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मुसलमान नेता भी ममता बनर्जी से दूरी क्यों बना रहे हैं?

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Source :- BBC INDIA

ममता बनर्जी

इमेज स्रोत, Getty Images

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर कम से कम 31 मुस्लिम विधायक चुने गए थे, जो पार्टी के 80 विधायकों का लगभग 40 प्रतिशत हैं.

सालों तक ममता बनर्जी को मुस्लिम समुदाय का मजबूत समर्थन मिलता रहा है और इस बात से बहुत कम लोग असहमत होंगे कि उनकी पिछली चुनावी सफलताओं में मुस्लिम वोटों की बड़ी भूमिका रही है.

हालांकि, तृणमूल विधायक दल में उभरे बड़े विभाजन ने यह साफ़ कर दिया है कि अब इन मुस्लिम विधायकों में से कई ममता बनर्जी के साथ खड़े नहीं हैं.

विधायक दल के नेता के रूप में ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में स्पीकर को पत्र लिखने वाले 58 विधायकों में कम से कम 17 प्रमुख मुस्लिम विधायक शामिल थे. इसे ऐसे कह सकते हैं कि पार्टी के आधे से अधिक मुस्लिम विधायक अब ममता बनर्जी से अलग खेमे में दिखाई दे रहे हैं.

इनमें सबसे प्रमुख नाम कसबा के विधायक और प्रभावशाली तृणमूल नेता जावेद अहमद ख़ान का है, जिन्हें लंबे समय तक ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगियों में गिना जाता था.

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आंतरिक लोकतंत्र में कमी का आरोप

तृणमूल कांग्रेस का कोलकाता स्थित मुख्यालय ‘तृणमूल भवन’ जावेद अहमद ख़ान की ओर से उपलब्ध कराई गई ज़मीन पर ही बना था.

भवानीपुर में भी ममता काफ़ी हद तक उनके समर्थन पर निर्भर रहीं थीं. लेकिन अब ख़ान ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी से दूरी बना ली है और पार्टी में ‘आंतरिक लोकतंत्र की कमी’ का आरोप लगाया है.

ऋतब्रत बनर्जी के साथ खड़े होकर उन्होंने यहां तक कहा, “देखते हैं आने वाले दिनों में ममता बनर्जी के साथ कितने लोग रहते हैं.”

बुधवार को विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में पत्र देने वाले अन्य मुस्लिम विधायकों में रघुनाथगंज के अख़रुज्जमान ख़ान शामिल हैं, जिन्हें मुख्य सचेतक (चीफ़ व्हिप) नियुक्त किया गया है.

उनके अलावा सूती के इमानी बिस्वास, हरिहरपाड़ा के नियामत शेख़, चोपड़ा के हामिदुल रहमान और पूर्व मंत्री ग़ुलाम रब्बानी शामिल हैं.

ममता बनर्जी के साथ बने रहने वाले मुस्लिम विधायकों की संख्या अब केवल 13 या 14 बताई जा रही है. इनमें मालतीपुर के अब्दुर रहीम बॉक्सी, इटाहार के मोशर्रफ़ हुसैन और हरिश्चंद्रपुर के मतिउर रहमान शामिल हैं.

हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर ममता बनर्जी का पार्टी संगठन पर नियंत्रण कमज़ोर पड़ता है तो इनमें से भी कितने विधायक ममता के प्रति वफ़ादार बने रहेंगे.

बताया जाता है कि ऋतब्रत गुट इन नेताओं के साथ भी लगातार संपर्क बनाए हुए हैं.

ऋतब्रत बनर्जी का क़ोट

मुस्लिम नेता ममता का साथ क्यों छोड़ रहे हैं?

इस बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण दिखाई देते हैं-

1. मुस्लिम वोट बैंक में सेंध

हालिया चुनावी नतीजे संकेत देते हैं कि ममता बनर्जी के पारंपरिक मुस्लिम समर्थन आधार में दरारें उभरने लगी हैं.

साथ ही, कई मुस्लिम बहुल ज़िलों में बीजेपी के पक्ष में हिंदू वोटों के एकजुट होने के संकेत भी मिले हैं.

बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कई मुस्लिम नेता अपने प्रभाव और निर्वाचन क्षेत्रों को बचाने के लिए धार्मिक वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

2. विजेता के साथ रहने की राजनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से “विजेता ही सब कुछ” वाली संस्कृति से प्रभावित रही है.

कई विधायकों के लिए ममता के साथ बने रहने का मतलब अगले पांच सालों तक सीमित राजनीतिक प्रभाव हो सकता है.

इसके उलट, ऋतब्रत बनर्जी गुट के साथ जाने से (जिसे बीजेपी का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त माना जा रहा है), अधिक राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक संसाधनों तक पहुंच मिल सकती है.

पश्चिम बंगाल में विपक्षी विधायक के लिए सत्ता प्रतिष्ठान के सहयोग के बिना अपने क्षेत्र के किसी एक व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कराना भी मुश्किल हो सकता है.

3. जांच एजेंसियों का डर

जावेद ख़ान सहित कुछ नेताओं पर आय से अधिक संपत्ति और कोलकाता में बड़ी संख्या में अवैध निर्माण से जुड़े आरोप लग चुके हैं.

ऐसी अटकलें हैं कि बीजेपी समर्थित राजनीतिक माहौल में ईडी या सीबीआई जैसी एजेंसियों की संभावित जांच की आशंका भी कुछ नेताओं को ममता बनर्जी से दूरी बनाने का कारण बन रही है.

कुनाल घोष का बयान

ममता के लिए मुश्किल समय

लगातार 15 सालों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में रहने के बाद हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की टीएमसी की हार हुई.

उसके बाद से ही ममता बनर्जी अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही हैं.

विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद पार्टी में तेज़ होती बग़ावत और इस्तीफ़ों के सिलसिले को देखते हुए राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस क्या आने वाले समय में टूट सकती है?

इसके साथ ही यह सवाल उठ रहा है कि क्या सत्ता ही तृणमूल कांग्रेस को एकजुट रखने का एकमात्र ज़रिया थी?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS