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US Iran Big Deal: अमेरिका और ईरान के बीच 300 अरब डॉलर की ऐतिहासिक ‘पीस डील’ का ड्राफ्ट तैयार हो गया है। युद्ध रोकने के बदले ईरान ने मुआवजे और प्रतिबंधों से राहत की मांग की है, जबकि डोनाल्ड ट्रंप इसे निवेश फंड बता रहे हैं।

US Iran Big Deal: अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी संघर्ष को खत्म करने के लिए एक संभावित शांति समझौते का ड्राफ्ट तैयार हुआ है। इसकी कीमत कम से कम 300 अरब डॉलर आंकी गई है। ईरान युद्ध रोकने के एवज में भारी-भरकम फंड, प्रतिबंधों से राहत और जब्त किए गए अपने पैसों की मांग कर रहा है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं। हालांकि, 300 अरब डॉलर के इस ‘पुनर्निर्माण पैकेज’ को लेकर दोनों देशों के अपने-अपने दावे हैं, जो इस शांति समझौते की सबसे कमजोर कड़ी बन सकता है। ईरान इसे युद्ध क्षति का मुआवजा मान रहा है, जबकि अमेरिका इसे निजी निवेश और पुनर्निर्माण फंड के रूप में पेश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्याएं समझौते को नाकाम कर सकती हैं और युद्ध को फिर से शुरू कर सकती हैं।

300 अरब डॉलर का पेंच: मुआवजा या निवेश?

ईरानी मीडिया के मुताबिक, शांति समझौते के तहत ईरान की वार्ता टीम ने शर्त रखी है कि अमेरिका और उसके सहयोगी कम से कम 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण प्लान दें। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा है। उनका मानना है कि इस भारी-भरकम आर्थिक राहत के बिना शांति समझौते का कोई मतलब नहीं है और यह जल्द ही टूट जाएगा।

वहीं, पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इस 300 अरब डॉलर के पैकेज को एक “अंतरराष्ट्रीय निवेश फंड” के रूप में पेश किया जा रहा है। अमेरिका का जोर सीधे तौर पर सरकार को मुआवजा देने के बजाय, प्राइवेट निवेश और रियल एस्टेट डेवलपमेंट के जरिए युद्ध के बाद के हालात सुधारने पर है। ट्रंप ने अप्रैल में भी साफ किया था कि शुरुआत में कोई बड़ा नकद भुगतान नहीं किया जाएगा।

ईरान की अन्य प्रमुख मांगें

300 अरब डॉलर के इस पैकेज के अलावा ईरान की ओर से कुछ और कड़ी शर्तें भी रखी गई हैं।

  • 60 दिनों की बातचीत की अवधि के दौरान ईरान की 24 अरब डॉलर की जब्त संपत्ति छोड़ी जाए (जिसका आधा हिस्सा शुरुआत में ही देना होगा)।
  • ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बिक्री पर लगे सभी प्रतिबंध हटाए जाएं।
  • ईरान को उसके वित्तीय संसाधनों तक पूरी तरह पहुंचने की इजाजत मिले।

ट्रंप के लिए राजनीतिक जीत या मजबूरी?

इस डील को डोनाल्ड ट्रंप एक बड़ी सफलता के रूप में पेश कर रहे हैं। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, “सभी को बधाई! … तेल को बहने दो!”। अमेरिका का मानना है कि इस डील से वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से सुरक्षित खोला जा सकेगा।

हालांकि, राजनीतिक तस्वीर थोड़ी अलग है। अमेरिका चाहे इसे ‘मुआवजा’ न कहे, लेकिन एक महंगे युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के लिए इतना बड़ा निवेश करना यह दिखाता है कि वाशिंगटन अब अपनी शर्तें थोपने के बजाय जमीनी हकीकत से समझौता कर रहा है। नवंबर में होने वाले ‘मिडटर्म चुनाव’ से पहले यह युद्ध ट्रंप के लिए राजनीतिक सिरदर्द बन गया था, क्योंकि अमेरिकी नागरिक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इसके असर से काफी निराश थे।

समझौते पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

इस शांति समझौते की सफलता पर भी बड़े सवाल मंडरा रहे हैं।

अभी तक अमेरिका ने 300 अरब डॉलर के इस भारी-भरकम आंकड़े की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। ईरान के कट्टरपंथी इस डील में दी जा रही संभावित रियायतों की आलोचना कर रहे हैं। वहीं, इजरायली अधिकारियों ने लेबनान से जुड़े प्रावधानों पर आपत्ति जताई है।

मध्य पूर्व के विश्लेषक और पूर्व राजनयिक आरोन डेविड मिलर का कहना है कि लेबनान इस समझौते का शुरुआती ‘स्ट्रेस टेस्ट’ साबित हो सकता है।

अमेरिका के पूर्व अधिकारी इलियट अब्राम्स के मुताबिक, समझौते का भविष्य इस मेमोरेंडम से ज्यादा ईरान के आंतरिक राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा। कुल मिलाकर, फिलहाल यह सिर्फ एक शुरुआती ड्राफ्ट है, कोई पक्की पीस ट्रीटी नहीं। पूरी पारदर्शिता और 300 अरब डॉलर की गारंटी पर स्पष्टता के बिना, इस डील के टूटने और दोबारा दुश्मनी भड़कने का खतरा अब भी बना हुआ है।

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