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क़ानूनी बोर्डों और सरकारी अधिकारियों के प्रबंधन वाले मंदिर भी बिना किसी घोटाले या विवाद के सुचारु प्रशासन सुनिश्चित करने में पूरी तरह सफल नहीं रहे हैं.
लेकिन धार्मिक पूजा स्थल के प्रबंधन की एक सदी पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने दान की चोरी को रोकने में मदद की है.
इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को ‘सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925’ से अधिकार मिलते हैं. यह क़ानून ब्रिटिश काल में लाया गया था और बाद में भारतीय संसद ने भी इसे पारित किया था. अब तक इस अधिनियम में कई बार संशोधन किया गया है.
गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में धार्मिक अध्ययन विभाग के प्रोफे़सर और डीन, अमरजीत सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया, “आज भी यह व्यवस्था बहुत पारदर्शी है.”
“शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) हर महीने ‘गुरुद्वारा गजट’ प्रकाशित करती है, जिसमें उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी गुरुद्वारों की आय और व्यय की जानकारी दी जाती है.”
प्रोफ़ेसर सिंह बंटवारे से पहले के समय का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जब ‘पाई’ जैसी मुद्रा इकाइयां हुआ करती थीं, जो एक पैसे का तीसरा हिस्सा होती थी. इस ‘पाई’ का भी हिसाब-किताब रखा जाता था.
उन्होंने कहा, “यही पारदर्शिता दान के मामले में भी अपनाई जाती है. अगर कोई सोना या दूसरी कीमती चीज़ें दान करता है, तो गुरुद्वारे के चार-पांच सदस्यों की मौजूदगी में कोई सुनार तुरंत उसकी शुद्धता की जांच करता है और इसकी रिपोर्ट एसजीपीसी के हेड ऑफिस भेजी जाती है.”
डेमोक्रेटिक सिस्टम
पूजा-स्थलों के मैनेजमेंट में सरकार की भागीदारी के उलट, सिख गुरुद्वारा एक्ट में 117 सदस्यों वाली एक विधानसभा जैसी संस्था के लिए सही तरीके से चुनाव कराने का प्रावधान है.
एसजीपीसी अध्यक्ष के ‘ऑफ़िसर-ऑन-स्पेशल ड्यूटी’ एस. शाहबाज़ सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “ये सदस्य फिर 15 सदस्यों वाली एक एग्जीक्यूटिव कमेटी और उसके अध्यक्ष को चुनते हैं. नई चुनी गई सभा और अध्यक्ष की पहली बैठक अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर की देखरेख में होती है.”
यह अलग बात है कि कई वजहों से, जिनमें ज़्यादातर राजनीतिक मतभेद शामिल हैं, अदालतों में चल रहे मुकदमों के कारण पिछले 12 सालों से हर पांच साल में होने वाला चुनाव नहीं हो पाया है.
केंद्र सरकार ने भी चुनाव कराने पर कोई फ़ैसला नहीं लिया है. शाहबाज़ सिंह ने कहा, “जब तक चुनाव नहीं हो जाते, मौजूदा व्यवस्था ही काम करती रहेगी.”
दान की चोरी की कोई शिकायत नहीं
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हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी मज़बूत है कि अब तक गुरुद्वारों में दिए गए दान और अन्य योगदानों की चोरी का कोई मामला सामने नहीं आया है.
गुरुद्वारे पूरी तरह से सिख समुदाय के सदस्यों द्वारा दिए गए दान से चलते हैं. इसमें यह नियम अपनाया जाता है कि सदस्य अपनी कमाई का 10वां हिस्सा ज़रूरतमंदों की भलाई के लिए देते हैं.
प्रोफ़ेसर अमरजीत सिंह ने बताया कि हर दान पेटी में दो ताले होते हैं और उसे अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में स्थित एसजीपीसी हेडक्वार्टर से भेजे गए एक ख़ास नंबर वाली सील से बंद किया जाता है. यह सील आधिकारिक तौर पर नियुक्त गुरुद्वारा इंस्पेक्टर के ज़रिए भेजी जाती है.
उन्होंने कहा, “चूंकि अलग-अलग चाबी रखने वालों के पास दो अलग-अलग ताले होते हैं, इसलिए कोई भी व्यक्ति अकेले पेटी नहीं खोल सकता. इंस्पेक्टर पेटी खोलने से पहले सील नंबर की जांच करता है.”
शाहबाज़ सिंह ने कहा, “हर साल गुरुद्वारों की आय का एक निश्चित हिस्सा एसजीपीसी को योगदान के तौर पर दिया जाता है. इसी तरह एक निश्चित हिस्सा जनरल बोर्ड फंड में जाता है, जिसका इस्तेमाल कर्मचारियों की सैलरी, ग़रीब परिवारों की आर्थिक मदद, मेडिकल सहायता, शिक्षा में मदद, गुरुद्वारों के रख-रखाव और लंगर के रोज़ाना के ख़र्च के लिए किया जाता है.”
प्रोफ़ेसर अमरजीत सिंह ने कहा कि यह सिस्टम सबसे बड़े गुरुद्वारों से लेकर गांव के स्तर के गुरुद्वारों तक एक जैसा ही है.
उन्होंने कहा, “संगत को हर महीने पैसों के लेन-देन के बारे में जानकारी दी जाती है कि कितना पैसा आया और कितना खर्च हुआ. अगर कुछ खरीदना हो, तो इसकी सार्वजनिक रूप से घोषणा की जाती है. अगर संगत को लगता है कि कुछ गलत हो रहा है और मामला स्थानीय स्तर पर नहीं सुलझ पाता, तो यह मामला अकाल तख्त तक जाता है.”
प्रोफ़ेसर अमरजीत सिंह ने कहा, “प्रशासन का लोकतांत्रिक स्वरूप ही धोखाधड़ी और फंड के गलत इस्तेमाल को रोकने में मदद करता है. जैसे दूसरे धर्मों में कुछ खास तरह के खाने पर रोक है, वैसे ही सिख धर्म में धार्मिक दान का गलत इस्तेमाल करना सख़्ती से मना है. और ‘सेवा’ की अवधारणा भी जवाबदेही और पारदर्शिता की अवधारणा को बढ़ावा देती है.”
2025-26 के लिए एसजीपीसी का बजट 1,386.47 करोड़ रुपये था. इसमें गुरुद्वारों के रख-रखाव के लिए 1,062 करोड़ रुपये और धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए 110 करोड़ रुपये शामिल थे.
दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय
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ईसाई समुदाय में भी कमोबेश ऐसी ही व्यवस्था है. कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों ही चर्च अलग-अलग निकायों- जैसे पैरिश काउंसिल/पास्टोरेट, डायोसिस/आर्चडायोसिस पास्टोरल काउंसिल और सिनॉड (जो खास तौर पर धार्मिक मामलों को देखता है) के लिए चुनाव कराने की लगभग एक जैसी व्यवस्था का पालन करते हैं.
दोनों ही समुदायों के प्रतिनिधियों ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि “दान पूरी तरह सुरक्षित है. ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है.”
कैथोलिक चर्च के मामले में सभी संपत्तियां आर्चडायोसिस के पास होती हैं. प्रोटेस्टेंट समुदाय में संपत्तियों का प्रबंधन, ‘चर्च ऑफ़ साउथ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन’ (सीएसआईटीए) द्वारा किया जाता है.
कर्नाटक सेंट्रल डायोसिस के एक वरिष्ठ सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “सीएसआईटीए सभी संपत्तियों के लिए रिटर्न फाइल करता है.”
लेकिन उस सदस्य ने यह भी कहा, “यह संभव है कि भ्रष्टाचार के कुछ मामले हों, जैसे जब टेंडर मंगाए जाते हैं.”
‘केरल आर्चडायोसिसन मूवमेंट फॉर ट्रांसपेरेंसी’ के संयोजक शिजु एंटनी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “दान की चोरी का कोई मामला नहीं है. लेकिन ज़मीन के मालिकाना हक और चर्च की संपत्ति हड़पने या बेचने के लिए अवैध दस्तावेज़ हासिल करने की मिली-भगत से जुड़े मुद्दे हैं.”
“हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चर्च की संपत्तियां पांच या सात सदियों से मौजूद हैं और उनके दस्तावेज़ या तो मिलना मुश्किल हो सकते हैं या फिर वे ऐसे दौर के हो सकते हैं जो आज की दुनिया में मान्य न हों. इसी तरह संपत्तियों को हड़पने की कोशिशें की जाती हैं.”
अजमेर दरगाह
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ईसाई समुदाय की तरह ही मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों के मैनेजमेंट में ज़मीन विवाद का मुख्य मुद्दा रही है. इसकी ज़मीनों या संपत्तियों पर कब्ज़े या हड़पने को लेकर विवाद बना हुआ है.
इसी वजह से केंद्र सरकार ‘वक्फ़ (संशोधन) एक्ट, 2025’ लेकर आई. लेकिन साफ़-सुथरी वक्फ़ संपत्तियों की लिस्ट बनाने की प्रक्रिया अभी भी बहुत दूर की बात लगती है.
हाल के हफ़्तों में जैसा कि पहले भी होता रहा है, मुस्लिम समुदाय की सबसे मशहूर दरगाह और सूफ़िज़्म के मुख्य प्रतीक ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, जिसे ‘ग़रीब नवाज़ दरगाह’ के नाम से भी जाना जाता है, वहां दान के मैनेजमेंट का मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है.
इस दरगाह में न सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के लोग, बल्कि हिंदू, ईसाई और सिख समुदाय के लोग भी आते हैं. इस बात का ज़िक्र हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में कई मुकदमों के दौरान लगातार किया गया है.
राम मंदिर में दान के कथित गबन के बाद, सूफ़ी दरगाह के मैनेजमेंट पर भी इसी तरह का आरोप लगा. दरगाह के गद्दी-नशीन (आध्यात्मिक उत्तराधिकारी) और पुश्तैनी खादिम (देखभाल करने वाले) सैयद सरवर चिश्ती ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “मैं साफ़ तौर पर कहना चाहता हूं कि न तो कोई गबन हुआ है और न ही चोरी. एक कॉन्ट्रैक्टर के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है, जो समय पर ज़रूरी फ़ंड जमा नहीं कर पाया था. इसीलिए एफआईआर दर्ज की गई.”
उन्होंने कहा, “हमारे खातों का नियमित रूप से ऑडिट होता है. सब कुछ ठीक-ठाक है. हम 104 सुन्नी मदरसों को फंड देते हैं. हमें जो फंड मिलता है, उसका इस्तेमाल हम कई कल्याणकारी कामों के लिए करते हैं. हम बहुत सारे चैरिटी के काम करते हैं, जैसे मेडिकल मदद, विधवा पेंशन, छात्रों को स्कॉलरशिप वगैरह देना. हमें बदनाम करने के लिए यह सिर्फ़ प्रोपेगैंडा है.”
दरगाह ख्वाजा साहेब एक्ट, 1955 के अनुसार, तीन पक्ष- दरगाह कमेटी, अंजुमन-ए-खादिम और दीवान या सज्जादानशीन, इसके कामकाज के अलग-अलग पहलुओं को संभालते हैं.
केंद्र सरकार की बनाई गई दरगाह कमेटी रख-रखाव, प्रशासन और कुल मिलाकर मैनेजमेंट का काम देखती है. कमेटी में एक चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) या नाज़िम होता है. अंजुमन-ए-खादिम धार्मिक रस्में निभाती है और श्रद्धालुओं को सेवाएं देती है.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री डिपार्टमेंट में सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी के पूर्व प्रोफेसर सैयद लियाकत हुसैन मोइनी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “दरगाह कमेटी को जो पैसा मिलता है, वह रख-रखाव के लिए होता है. लेकिन सच कहूं तो, अगर आप खुद आकर देखें, तो रख-रखाव का काम ज़्यादा नहीं हुआ है. संक्षेप में कहें तो कमेटी ने कोई खास तारीफ़-ए-काबिल काम नहीं किया है.”
प्रोफ़ेसर मोइनी ने कहा, “खादिमों को जो चढ़ावा (या दान) दिया जाता है, वह अंजुमन के पास जाता है. यह सारा पैसा रस्मों को पूरा करने, विद्वानों और जिन महिलाओं के पति नहीं रहे उनकी मदद में खर्च होता है. कुछ हिस्सा खादिमों को भी दिया जाता है. इसके अलावा जो लोग खादिमों के घरों में ‘पेइंग गेस्ट’ के तौर पर रहते हैं, वे पैसे देते हैं. जब वे चादर या फूल चढ़ाते हैं तो वह उस खास खादिम को मिलता है.”
प्रोफ़ेसर मोइनी ने कहा, “‘देग’ में जो दान दिया जाता है, उसका काम अंजुमन द्वारा टेंडर निकालने के बाद एक ठेकेदार संभालता है. ठेके की रकम अंजुमन के दफ़्तर में जमा की जाती है और इसी से सारे काम होते हैं. ठेकेदार जो भी इकट्ठा करता है, वह उसी का होता है. कभी उसे फ़ायदा होता है, तो कभी नुकसान. ठेके की रकम बैंक में जमा की जाती है. हिसाब-किताब रखा जाता है और कोई गड़बड़ी नहीं होती है.”
उन्होंने कहा, “दरगाह कमेटी का फ़ंड अलग होता है. कमेटी का काम रख-रखाव, मदरसा, शिक्षा वगैरह की देखभाल करना है. लेकिन सच कहूं तो ज़्यादा कुछ नहीं किया गया है. कमेटी का कामकाज हमेशा साफ़-सुथरा नहीं होता है.”
‘पारदर्शिता की कमी विवाद की वजह’
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हालांकि, बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) के रिटायर्ड डीआईजी और सीईओ मोहम्मद बिलाल खान ने साफ़ किया कि दरगाह की सभी तरह की आय और उससे जुड़े खर्चों का साल में दो बार ऑडिट किया जाता है.
उन्होंने कहा, “दरगाह कमेटी भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में है. इसलिए इसका ऑडिट भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के तय नियमों के अनुसार किया जाता है. इसके अलावा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी समय-समय पर अचानक निरीक्षण और जांच करते रहते हैं.”
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “चाहे दान हुंडी में मिले या डिजिटल माध्यम से, तय प्रक्रिया के अनुसार उन सभी का पूरा, पारदर्शी और व्यवस्थित हिसाब-किताब रखा जाता है.”
उन्होंने बताया कि दरगाह कमेटी (जिसे वह रिपोर्ट करते हैं) नियमित रूप से विकास कार्य करती रहती है. जैसे हाल ही में उसने पुराने प्रवेश द्वारों और अन्य ज़रूरी बुनियादी ढांचों के विस्तार और नवीनीकरण का काम किया था.
दरगाह के विकास का काम हमेशा चलता रहता है ताकि सालाना उर्स के दौरान आने वाले बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही सुचारू और सुरक्षित बनी रहे.
इसके साथ ही कमेटी नियमित रूप से लगभग 200 कर्मचारियों का वेतन देती है और दरगाह शरीफ, उससे जुड़ी सभी वक्फ संपत्तियों के रख-रखाव, सुरक्षा, मरम्मत और अन्य ज़रूरी इंतज़ामों का काम भी लगातार किया जाता है.
बिलाल खान ने यह भी साफ़ किया कि उनकी सीधी प्रशासनिक ज़िम्मेदारी इस मामले में नहीं आती, क्योंकि ‘देग’ में मिलने वाले चढ़ावे से जुड़ा मामला “अभी स्थानीय अदालत में विचाराधीन है.”
हुंडी में मिलने वाले दान का हिसाब-किताब हर महीने “दरगाह कमेटी के कर्मचारियों और एसबीआई बैंक के कर्मचारियों द्वारा सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी में किया जाता है. पूरी प्रक्रिया की निगरानी सीसीटीवी कैमरों से की जाती है, जिससे पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय ईमानदारी सुनिश्चित होती है.”
एक पूर्व सदस्य ने कहा, “मुख्य रूप से, छोटी देग या कड़ाही के हिसाब-किताब में पारदर्शिता की कमी विवाद की वजह है. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अंजुमन-ए-खादिम द्वारा दीवान को दो करोड़ रुपये के भुगतान को मंज़ूरी दी थी.”
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