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मनोज बाजपेयी अब दाल-रोटी चलाने के लिए काम नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि मटीरियलिस्टिक चीजें कमाने की उन्होंने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। मनोज बोले कि सारे लोग मौत की तरफ बढ़ रहे हैं, यही जिंदगी का सच है।

मनोज बाजपेयी जीवन की मोह-माया से ऊपर उठ चुके हैं। एक पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि उनका बीच-बीच में उनका एक्टिंग छोड़ने का मन करने लगता है। मनोज ने अफसोस जताया कि काम के दौलत-शोहरत कमाने के फेर में वह अपने मां-बाप के साथ ज्यादा वक्त नहीं बिता पाए। उन्होंने यह भी कहा कि सच यही है कि सारे लोग अपनी मौत की तरफ बढ़ रहे हैं।

एक्टिंग छोड़ने का मन

मनोज बाजपेयी रणवीर इलाहाबादिया के शो पर थे। एक्टिंग करियर पर बोले, ‘आपको सच बताऊं। करीब 10 साल से ना बीच-बीच में मन करता है कि मैं छोड़ दूं। लेकिन फिर कभी कोई रोल आ जाता है फिर मैं चला जाता हूं। तो मैं एक्टिंग को मजबूरी के तौर पर नहीं करना चाहता हूं कि मुझे घर पर दाल-रोटी ले जानी है या मुझे ऐसी कुछ जरूरत को पूरा करना है। इसके लिए मुझे एक्टिंग नहीं करनी है। मुझे एक्टिंग करनी है कि अगर कोई चरित्र है उसको निभाने में बड़ा मजा आएगा या आजकल मेरा… आपके शो में पहली बार कह रहा हूं। आजकल मेरा बड़ा मन कर रहा है कमर्शियल फिल्म करने का। पता नहीं क्यों? जबकि मैं बहुत दूर रहा हूं। नॉनसेंस कॉमेडी, थोड़ा गानों पर नाचो। घर से कोई तैयारी करके नहीं आना है बस गुडबाय करके निकलो। बिना कुछ सोचे कि आप क्या कर रहे हो।’

सफलता की चुकाई बड़ी कीमत

मनोज बाजपेयी बोले कि सब लोग अब बेसिक पर लौट रहे हैं। मनोज ने ये भी कहा कि उन्होंने सफलता की बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। वह अपने पेरेंट्स के साथ ज्यादा नहीं रह पाए। मनोज बोले, ‘अगर मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मैंने बहुत सी चीजें खोईं। मैं अपने पेरेंट्स के साथ वक्त नहीं बिता पाया। जब वे गुजरे तब हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे थे। मैं उनके साथ कभी रहा ही नहीं। इतने दूर चले गए कि समझ नहीं पाए। पहले तो मैं बोर्डिंग में रहा। हम लोग गांव के लोग थे तो बोर्डिंग में रखे जाते थे। इसके बाद एक्टर बनने के लिए दिल्ली आया। दिल्ली में बहुत कुछ सीखा। इंग्लिश सीखी, शहर का माहौल सीखा। हर दिन खाने की व्यवस्था भी करनी होती थी।’

मां-बाप के साथ और वक्त बिता सकते थे

मनोज बाजपेयी ने बताया कि उनके दोस्तों ने बहुत मदद की। एक तरह से पाला। तब मां-बाप से दूरी बन गई। चिट्ठियों से बात होती थी। कभी-कभी ही मां-बाप से बात हो पाती थी। मनोज बोले, ‘मटीरियलिस्टिक चीजों की खोज में कई चीजें कुर्बान की। जब सब हासिल हो जाता है तो लगता है कि क्या ये वर्थ था? कभी-कभी लगता है कि पिता के साथ कुछ और समय मिल जाता। मां के साथ कई ईशूज थे, शायद खत्म कर सकते थे।’

मौत की तरफ बढ़ रहे हैं सब

मनोज बाजपेयी बोले कि आपके पूर्वजों का जो घर होता है, वहां एक-एक दीवार उस पर लटकी तस्वीर तब याद आती है जब आपके मां-बाप नहीं होते। वह बोलते हैं, ‘अब मैं वहां जाता हूं तो ज्यादा देर नहीं रुकता। क्योंकि फायदा नहीं है। आपको ये बात मानना पड़ती है कि धीरे-धीरे आप मौत की तरफ बढ़ रहे हैं। अपनी अंतिम यात्रा की तरफ बढ़ रहे हैं।’

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