकि पहचान के लिए पर्याप्त अवशेष मिल गए थे, जिनमें डीएनए, दांतों के रिकॉर्ड और फिंगरप्रिंट शामिल थे.

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टावर गिरने के बाद धुएं के बादलों से दूर भागते पुलिसकर्मी और फ़ायरमैन (फ़ाइल फ़ोटो)

इमेज स्रोत, Jose Jimenez/Primera Hora/Getty Images

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से मिले अवशेषों को ख़ास पैकेट में बंद करके सुरक्षित रखा गया है, ताकि आने वाले वर्षों में भी उनके डीएनए की जांच की जा सके.

हमलों के तुरंत बाद उंगलियों के निशान या दांतों के रिकॉर्ड से लोगों की पहचान की गई थी. लेकिन जिन मामलों में ये दोनों चीज़ें नहीं मिलीं, उनमें बाद में डीएनए का सहारा लिया गया.

नई तकनीक आने के बाद अधिकारी पुराने अवशेषों से दोबारा डीएनए निकालकर उनकी फिर से जांच कर पाए.

सोलेर कहती हैं, “इसी वजह से इतने साल बाद भी नई पहचान हो रही हैं. जब भी कोई नई तकनीक आती है, हम उसी अवशेष की दोबारा जांच कर एक और कोशिश करते हैं.”

मेडिकल एग्ज़ामिनर के दफ़्तर के मुताबिक़, 9/11 के बाद से डीएनए तकनीक की मदद से 1,495 लोगों की पहचान की गई है. इनमें कुछ लोगों की पहचान केवल डीएनए से हुई, जबकि कुछ के लिए एक से ज़्यादा तरीक़ों का इस्तेमाल किया गया.

पिछले साल न्यूयॉर्क प्रशासन ने बताया था कि डीएनए की मदद से 24 साल बाद तीन और लोगों की पहचान हुई है.

इनमें 26 साल के करेंसी ट्रेडर रायन फ़िट्ज़गेराल्ड और 72 साल की बारबरा कीटिंग शामिल थीं. बारबरा अमेरिकन एयरलाइंस की फ़्लाइट 11 में सवार थीं, जो बोस्टन से लॉस एंजेलिस जा रही थी.

तीसरी महिला की पहचान भी हो गई थी, लेकिन उनके परिवार ने उनका नाम सार्वजनिक नहीं करने का फ़ैसला किया.

सोलेर बताती हैं कि नई एफ़आईजीजी तकनीक में ‘होल जीनोम सीक्वेंसिंग’ का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी मदद से किसी व्यक्ति के पूरे जेनेटिक कोड यानी उसके डीएनए में मौजूद पूरी जानकारी को पढ़ा जा सकता है.

इससे जांच करने वाले अधिकारी मृत व्यक्ति के दूर के रिश्तेदारों से भी डीएनए मिलने की संभावना तलाश सकते हैं. कोई संभावित रिश्ता मिलने के बाद न्यूयॉर्क पुलिस मृत व्यक्ति के क़रीबी रिश्तेदारों को खोजने में मदद करती है.

पुराने ज़ख़्म ताज़ा होने का डर

9/11 मेमोरियल

इमेज स्रोत, ED JONES/AFP via Getty Images

न्यूयॉर्क के मेडिकल एग्जामिनर के दफ़्तर में आज भी हर हफ़्ते ऐसे परिवारों के फ़ोन आते हैं जो किसी अपने के बारे में पूछते हैं, जिनके अवशेष कभी मिल ही नहीं पाए.

बहुत से लोग आज तक अपने किसी क़रीबी को दफ़ना तक नहीं पाए हैं, लेकिन कुछ परिवार ऐसा भी करते हैं कि जब अवशेष मिल जाते हैं, तो वे उन्हें न्यूयॉर्क के 9/11 मेमोरियल स्थल पर बने एक रिपॉज़िटरी में ही रहने देते हैं.

यह रिपॉज़िटरी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जगह पर चट्टानी नींव के अंदर बनाई गई है, और वहां सिर्फ़ मेडिकल एग्जामिनर के स्टाफ़ ही जा सकते हैं. पास ही एक निजी जगह भी है, जिसे रिफ्लेक्शन रूम कहा जाता है, जहां परिवार शोक मना सकते हैं.

सोलेर कहती हैं, “उनके क़रीबी ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पल इसी जगह बिताए थे. इसलिए परिवार चाहता है कि उनके अवशेष भी यहीं रहें.”

सोलेर परिवारों को पहचान की जानकारी देने का काम भी करती हैं. वह बताती हैं कि कुछ लोग नई पहचान होने पर इसकी सूचना नहीं चाहते. शायद उनके लिए इस सच्चाई का सामना करना बहुत दर्दनाक होता है.

जूलियट स्काउसो भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं.

वह कुछ ऐसे परिवारों को जानती हैं, जिन्हें हाल के वर्षों में फ़ोन करके बताया गया कि आख़िरकार उनके किसी रिश्तेदार की पहचान हो गई है.

जूलियट और उनके परिवार के लिए यह सोचना भी डरावना है कि अगला फ़ोन उन्हें आ सकता है. उनके परिवार ने डेनिस की यादों को ज़िंदा रखने के लिए बहुत मेहनत की है.

डेनिस हर तरह के काम में माहिर थे और उन्हें जैज़ संगीत बहुत पसंद था.

जूलियट कहती हैं, “इस समय पहचान हो जाने से उनकी मौत की सच्चाई नहीं बदलेगी. इससे मेरे पिता मुझे वापस नहीं मिल जाएंगे.”

“मैं उस बात को दोबारा ताज़ा नहीं करना चाहती, जिससे मैंने इतने साल में जीना और शोक मनाना सीखा है. ख़ासकर 25 साल बाद यह पुराने ज़ख़्मों को फिर से ताज़ा कर देगा.”

इसके बावजूद जूलियट मानती हैं कि यह तकनीक महत्वपूर्ण है.

डेनिस स्काउसो, एक दमकलकर्मी

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सोलेर ने देखा है कि पहचान की सूचना परिवारों को राहत भी देती है और दुख भी.

वह कहती हैं, “यह उस बात की पुष्टि करती है, जिसे परिवार हमेशा से सच मानता था. उन्हें पता होता है कि उनके क़रीबी की मौत 9/11 में हुई थी. लेकिन मुझे लगता है कि अवशेषों की औपचारिक पहचान होने तक बहुत से परिवारों के मन में कहीं न कहीं एक सवाल बना रहता है.”

उन्होंने कहा, “नई पहचान मिलने से शायद वे उस दर्द को एक बार फिर से जीते हैं. लेकिन इसके साथ ही 9/11 के बाद शुरू हुए उनके लंबे सफ़र का एक अध्याय बंद भी हो जाता है.”

सोलेर और उनके कुछ मौजूदा साथियों के लिए यह काम बेहद निजी है. इनमें से कई लोग 9/11 के दिन भी मौक़े पर मौजूद थे.

विमानों के टावरों से टकराने के बाद उनके दफ़्तर के कर्मचारी ग्राउंड ज़ीरो पहुंचे थे. जब इमारतें गिरीं, तब भी वे वहीं मौजूद थे.

उन्हें पता है कि न्यूयॉर्क के हमलों में मारे गए हर व्यक्ति की पहचान शायद कभी नहीं हो पाएगी. कुछ मामलों में किसी व्यक्ति का कोई अवशेष बचा ही नहीं होगा.

इसके बाद भी उनका यह काम रोकने का कोई इरादा नहीं है.

सोलेर कहती हैं, “जब तक परिवार अपने सवालों के जवाब तलाशते रहेंगे, हम भी उनके लिए तलाश जारी रखेंगे.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS