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लाल क़िले से युवाओं की बात, लेकिन परीक्षा और भर्ती विवादों का ज़िक्र क्यों नहीं

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Source :- BBC INDIA

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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भारत के स्वतंत्रता दिवस पर लाल क़िले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में देश के भविष्य, विकसित भारत और युवाओं की ताक़त की बात की.

प्रधानमंत्री मोदी का भाषण क़रीब 75 मिनट तक चला. इसमें उन्होंने 20 बार ‘युवा’ या ‘युवाओं’ शब्द का इस्तेमाल किया, 16 बार ‘नौजवानों’ और 6 बार ‘नौजवान’ शब्द का और चार बार उन्होंने ‘युवा शक्ति’ की बात की.

लेकिन हाल के महीनों में सड़कों पर उतरे उन युवाओं का ज़िक्र नहीं हुआ, जिन्होंने परीक्षा पत्र लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ देशभर में प्रदर्शन किए.

ये विरोध प्रदर्शन सिर्फ़ एक परीक्षा या कुछ नौकरियों का मुद्दा नहीं थे. इनमें शामिल युवाओं का कहना था कि जब सालों की मेहनत के बाद भी भर्ती और परीक्षा प्रक्रियाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे बड़ा नुक़सान उनके भरोसे को होता है. सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हज़ारों युवाओं ने अपनी नाराज़गी और चिंता खुलकर जताई थी.

इन आंदोलनों की एक और ख़ास बात थी कि इनके केंद्र में जेन-ज़ी थी, यानी भारत की सबसे युवा वयस्क पीढ़ी. अक़्सर राजनीति से दूर या उदासीन बताई जाने वाली यह पीढ़ी इस बार अपने भविष्य के सवालों को लेकर मुखर दिखाई दी.

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में जेन-ज़ी का भी कोई ज़िक्र नहीं आया.

युवाओं के लिए घोषणाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में युवाओं से जुड़ी कई बातें कहीं और साथ ही कई घोषणाएं भी की.

उन्होंने कहा, “जब मैं यह विकसित भारत की बात कर रहा हूं, देश को तेज गति से आगे बढ़ाने की बात कर रहा हूं, उसका सबसे बड़ा लाभार्थी कौन है, इन सारे प्रयासों का सबसे बड़ा साधक कौन है, अगर साधक है तो मेरे देश का युवा है, मेरे देश की युवा शक्ति है.”

अपनी बात जारी रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “विकसित भारत की यात्रा में युवाओं की बहुत बड़ी भूमिका है. इतना ही नहीं, विकसित भारत का सबसे बड़ा लाभार्थी भी मेरे देश का युवा है और इसलिए हमें विकसित भारत के लक्ष्य को युवाओं के साथ जोड़कर के आगे बढ़ाना है. युवाओं हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ हमें आगे बढ़ना है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कोचिंग क्लासों की बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा आज मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा दबाव बन गई है.

कई अभिभावकों को लगता है कि अगर वे अपने बच्चों को कोचिंग लेने नहीं भेजते, तो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी.

उन्होंने कहा कि ग़रीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ने वाले इस भारी ख़र्च को कम करने, बच्चों को अपने परिवार के क़रीब रखने और आर्थिक बोझ घटाने के उद्देश्य से सरकार ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ़्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराने का फ़ैसला किया है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, उत्कृष्ट शिक्षकों और उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए युवाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग का एक व्यापक राष्ट्रीय नेटवर्क विकसित किया जाएगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश में पंजीकृत स्टार्टअप्स की संख्या ढाई लाख से ज़्यादा हो चुकी है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का क्षेत्र तेज़ी से विस्तार कर रहा है.

उन्होंने कहा, “लाल किले से मैं देश के नौजवानों के लिए घोषणा करना चाहता हूं. हमने तय किया है कि आने वाले एक वर्ष में 1 करोड़ युवाओं को एआई स्किल के लिए ट्रेनिंग देने का हम काम करेंगे ताकि हमारा देश का नौजवान एआई की दुनिया में भी नेतृत्व करने का सामर्थ्य हो.”

साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा कि वो देश में चल रही जनगणना के काम में युवाओं से मदद चाहते हैं. उन्होंने कहा कि इस बार लोग मोबाइल के ज़रिये स्वयं अपनी जनगणना संबंधी जानकारी दर्ज कर सकेंगे.

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे परिवार की सही और त्रुटिरहित जानकारी भरने में मदद करें.

उनके मुताबिक़ सटीक आंकड़े देश की विकास योजनाओं को बेहतर बनाने में सहायक होंगे और जनगणना प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाएंगे. उन्होंने कहा, “आप देखिए, इतना बड़ा काम देश कर लेगा और देश का समय और शक्ति सही काम के लिए उपयोग आएगा और इसलिए मेरे देश के नौजवानों को जनगणना के इस काम में सक्रियता से जुड़ने के लिए मैं आग्रह करता हूं.”

जेन-ज़ी और हालिया विरोध प्रदर्शनों का कोई ज़िक्र नहीं

पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में हाल में जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन का जिक्र नहीं किया (फ़ाइल फोटो)

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प्रधानमंत्री ने युवाओं और नौजवानों को लेकर कई बातें कहीं, घोषणाएं भी की लेकिन हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों और उनका नेतृत्व कर रही जेन-ज़ी पीढ़ी को लेकर कुछ नहीं कहा.

इस बात के मायने समझने के लिए हमने बात की नीलांजन मुखोपाध्याय से जो एक लेखक और राजनीतिक विश्लेषक-पत्रकार हैं और जिन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रमुख हस्तियों पर किताबें लिखी हैं.

वो कहते हैं, “जहाँ तक युवाओं और छात्रों की बात है, तो इस पूरे मुद्दे पर मुझे प्रधानमंत्री के भाषण में स्ट्रैटेजिक ओमिशन्स (रणनीतिक तौर पर कुछ बातें छोड़ देना) दिखाई दिए. जो भी उन्होंने बोला उससे वो सिम्प्टम (लक्षणों) को एड्रेस कर रहे हैं. वो कह रहे हैं कि युवाओं को मुफ़्त कोचिंग देंगे. उन्होंने यह भी कहा कि जनगणना में वो युवाओं की मदद लेंगे. उन्होंने कहा कि एक करोड़ युवा के लिए एआई ट्रेनिंग करेंगे. ये एक बड़ी समस्या के लक्षण-आधारित इलाज हैं.”

अपनी बात जारी रखते हुए मुखोपाध्याय कहते हैं, “बड़ी समस्या यह है कि प्रशासनिक विफलता है, एक ‘पेपर माफिया’ है, जिसके बारे में काफ़ी लोग जानते हैं. पीएम इन सब मुद्दों की बात नहीं कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी का भाषण सरकार के भीतर फायर-फाइटिंग (आग बुझाने) वाली सोच को दर्शाता है. यह हाल के उन विरोध-प्रदर्शनों से उभरे मुद्दों के व्यापक दायरे को नहीं दर्शाता है जिनमें हज़ारों की तादाद में बच्चे अपनी शिकायतें लेकर आए.”

नीलांजन मुखोपाध्याय के मुताबिक़ ये हालिया आंदोलन सिर्फ़ नीट परीक्षा या पेपर लीक के बारे में नहीं था.

वो कहते हैं, “यह ज़िंदगी के बारे में था-ऐसे देश में भविष्य कैसा होगा जहाँ नौकरी की कोई गारंटी नहीं है, और उस शिक्षा या डिग्री की भी कोई निश्चितता नहीं है जिसके लिए परिवारों को भारी-भरकम कीमत चुकानी पड़ती है.”

शरद गुप्ता एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. हमने उनसे भी इसी बात को समझने की कोशिश की.

वो कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जी राजनीतिक भाषणों की ख़ासियत यह रही है कि उनमें कई बातें सीधे कहने के बजाय इशारों और छिपे हुए संदेशों के रूप में कही जाती हैं. वो कहते हैं, “उनके भाषण खुले तौर पर या सीधे मुंह पर कहे गए बयान नहीं होते. उनमें बहुत ही दबे-छिपे और अप्रत्यक्ष संकेत होते हैं. तो आज भी उन्होंने जेन-ज़ी या स्टूडेंट प्रोटेस्ट के डायरेक्ट रेफेरेंस की जगह युवा शब्द का इस्तेमाल किया जिससे की सब समझ भी पा रहे हैं कि ये किसके लिए है और बहुत इनडायरेक्ट रेफेरेंस (अप्रत्यक्ष संदर्भ) है.”

गुप्ता के मुताबिक़ पीएम मोदी ने दो या तीन बार इंस्टाग्राम पर जाकर कोशिश की तो उससे लगा कि वो जेन-ज़ी को सम्बोधित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उसको लेकर आलोचना भी हुई. वो कहते हैं, “तो मुझे लगता है कि बहुत ही सटल रेफरेंस (हल्का सा ज़िक्र) है तो जिन तक मेसेज पहुँचना है वो पहुँच जाए. और जो भी प्लान बी, प्लान सी और प्लान डी हैं उनको उन्होंने एक्टिवेट किया है जैसे आरएसएस युवाओं को एड्रेस कर रहा है, जेन-ज़ी को एड्रेस कर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी को लाल क़िले के भाषण से ज़रूरी नहीं है कि वो युवाओं को उस तरीके से जेन-ज़ी कहकर सम्बोधित करें.”

मुखोपाध्याय कहते हैं, “आज की तारीख़ में तो मोहन भागवत भी जेन-ज़ी और जेन-अल्फ़ा की बात करते हैं. आरएसएस की शब्दावली भी प्रधानमंत्री से आगे निकल गई है. पिछले 3 महीने में इतना कुछ हुआ है हिंदुस्तान में-मई, जून, जुलाई में. पोलिटिकल नैरेटिव में हमारी शब्दावली इवॉल्व हुई. लेकिन मोदी जी की शब्दावली इवॉल्व नहीं हुई है.”

‘दिमाग़ी नक्सल’ कौन?

बीबीसी

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ चली लड़ाई का ज़िक्र करते हुए दो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया जिन्होंने ध्यान खींचा- ‘दिमाग़ी नक्सल’.

उन्होंने कहा, “जंगलों में हमें हथियारी नक्सलों का ख़ात्मा बुलाने में उस संकट से देश को मुक्त कराने में सफलता मिली है. लेकिन हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमाग़ी नक्सल, यह दिमाग़ी नक्सल मौके की तलाश में है. हिंसा अराजकता के वो रास्ते खोज रहे हैं. समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव कर रहे हैं. इन दिमाग़ी नक्सलियों को पहचानना होगा. इन दिमाग़ी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा.”

तो आख़िर कौन हैं वो दिमाग़ी नक्सल जिनकी बात प्रधानमंत्री कर रहे थे?

शरद गुप्ता कहते हैं, “पहले भी प्रधानमंत्री मोदी ने एक शब्द का इस्तेमाल किया था: अर्बन नक्सल. जितने वामपंथी हैं जितने लोग आंदोलनकरी हैं… उन्होंने उनके लिए आंदोलनजीवी शब्द का इस्तेमाल किया था. आज जो शब्द इस्तेमाल किया है वो भी उसी तर्ज़ पर है कि जो भी मोदी जी का विरोध करता है, जो मोदी जी के ख़िलाफ़ खड़ा होता है, जो भी आंदोलन करता है तो उसके लिए अर्बन नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया जायेगा. उन्होंने जो दिमाग़ी नक्सल कहा है वो भी ऐसे ही लोगों के लिए है जो उनका विरोध कर रहे हैं.”

अपनी बात जारी रखते हुए वो कहते हैं, “जेन-ज़ी आंदोलन में सरकार के लिए मुश्किल ये बन गई थी कि वो उसका वर्गीकरण नहीं कर पा रहे थे. जैसे कई बार कह दिया जाता है कि बांग्लादेशी हैं, ख़ालिस्तानी हैं, पाकिस्तानी हैं, चाइनीज़ हैं. तो चूंकि हाल में हुए कॉकरोच जनता पार्टी वाले जेन-ज़ी आंदोलन की संरचना इतनी विविध थी कि वो उसका वर्गीकरण नहीं कर पा रहे थे कि इनको कहाँ किस खांचे में फिट करें और इनको हम देश विरोधी या राष्ट्र विरोधी क़रार दे दें. तो ये एक बड़ी समस्या आ गई थी.”

शरद गुप्ता कहते हैं कि चूंकि सीजेपी अब सभी सरकारी स्कूलों का ऑडिट करने की योजना बना रही है और नए विरोध प्रदर्शनों की बात कर रही है तो प्रधानमंत्री मोदी भी योजना बना रहे हैं कि किसी नए आंदोलन के शुरू होने से पहले ही उन्हें दिमाग़ी नक्सल घोषित कर दिया जाए.

नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, “फिर तो वो लोग जो समानतावादी राजनीति की बात करते हैं वो भी दिमाग़ी नक्सल हैं. पिछले 12 वर्षों में हमने भारत में देखा है कि संपत्ति बहुत कम लोगों के हाथों में सिमट गई है. एक फ़ीसदी लोगों के पास सब जा रहा है और 99 फ़ीसदी लोगों से सब निकलता जा रहा है. मेरे ख़्याल से जो भी भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं है, उनके लिए वो सब दिमाग़ी नक्सल हो गए हैं. मुझे लगता है कुछ ही दिनों में हो सकता है कि लोग हज़ारों की तादाद में दिमाग़ी नक्सल छपवा कर टीशर्ट पहन कर घूमने लगे.”

युवाओं के लिए क्या है संदेश

हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन को भारत का जेन-ज़ी आंदोलन भी कहा गया

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प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ़्त ऑनलाइन कोचिंग का फ़ैसला और आने वाले एक साल में एक करोड़ युवाओं को एआई स्किल के लिए ट्रेनिंग की बात. क्या यही हैं वो बातें जो युवाओं के लिए एक अहम संदेश हैं.

शरद गुप्ता कहते हैं कि बेरोज़गारी कोई एक दिन में हल होने वाली समस्या नहीं है और उसका ज़िक्र लाल क़िले से तो नहीं किया जा सकता इसीलिए मुफ़्त कोचिंग जैसी बातें की जाती हैं.

वो कहते हैं, “हर राज्य सरकार यूपीएससी की तैयारी के लिए मुफ़्त कोचिंग कराती है. कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी एससी-एसटी के लिए लगभग हर स्टेट गवर्नमेंट मुफ़्त करती है. कुछ-कुछ स्टेट गवर्नमेंट अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के लिए भी मुफ़्त कोचिंग देती है. तो मोदी अधिकतर चीजें वही बोलते हैं जो पहले से हो चुकी होती हैं या लागू होने के क़रीब होती हैं. लेकिन उसकी पैकेजिंग ऐसी करते हैं लगता है की अरे ये तो बिल्कुल नया फ़ैसला है.”

इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में ”प्रधानमंत्री का भाषण युवाओं के विरोध का सीधा जवाब है’ शीर्षक से छपे एक लेख में युवाओं के लिए मुफ़्त कोचिंग की घोषणा के बारे में कहा गया कि “सरकार अच्छी तरह जानती है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर की गई सख़्ती से नाराज़ होने वाले सिर्फ़ वे लोग नहीं हैं जो पैलेट गन की गोलियों, आंसू गैस के गोलों या पुलिस की लाठियों का शिकार हुए, बल्कि उनके स्नेही माता-पिता भी हैं.”

इसी लेख में आगे कहा गया है कि “उन्हें शांत करने की कोशिश मुफ़्त ऑनलाइन कोचिंग का वादा करके की जा रही है, ताकि वे उन विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें, जिन्हें भारतीय युवा संगठित क्षेत्र में नौकरी पाने की उम्मीद में देते हैं.”’

”उन्होंने इसके दो फ़ायदे बताए. पहला, कोचिंग की फ़ीस का ख़र्च बचेगा. दूसरा, परिवार अपने युवाओं को घर पर ही रख सकेंगे. साथ ही, शायद वे उन उग्र या विद्रोही विचारों के असर से भी दूर रहेंगे, जो अक़्सर तब फ़ैलते हैं जब युवा घर से दूर रहकर दूसरे युवाओं के साथ रहते हैं और अपनी उम्मीदें व निराशाएं आपस में साझा करते हैं.”

नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं पीएम के आज के भाषण से युवाओं को जो बात समझ आएगी वो ये है कि प्रधानमंत्री मोदी के पास उनकी समस्याओं को समझने का कोई आइडिया नहीं है.

वो कहते हैं, “कोई कोशिश नहीं की गई है उनकी समस्याओं को समझने के लिए और उनकी समस्याओं को हल करने का कोई बड़ा आइडिया उनके दिमाग़ में नहीं है. वे लक्षणों का ही इलाज करते रहेंगे और सिस्टम में सुधार नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वो समझ नहीं रहे या समझना नहीं चाहते हैं.”

उनके मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी के पूरे भाषण में रीसाइकल्ड थीम और रीब्रैंडेड रेटोरिक (दोहराए गए विषय और नए नाम के साथ पेश की गई बातें) थीं.

वो कहते हैं. “पुरानी तथाकथित उपलब्धियों को दूसरे शब्दों में दोहराना, नाटकीय तरीक़े से पेश करना उसके अलावा मुझे इस भाषण में कुछ नहीं दिखा. आज के भाषण की प्रधानमंत्री के पिछले कुछ स्वतंत्रता दिवस भाषणों से तुलना करें तो आज का भाषण सबसे ज़्यादा प्रेरणाहीन था. मुझे इस भाषण में कोई भी काम की बात नहीं दिखी.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS