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हमारी दुनिया में हम से जुड़ी क्या खबरें हैं? हमारे लिए उपयोगी कौन-सी खबर है? किसने अपनी उपलब्धि से हमारा सिर गर्व से ऊंचा उठा दिया? ऐसी तमाम जानकारियां हर सप्ताह आपसे यहां साझा करेंगी, जयंती रंगनाथन

हमारे समाज में आज भी लड़कियों की त्वचा के रंग को लेकर उन्हें कठघरे में खड़ा किया जाता है। सांवली और काली लड़कियों के साथ कदम-कदम पर भेदभाव किया जाता है। त्वचा के रंग-भेद को लेकर सालों से लड़कियां लड़ रही हैं। पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिलाएं इस जंग में अपनी जगह बना भी रही हैं। अगर आपको लगता है कि उच्च पद पर आसीन महिला इस भेदभाव से नहीं जूझ रही होंगी तो आप गलत हैं। हाल ही में केरल की मुख्य सचिव सारदा मुरलीधरन का सोशल मीडिया पर लिखा एक पोस्ट वायरल हो गया, जहां उन्होंने लिखा था, ‘मुख्य सचिव के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कल मैंने एक दिलचस्प टिप्पणी सुनी कि मेरा यह कार्यकाल उतना ही काला है, जितना मेरे पति का सफेद… मुझे अपने कालेपन को स्वीकार करने की जरूरत है।’

सारदा के पति मुरलीधरन उनसे पहले राज्य के मुख्य सचिव थे। आइएएस अधिकारी सारदा इस पद पर आने से पहले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी की डायरेक्टर जनरल रह चुकी हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में आगे लिखा, ‘काला होने में कोई शर्म की बात नहीं। काला सिर्फ एक रंग ही नहीं है, काला एक वर्ग से जुड़ी समस्या है, एक हृदयहीन निरंकुशता है। लेकिन काले रंग को क्यों बदनाम किया जाता है? काला रंग ब्रह्मांड का सर्वव्यापी सत्य है। यह ऐसा रंग है जो हर जगह काम करता है।’ अपने बचपन के बारे में उन्होंने लिखा, ‘जब मैं चार साल की थी तब अपनी मां से पूछा था कि क्या वह मुझे फिर से गर्भ में रख सकती हैं और मुझे काले से गोरा और खूबसूरत बना सकती हैं?

मैंने 50 साल इस नेरेटिव के साथ दबा हुआ जीवन बिताया।’ अपने तमाम कॉम्पलेक्स से जूझते हुए उन्होंने पढ़ाई में अपना दिल लगाया और एक कामयाब आइएएस अधिकारी बनीं। उन्हें सोशल मीडिया पर यह लिखना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि कुछ लोग उनके कालेपन को निशाना बना कर टिप्पणी करने लगे थे। सारदा के इस पोस्ट के बाद कई तरह की टिप्पणियां आ रही हैं।अधिकांश स्त्रियां कह रही हैं कि इतनी बड़ी अधिकारी अगर त्वचा के रंग-भेद को ले कर अपनी कहानी कह रही हैं, तो इससे नई उम्र की कई लड़कियों को फायदा होगा और समाज की संवेदनशीलता बढ़ेगी।

ट्र्रोंलिग से क्यों परेशान होती हैं महिलाएं?

सोशल मीडिया का दखल इतना बढ़ गया है कि आप चाहकर भी इससे मुंह नहीं मोड़ सकतीं। हाल ही में एनडीटीवी में प्रकाशित एक खबर के अनुसार महिलाएं सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों और खासकर ट्र्रोंलग से पुरुषों के मुकाबले ज्यादा विचलित हो जाती हैं, दिल पर ले लेती हैं और कई बार अवसाद में भी चली जाती हैं। हॉलीवुड की नामी गायिका और अदाकारा सेलिना गोमेज ने एक इंटरव्यू में माना कि सोशल मीडिया पर उनके पोस्ट पर जो भी टिप्पणियां आती हैं, उन्हें पढ़कर वो बेचैन हो जाती हैं।

अमेरिका में पॉडकास्टर जय शेट्टी से बातचीत के दौरान उन्होंने यह बात कही कि अगर कोई उनके रूप-रंग, पोशाक या स्टाइल का मजाक उड़ाता है, आलोचना करता है तो उन्हें दुख होता है। कई बार तो वे इस बात से बहुत परेशान हो जाती हैं। उन्होंने यह भी माना कि ट्र्रोंलग से पुरुषों को खास फर्क नहीं पड़ता। उनके मंगेतर बैनी ब्लांको ने भी माना कि वो नकारात्मक टिप्पणियां पढ़ते भी हैं, तो हंस कर उड़ा देते हैं। ट्र्रोंलग को वो अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। एक अध्ययन के अनुसार पुरुषों के मुकाबले 47 प्रतिशत महिलाएं अपनी आलोचना को ले कर सहज नहीं होतीं।

कैलोरी मुक्त स्वीटनर की कारस्तानी

यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया में हाल में हुए अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि कैलोरी मुक्त स्वीटनर आपके मस्तिष्क में भूख लगने के बिंदुओं को जगाता है। इनका सेवन करने के बाद मस्तिष्क को यह संदेश जाता है कि आपको कुछ और खाना है। इस अध्ययन में शामिल डॉ. कैथलीन अलाना पेज कहती हैं कि स्वीटनर दिमाग में गड़बड़ पैदा करता है और आपके दिमाग को लगता है कि उसे वो मीठा नहीं मिल रहा, जो उसे चाहिए। इसलिए आप ऐसी चीजें खाने की ओर प्रेरित होते हैं, जिनमें ज्यादा कैलोरी होती है।

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