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मेरठ में भड़के सांप्रदायिक दंगों के दौरान दंगाइयों की उन्मादी भीड़ ने बशीर बद्र के घर को आग लगा दी थी. यह पीड़ादायक घटना बशीर बद्र ने अपनी आँखों से देखी और यह उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ साबित हुई.
बशीर बद्र की शायरी भारत और पाकिस्तान के बड़े-बड़े नेता अपने राजनीतिक भाषणों में पढ़ा करते थे. लेकिन उनकी शख़्सियत की ये ऊँचाई भी उनके घर को नफ़रत की आग से नहीं बचा सकी.
लेकिन इसी घटना ने एक ऐसी नज़्म को जन्म दिया जो शायद दुनिया रहने तक अमर रहेगी-
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.”
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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस शासन के अंतिम वर्षों यानी 1987-88 के दौरान पूरे राज्य में सिलसिलेवार सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे.
मेरठ के मलियाना और हाशिमपुरा के अलावा मुरादाबाद में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई.
मेरठ का दंगा भीषण था. 1987 में भड़के इस दंगे में दंगाइयों ने बशीर बद्र का घर जला दिया.
भोपाल में शुरू की नई ज़िंदगी
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मेरठ के हुए दंगों के बारे में बशीर बद्र अक्सर ज़िक्र करते थे.
वो बताते थे कि मेरठ के शास्त्री नगर इलाके में जहाँ उनका घर था, वहां एक मिश्रा जी रहते थे.
दंगे के बाद उन्होंने अपना गैराज उन्हें रहने के लिए दे दिया था. इसमें बशीर बद्र ने आग से बची अपनी किताबों को सजाकर एक छोटी सी लाइब्रेरी बना ली थी.
इस भयावह नुक़सान ने बशीर बद्र और उनके परिवार को हमेशा के लिए मेरठ छोड़ने पर मजबूर कर दिया. फिर वे भोपाल जाकर बस गए, जहाँ उन्होंने नई ज़िंदगी शुरू की.
उनके घर और वर्षों की रचनात्मक मेहनत बेकार होने ने उनके नज़रिये पर गहरा असर डाला. इसी घटना से उनके कई मार्मिक शेर जन्मे, जिनमें विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा का दर्द झलकता है. इसके बाद उन्होंने लोग टूट जाते हैं एक मकान बनाने में… जैसा शेर लिखा.
20 साल की उम्र से ग़ज़लों को मिलने लगी थी पहचान
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बशीर बद्र पर पीएचडी करने वाले और भोपाल के जानेमाने शायर डॉक्टर अंजुम बाराबंकवी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “बशीर बद्र का जन्म 1935 में हुआ था. प्रमाणपत्रों में जन्म कानपुर में होना दर्ज है.और परिजन बताते हैं कि बशीर बद्र का पैतृक गांव उत्तर प्रदेश के मौजूदा आंबेडकर नगर ज़िले का बुकियां गांव है.”
कई मुशायरों के संयोजक रहे सूर्यकांत पांडेय का भी कहना है कि बशीर बद्र का जन्म कानपुर में हलीम इंटर कॉलेज के पास हुआ था.
शहनवाज़ आलम के अनुसार, बशीर बद्र ने कानपुर के हलीम मुस्लिम कॉलेज में तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की.
फिर उनके पिता का तबादला इटावा हो गया, जहाँ उन्होंने मोहम्मद सिद्दीक़ इस्लामिया कॉलेज से हाई स्कूल पूरा किया.
बशीर बद्र की साहित्यिक प्रतिभा बचपन में ही उभर आई थी. जब वे सातवीं कक्षा में थे, तब उनकी एक ग़ज़ल नियाज़ फ़तेहपुरी की पत्रिका ‘निगार’ में प्रकाशित हुई.
इससे उन्हें इटावा के साहित्यिक जगत में पहचान मिली. 20 साल की उम्र तक उनकी ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान की प्रमुख पत्रिकाओं में छपने लगी थीं.
उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल की. उनके शोध निर्देशक प्रोफेसर आले अहमद सुरूर थे.
उनके शोध का विषय था- “स्वतंत्रता के बाद की उर्दू ग़ज़ल का आलोचनात्मक अध्ययन.”
शायरी के लिए पुलिस विभाग की नौकरी छोड़ दी
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सैयद नज़ीर अहमद के तीन बेटे बशीर, नज़ीर और सगीर बताए जाते हैं.
डॉक्टर अंजुम बाराबंकवी के मुताबिक, “बशीर बद्र के पिता सैयद नज़ीर तत्कालीन पुलिस सेवा में थे. उनके पिता के बीमार होने के बाद तत्कालीन पुलिस प्रशासन ने उनकी जगह बशीर बद्र को नौकरी पर रखा था.”
बशीर बद्र के एएमयू में जूनियर रहे अफज़ल मुरतज़ा के मुताब़िक, “बशीर बद्र के पिता सैयद नज़ीर अहमद, ब्रिटिश इंडिया पुलिस में असिस्टेंट अकाउंटेंट थे. बशीर साहब अक्सर पुलिस ट्रेनिंग का ज़िक्र करते थे.”
बाराबंकवी ने बताया कि उत्तरप्रदेश के फतेहपुर में उनकी पुलिस में भर्ती हुई थी, जिसके बाद पहली पोस्टिंग उस वक्त के इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुई.
वहां से उनका तबादला सीतापुर और आस-पास के ज़िलों में हुआ था. कुछ समय काम करने के बाद साल 1967 में इन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ दी थी.
सूर्यकांत पांडेय बताते हैं, “कुछ साथियों ने यह भी बताया कि बशीर बद्र ने 85 रुपये महीने की सैलरी पर पुलिस विभाग में नौकरी की थी.”
इसी दौरान उन्होंने क़मर जहाँ से शादी की और उनके तीन बच्चे हुए. उन्हें बचपन से ही शायरी का गहरा शौक था. नौकरी में लगे रहने के बावजूद वो इस शौक को समय देते थे.
वो स्कॉलरशिप और मुशायरों की कमाई से परिवार चलाते थे. 1974 में पीएचडी के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए एएमयू में एडहॉक टीचर के दौर पर पढ़ाया भी.
अलीगढ़ पहुंचे तो मज़रूह सुल्तानपुरी से हुई क़रीबी
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साल 1970-71 में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में स्नातक करने गए. एएमयू में उनके जूनियर रहे कवि अफज़ल मुरतज़ा बताते हैं कि वे वहां विक्टोरिया गेट के पीछे बनी ‘पान वाली कोठी’ में रहने लगे.
अफज़ल मुरतज़ा बताते हैं कि हर शाम अलीगढ़ की शमशाद मार्केट से सुलेमान हॉल की ओर जाते समय ‘नीली छतरी’ नाम की एक इमारत पड़ती थी, जहाँ मशहूर उर्दू आलोचक रशीद अहमद सिद्दीकी रहते थे.
उनके घर रोज़ शाम को महफ़िलें जमती थीं, जिनमें बशीर बद्र, मयकश अक़बराबादी और अन्य लोग शामिल होते थे.
मज़रूह सुल्तानपुरी भी कभी-कभी आते थे. अफज़ल मुरतज़ा कहते हैं कि बशीर बद्र हमेशा अपनी लिखी ग़ज़लें मज़रूह सुल्तानपुरी को दिखाते थे.
पहली पत्नी को अंतिम विदा नहीं दे सके
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बशीर बद्र ने दो शादियां कीं. पहली पत्नी का नाम क़मर जहाँ था, और दूसरी पत्नी डॉ. राहत सुल्तान थीं, जिनके साथ उन्होंने भोपाल में अपनी बाद की ज़िंदगी बिताई.
सूर्यकांत पांडेय बताते हैं, “मई 1984 में जब बशीर बद्र पाकिस्तान में मुशायरे में थे, उसी दौरान उनकी पत्नी का निधन हो गया. फिर 1986 में उन्होंने भोपाल की डॉ. राहत सुल्तान से शादी की.”
शायर डॉक्टर अंजुम बाराबंकवी का कहना है कि “यह सच है कि जब उनकी पहली पत्नी का देहांत हुआ तो बशीर साहब पाकिस्तान में थे. वे वहां से दो दिन बाद लौटकर आ पाए क्योंकि उस समय यात्रा के इतने पर्याप्त साधन नहीं थे. उनकी अनुपस्थिति में उनके तीन बच्चों और नाते-रिश्तेदारों के सहयोग से पहली पत्नी का अंतिम संस्कार हुआ. “
दंगे की आग में किस्मत से बेटा बच गया
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प्रोफेसर अनिल सिंह बताते हैं कि अप्रैल 1987 में मेरठ में भड़के दंगे लगभग तीन महीने तक चले, और इस दौरान 100 से अधिक लोगों की मौत हुई.
हालात बिगड़ने पर बशीर बद्र रिश्तेदारों के यहां चले गए, जबकि उनका छोटा बेटा बिन्नू घर पर था.
हमले के दिन सुबह के समय भीड़ दक्षिण दिशा से कॉलोनी में घुसी. उस वक्त ज़्यादातर लोग घरों में थे. बिन्नू पास के पार्क में था.
भीड़ ने बशीर बद्र के घर पर हमला किया, तोड़फोड़ की और फिर आग लगा दी. बाद में कॉलोनी के लोग इकट्ठा हुए और हालात को संभाला.
बशीर बद्र ने भी अपने घर को बचाने की कोशिश में दंगाइयों का सामना किया.
हालांकि हालात सामान्य होने पर परिवार वापस लौटा, लेकिन इस घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. एक साल बाद 1988 में उन्होंने वह घर बेच दिया और हमेशा के लिए भोपाल चले गए.
(इस स्टोरी के लिए बीबीसी संवाददाता विष्णुकांत तिवारी ने भी रिपोर्टिंग की है.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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