Home National news hindi आरक्षण हटाओ आंदोलन: क्या रिज़र्वेशन व्यवस्था पर फिर शुरू हो गई है...

आरक्षण हटाओ आंदोलन: क्या रिज़र्वेशन व्यवस्था पर फिर शुरू हो गई है बड़ी बहस?

3
0

Source :- BBC INDIA

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

इमेज स्रोत, ANI

प्रकाशित

पढ़ने का समय: 10 मिनट

आरक्षण के ख़िलाफ़ मुहिम अब सोशल मीडिया की बहस से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुकी है.

सोशल मीडिया से शुरू हुई मुहिम ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से जुड़े लोगों ने बीते शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया.

इस प्रदर्शन में इस मुहिम से जुड़े लोगों के अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों से सरकारी नौकरियों और शिक्षा में जाति के आधार पर आरक्षण का विरोध करने वाले लोग जुटे थे. इनमें कई हिंदुत्ववादी समूहों से जुड़े कार्यकर्ता भी शामिल थे.

दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और शाम होते-होते प्रदर्शनकारियों को ज़बरदस्ती हटा दिया गया.

प्रदर्शनकारी मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, जाति के बजाय आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने और मेरिट आधारित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं.

हरियाणा के पलवल से आंदोलन में शामिल होने आए कुलदीप कौशिक ने बीबीसी हिन्दी से कहा, “मैं उस आरक्षण का विरोध करता हूं जो आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को जाति की वजह से मिल रहा है. जो लोग आईएएस-आईपीएस बन चुके हैं, सांसद-विधायक बन चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण मिलने का मैं विरोध करता हूं.”

कौशिक कहते हैं, “आरक्षित वर्ग से आने वाले लोग प्रधानमंत्री बन रहे हैं, राष्ट्रपति बन रहे हैं, वरिष्ठ अधिकारी बन रहे हैं, इससे ज़्यादा और क्या बराबरी होगी? अब तक आरक्षण ले रहे इन लोगों को कहना चाहिए कि अब आरक्षण ग़रीबों के लिए हो.”

यूं तो इस अभियान का नाम आरक्षण हटाओ आंदोलन है लेकिन प्रदर्शन में शामिल अधिकतर लोग सीधे आरक्षण को ख़त्म करने के बजाए आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे थे.

यहां आने वाले अधिकतर प्रदर्शनकारियों का एक ही तर्क था, ‘आरक्षण आर्थिक आधार पर हो.’

सनातन सेवा परिषद नाम की संस्था के अध्यक्ष तेजस शांडिल्य ने इसी तरह का तर्क देते हुए कहा, “आरक्षण में सुधार हो, आरक्षण सिर्फ़ ग़रीबों के लिए हो.”

भारत में आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है.

इस आंदोलन ने एक पुरानी बहस को नए सिरे से सामने ला दिया है कि क्या भारत में आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए?

या फिर जब तक जातिगत असमानता और भेदभाव पूरी तरह खत्म न हो जाए तब तक आरक्षण ज़रूरी है.

यही इस आंदोलन की मूल वैचारिक लड़ाई है.

प्रदर्शनकारी क्या चाहते हैं?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

इमेज स्रोत, ANI

आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों के बीच सभी मांगों को लेकर पूरी तरह एकरूपता नहीं है. लेकिन मौजूदा प्रदर्शनों में जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा, आर्थिक आधार को अधिक महत्व देने, मेरिट को चयन का प्रमुख आधार बनाने और आरक्षण के लाभों के लगातार एक ही वर्ग तक केंद्रित होने पर सवाल उठाए गए हैं.

आंदोलन से जुड़े कुछ लोग सरकार से आरक्षण पर विस्तृत आंकड़ों के साथ एक श्वेतपत्र जारी करने की मांग भी कर रहे हैं.

हालांकि, इस प्रोटेस्ट के अगले ही दिन आयोजकों में से एक हर्ष दुबे ने यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ लखनऊ में प्रेस वार्ता की. इस प्रेस वार्ता में ब्रजेश पाठक ने कहा कि प्रदर्शनकारियों की मांग को व्यवस्थित तरीक़े से सरकार के समक्ष रखा जाएगा.

उन्होंने वादा किया था कि प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल की केंद्र सरकार के मंत्री से मुलाक़ात दो दिन के भीतर करवाई जाएगी, हालांकि ये समयसीमा बीतने के बावजूद ऐसी किसी मुलाक़ात के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं है.

इस प्रेस वार्ता ने आंदोलन के भीतर भी मतभेद उजागर कर दिए. आंदोलन का नेतृत्व करने का दावा कर रहे लोगों में शामिल अनुराधा तिवारी ने सार्वजनिक रूप से हर्ष दुबे और सरकार के बीच हुई बातचीत तथा दुबे की ओर से रखी गई मांगों से खुद को अलग किया है.

वहीं, सोशल मीडिया पर भी इस आंदोलन से जुड़े लोगों के अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं. अनुराधा तिवारी ने कहा है कि वह जल्द ही इस मुहिम को दिशा देंगी.

वहीं आयोजकों में से एक हर्ष दुबे ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान बीबीसी से कहा था, “जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जाएंगी, हम पीछे नहीं हटेंगे और आंदोलन जारी रहेगा.”

हालांकि, इसके अगले ही दिन वो लखनऊ में यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के साथ नज़र आए थे.

आंदोलन को समर्थन कहां से मिल रहा है?

आंबेडकर

इमेज स्रोत, Getty Images

दिल्ली में प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का एक बयान बार-बार पोस्ट किया जा रहा है जिसमें वो कह रहे हैं, “कान खोलकर सुन लो, भारतीय जनता पार्टी कभी रिज़र्वेशन को हटाने वाली नहीं है, इतना ही नहीं, आप हटाना चाहोगे तो आपको भारतीय जनता पार्टी हटाने भी नहीं देगी, ये कमिटमेंट भारतीय जनता पार्टी का है.”

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के किसी बड़े नेता ने इस आंदोलन के समर्थन में अभी तक कोई बयान नहीं दिया है.

यही नहीं, इस आंदोलन को अभी किसी बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल का औपचारिक समर्थन हासिल नहीं है.

फिलहाल, इस आंदोलन के समर्थक मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, युवा पेशेवर और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग हैं, जिनमें अधिकतर तथाकथित अगड़ी जातियों से आते हैं.

हालांकि, सोशल मीडिया पर चर्चा में रहने वाले कुछ लोगों ने ज़रूर आरक्षण व्यवस्था की आलोचना की है. आनंद रंगनाथन और विवादित पत्रकार अजीत भारती जैसे नाम सार्वजनिक रूप से मेरिट और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं.

आरक्षण हटाओ आंदोलन के इंस्टाग्राम पेज को अभी तक 56 लाख से अधिक लोगों ने फॉलो किया है, हालांकि ज़मीन पर इसका कोई ख़ास समर्थन दिखाई नहीं देता. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल अधिकतर युवा भी जातिगत और हिंदुत्ववादी संगठनों से ही जुड़े थे.

आरक्षण क्यों आया था?

भारतीय संविधान (सांकेतिक तस्वीर)

इमेज स्रोत, Getty Images

इस बहस को समझने के लिए भारत के संविधान और स्वतंत्रता के बाद की सामाजिक स्थिति को समझना ज़रूरी है.

आरक्षण केवल गरीबी दूर करने की योजना के रूप में नहीं लाया गया था.

भारत में जाति के आधार पर लंबे समय तक कुछ समुदायों को शिक्षा, सत्ता, सार्वजनिक संस्थानों और रोज़गार से दूर रखा गया. संविधान निर्माताओं के सामने सवाल था कि क्या केवल क़ानून के सामने समानता दे देना पर्याप्त होगा.

इस सवाल के मूल में भारतीय समाज की असमान स्थितियां थीं जिनमें आबादी का एक बड़ा हिस्सा जाति की वजह से शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहा था.

आरक्षण का उद्देश्य ऐसे समुदायों को शिक्षा, सरकारी रोज़गार और राजनीतिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व देना था, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से इन क्षेत्रों से बाहर रखा गया था.

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर विवेक कुमार इसी अंतर को आरक्षण की बुनियादी अवधारणा बताते हैं.

प्रोफ़ेसर विवेक कुमार कहते हैं, “आरक्षण का मतलब है प्रतिनिधित्व.”

वह कहते हैं कि जिन समाजों को लंबे समय तक सत्ता, शिक्षा और संसाधनों से वंचित रखा गया, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए शिक्षा और नौकरियों में प्रतिनिधित्व देना आरक्षण का उद्देश्य था.

यहीं से आरक्षण समर्थकों और विरोधियों के बीच मूल मतभेद पैदा होता है.

ग़रीबी और जातिगत भेदभाव

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

इमेज स्रोत, ANI

आरक्षण हटाओ आंदोलन का बड़ा तर्क है कि आज किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को उसकी जाति से ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए.

लेकिन आरक्षण के समर्थक कहते हैं कि गरीबी और जातिगत भेदभाव अलग-अलग समस्याएं हैं.

प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, “आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है.”

उनका तर्क है कि अगर किसी व्यक्ति की समस्या ग़रीबी है तो उसके लिए छात्रवृत्ति, फीस में छूट या आर्थिक सहायता जैसे उपाय किए जा सकते हैं. लेकिन आरक्षण का उद्देश्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और वंचितों को बराबरी पर आने का मौक़ा देना है.

प्रोफेसर लक्ष्मण यादव भी आर्थिक आधार को आरक्षण का विकल्प बनाने के तर्क पर सवाल उठाते हैं.

उनका कहना है, “शोषण, अन्याय और भेदभाव जाति के आधार पर है तो उसको ख़त्म करने का आधार आर्थिक कैसे हो सकता है?”

आरक्षण समर्थक विश्लेषकों के तर्क का आधार यह है कि अगर समस्या का मूल कारण जाति है तो उसके समाधान का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं हो सकता.

आरक्षण की समीक्षा का सवाल

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

इमेज स्रोत, ANI

आरक्षण का विरोध कर रहे लोगों की मुख्य मांग है आरक्षण की समीक्षा और इस व्यवस्था में सुधार.

प्रोफेसर लक्ष्मण यादव तर्क देते हैं कि किसी भी नीति में बदलाव आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए.

वो कहते हैं, “आरक्षण का विरोध कर रहे लोग रिफॉर्म की बात कर रहे हैं, लेकिन बिना ठोस डेटा के रिफॉर्म कैसे हो सकता है? “

वे कहते हैं कि जातिगत जनगणना से यह पता चलना चाहिए कि किस समुदाय की आबादी कितनी है, शिक्षा और रोजगार में उसकी स्थिति क्या है और संसाधनों तक उसकी पहुंच कितनी है.

उनका सवाल है कि बिना इन आंकड़ों के यह कैसे तय किया जा सकता है कि कौन सा समुदाय आरक्षण से बाहर निकलने की स्थिति में पहुंच चुका है.

प्रोफ़ेसर विवेक कुमार भी मानते हैं कि जब तक जातिगत भेदभाव ख़त्म नहीं हो जाता तब तक आरक्षण की समीक्षा किस आधार पर होगी?

‘मेरिट’ पर बहस

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

SOURCE : BBC NEWS