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जहाँगीर: अपनी शराबखोरी कबूल करने वाला मुग़ल बादशाह, जिसकी सत्ता की बागडोर नूरजहाँ ने संभाली

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Source :- BBC INDIA

सन 1830 में एक कलाकार ने जहाँगीर और नूरजहां की पेंटिंग बनाई

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“मैंने सल्तनत (मलिका) नूरजहाँ को सौंप दी. मुझे एक सेर शराब और आधा सेर मांस के अलावा और कुछ नहीं चाहिए.”

ये शब्द चौथे मुग़ल सम्राट नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के हैं. इन्हें मिर्ज़ा मुहम्मद हादी ने उनकी किताब ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ की प्रस्तावना में लिखा है.

लेकिन ख़ुद जहाँगीर ने भी रोज़मर्रा की घटनाओं पर आधारित अपनी इस किताब में, जिसे वह ‘जहाँगीरनामा’ कहते थे, शराब और दूसरी नशीली चीज़ों के इस्तेमाल की घटनाओं को छिपाया नहीं.

उन्होंने शासन, न्याय, कला और प्रकृति पर अपने अनुभवों के साथ इनका भी ज़िक्र किया है.

अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ जहाँगीर’ में बेनी प्रसाद ने लिखा है कि 31 अगस्त 1569 को “दुआओं, मन्नतों और ज़ियारतों के बाद पैदा हुआ बच्चा, अपने दौर के सबसे अमीर और शानो-शौकत वाले बादशाह का सबसे बड़ा बेटा था. वह फ़तेहपुर सीकरी के ख़ूबसूरत शाही शहर का सबसे चहेता शहज़ादा था.”

जहाँगीर की ज़िंदगी का रास्ता अपने पूर्ववर्ती मुग़ल बादशाहों की तुलना में जैसे फूलों से सजा हुआ था.

“लेकिन इसी आराम और सुविधा की वजह से जहाँगीर पूरी ज़िंदगी इरादे और फ़ैसले लेने की कमज़ोरी से जूझते रहे. वह ख़ुद से ज़्यादा काबिल या चालाक लोगों के सामने आसानी से ख़ुद को बेबस छोड़ देते थे. उनकी ये कमज़ोरियाँ एक ऐसी आदत की वजह से और बढ़ गईं, जिसे उन्होंने जवानी की दहलीज़ पर ही अपना लिया था. यह आदत थी शराब पीने की.”

बेनी प्रसाद के मुताबिक, शराब पीना मुग़ल परिवार की पुरानी कमज़ोरी थी.

बाबर ने अपनी आत्मकथा में उन महफ़िलों की बहुत जीवंत तस्वीर पेश की है, जहाँ शराब की महफ़िलें ग़म और चिंताओं को भुला देती थीं. हुमायूँ ने शराब और अफ़ीम के इस्तेमाल से अपनी सेहत को नुक़सान पहुँचाया. उनके बेटे मुहम्मद हकीम ने भी शराब के आगे हार मान ली और सिर्फ़ 31 साल की उम्र में दुनिया से चल बसे.

अकबर कुल मिलाकर इस परंपरा से एक अपवाद थे. हालांकि, जवानी के शुरुआती सालों में उनका भी शराब पीना कोई असामान्य बात नहीं थी और कभी-कभी वह हद से भी आगे बढ़ जाते थे. उनके दो छोटे बेटे, मुराद और दानियाल, भी आख़िरकार शराब पीने की वजह से एक दुखद मौत का शिकार हुए.

जहाँगीर ने अपनी 17वीं सालगिरह तक शराब का स्वाद तक नहीं चखा था.

‘अपनी मौजूदगी में शिकार किए जानवरों को कराते थे साफ़’

नूरजहां और जहांगीर

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सन् 1605 से 1627 तक भारत पर शासन करने वाले जहाँगीर अपने आधे से ज़्यादा शासनकाल में पूरे साम्राज्य में घूमते रहे.

अनशिका जैन अपने लेख ‘एम्परर जहाँगीर: द नैचरलिस्ट’ में लिखती हैं कि जहाँगीर कम उम्र से ही अपने आसपास की दुनिया को बहुत बारीकी से देखते थे. वह भारत और विदेशों से तोहफ़े में मिले जानवरों और पक्षियों को देखते थे. साथ ही, उनकी तस्वीरें बनवाने का भी इंतज़ाम करते थे.

अनशिका जैन के मुताबिक, जहाँगीर ने मारखोर और बर्बरी नस्ल की बकरियों का आपस में प्रजनन भी करवाया. वह उनके बच्चों की हरकतों और गतिविधियों पर बारीकी से नज़र रखते थे.

जानवरों में जहाँगीर की दिलचस्पी उनकी ज़िंदगी के आख़िरी सालों में खाने को लेकर असाधारण सावधानी तक पहुँच गई.

“वह आदेश देते थे कि शिकार किए गए जानवरों को उनकी मौजूदगी में साफ़ किया जाए. वह ख़ुद उनके पेट की जांच करते थे, ताकि पता चल सके कि उन्होंने क्या खाया था. अगर किसी जानवर के पेट में कोई घिनौनी चीज़ मिलती, तो वह उस प्रजाति को अपनी खाने की सूची से हटा देते.”

अनशिका जैन के मुताबिक, जहाँगीर की शख़्सियत विरोधाभासों से भरी थी. एक तरफ़ वह ऐशो-आराम में डूबे हुए बादशाह थे, तो दूसरी तरफ़ दुनिया को बहुत गहराई से देखने वाले दार्शनिक थे.

इतिहासकार हेनरी बेवरिज ने यहां तक लिखा कि अगर जहाँगीर महान मुग़ल साम्राज्य के बजाय प्राकृतिक इतिहास के किसी संग्रहालय के प्रमुख होते, तो शायद वह ज़्यादा “बेहतर और ख़ुशमिज़ाज” इंसान होते.

लीसा बालाबान लिलर अपने शोधपरक लेख ‘द एम्परर जहाँगीर एंड द परस्यूट ऑफ़ प्लेज़र’ में लिखती हैं कि वह बहुत कम ख़ुद सेनाओं की अगुवाई करते थे. अक्सर वह अपने बेटों की अगुवाई वाली सेनाओं के पीछे रहते थे या बिना किसी साफ़ मक़सद के अपनी निजी ऐश और मनोरंजन की तलाश में घूमते रहते थे.

“उनकी आवारगी, शिकार का जुनून, नशीली चीज़ों का खुले तौर पर इस्तेमाल और लगभग लगातार घूमते रहने के बावजूद शाही कर्मचारियों और अमीरों ने उन्हें किसी न किसी हद तक स्वीकार किए रखा.”

बादशाह जहाँगीर अपनी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ में सिर्फ़ अपनी जीत, दरबार और साम्राज्य का हाल नहीं बताते, बल्कि अपनी कमज़ोरियों से भी पर्दा उठाते हैं.

तुज़ुक से पता चलता है कि शराब के साथ उनका रिश्ता एक मामूली घटना से शुरू हुआ था.

कैसे पड़ी शराब पीने की लत

जहांगीर

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एक युवा शहज़ादे जहाँगीर अपने पिता अकबर की सेना के साथ सिंधु नदी के किनारे अटक के पास थे. एक दिन शिकार से लौटते समय उन्हें थकान महसूस हुई. तब तोपची उस्ताद शाह क़ुली ने उन्हें एक प्याला शराब पीने की सलाह दी.

जहाँगीर ने अपने आबदार महमूद को हुक्म दिया कि हकीम अली के घर से कोई नशीला पेय लाया जाए. इसके जवाब में एक छोटी बोतल में मीठी पीली शराब के करीब डेढ़ प्याले लाए गए.

जहाँगीर ने इसे पिया. उन्हें इसका स्वाद पसंद आया. फिर, उनके अपने शब्दों में, उन्होंने ‘दिन-ब-दिन इसकी मात्रा बढ़ाना शुरू कर दिया.’

एक समय वह बताते हैं कि वह रोज़ शराब पीते थे. लेकिन गुरुवार और शुक्रवार की रात इससे परहेज़ करते थे. गुरुवार उनके तख़्त पर बैठने का दिन था और शुक्रवार पवित्र दिन. इन दिनों शराब से परहेज़ उनकी धार्मिक और शाही रस्मों से जुड़ा था.

जब अंगूर की शराब का नशा उनके लिए काफ़ी नहीं रहा, तो उन्होंने अरक़ यानी डिस्टिल्ड शराब का रुख़ किया. नौ साल के भीतर मामला यहां तक पहुंच गया कि वह रोज़ाना 20 प्याले अरक़ पीने लगे. 14 दिन में और छह रात में. हर प्याले में करीब 82 ग्राम यानी लगभग 85 मिलीलीटर शराब होती थी.

नशे की यह मात्रा सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं थी. जहाँगीर की अपनी लिखी बातों में इसके शरीर पर पड़ने वाले असर की भी बेहद डरावनी तस्वीर मिलती है.

वह लिखते हैं कि उनके हाथ इतने कांपने लगे थे कि वह अपने प्याले से ख़ुद शराब नहीं पी सकते थे. दूसरों को उन्हें शराब पिलानी पड़ती थी. तब हकीम हमाम ने बादशाह को साफ़ शब्दों में चेतावनी दी कि अगर वह इसी तरह शराब पीते रहे, तो कुछ ही महीनों में उनका इलाज संभव नहीं रहेगा.

जहाँगीर लिखते हैं कि इस सलाह का उन पर असर हुआ, क्योंकि ‘ज़िंदगी अज़ीज़ थी.’ उन्होंने शराब कम करना शुरू कर दिया. लेकिन इसके साथ ही वह एक नशे से दूसरे नशे की तरफ़ चले गए.

‘रोज़ाना 20 प्याले शराब तक पीने लगे’

जहाँगीर का यशब से बना शराब का प्याला.

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जहाँगीर के मुताबिक, जिस अनुपात में उन्होंने शराब कम की, उसी अनुपात में ‘फ़िलोनिया’ की मात्रा बढ़ा दी.

और फिर अफ़ीम इस कहानी में शामिल हो जाती है.

जहाँगीर लिखते हैं कि 46 साल और चार महीने की उम्र में वह अपनी रोज़ की मात्रा भी दर्ज करते हैं. दिन के पांच घड़ी बीतने के बाद आठ सुर्ख़ (एक ग्राम) और रात की एक घड़ी के बाद छह सुर्ख़ (पौने एक ग्राम). यानी वह अफ़ीम के अपने इस्तेमाल का भी बाक़ायदा रोज़ाना हिसाब रखते थे.

वह लिखते हैं कि 18 साल की उम्र से शराब पीते आ रहे हैं. कभी यह मात्रा 20 प्यालों तक पहुंच गई थी. फिर उन्होंने इसे कम किया और 30 साल की उम्र के बाद सिर्फ़ रात में पीने लगे. आख़िर में वह वही वजह बताते हैं: अब शराब सिर्फ़ हाज़मे के लिए है.

सल्तनत के 13वें साल में गुजरात की आबोहवा उन्हें रास नहीं आई और उनकी तबीयत ख़राब हो गई. इस पर हकीमों ने उन्हें शराब और अफ़ीम, दोनों कम करने की सलाह दी. जहाँगीर के मुताबिक, उन्होंने उसी दिन दोनों की मात्रा घटा दी और पहले ही दिन अपनी सेहत में ‘ख़ास सुधार’ महसूस किया.

मगर आदत हमेशा अक़्ल के मुताबिक नहीं चलती.

इसी बीमारी के दौरान तेज़ सिरदर्द और बुखार के बावजूद वह जल्द ही अपने रोज़ के प्यालों की तरफ़ लौट आए.

बाद के सालों में स्थिति और पेचीदा हो गई.

जहाँगीर लिखते हैं कि एक गंभीर बीमारी के दौरान शराब पीने से उन्हें कुछ समय के लिए राहत मिलती थी. इसलिए उन्होंने दिन में भी शराब पीना शुरू कर दिया, जबकि पहले यह उनका रोज़ का तरीका नहीं था.

फिर वह मानते हैं कि धीरे-धीरे मात्रा हद से बढ़ गई. गर्म मौसम ने इसके नुक़सान को और बढ़ा दिया. इसके साथ कमज़ोरी और सांस लेने में परेशानी भी होने लगी.

यहीं नूरजहाँ का किरदार अहम हो जाता है.

जहाँगीर लिखते हैं कि नूरजहाँ बेगम ने धीरे-धीरे उनके शराब के प्याले कम किए. उन्हें नुकसान पहुंचाने वाली चीज़ों और खाने से रोका और उनके इलाज का इंतज़ाम किया.

जहाँगीर उनकी महारत और तजुर्बे को हकीमों से ज़्यादा असरदार बताते हैं, क्योंकि उनके मुताबिक इसमें प्यार और हमदर्दी भी शामिल थी. ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ का यह बयान नूरजहाँ को सिर्फ़ एक असरदार मलिका के तौर पर नहीं, बल्कि अपने बीमार शौहर की देखभाल करने और उसकी शराबखोरी को सीमित करने वाली शख़्सियत के तौर पर भी दिखाता है.

बेगम नूरजहाँ पर पूरी तरह निर्भर हो गए थे बादशाह

बेगम नूरजहाँ

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लेकिन मुनी लाल अपनी किताब ‘जहाँगीर’ में लिखते हैं कि जहाँगीर की बेबसी लगभग तरस खाने की हद तक पहुंच चुकी थी. नूरजहाँ की दिलकशी ने उनसे वह थोड़ी-बहुत समझ और इच्छाशक्ति भी छीन ली थी, जो उनमें बाकी रह गई थी.

लंबी बीमारी, शराब की लत और शारीरिक इच्छाओं की तीव्रता- ये वे मुख्य वजहें थीं, जिनके कारण जहाँगीर नूरजहाँ पर पूरी तरह निर्भर हो गए थे. कभी-कभी वह बहुत ज़्यादा भावनात्मक दबाव की वजह से बेचैन भी हो जाते थे.

हालांकि, लीसा बलबन लर ‘एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका’ में लिखती हैं कि कुछ इतिहासकारों को भले ऐसा लगता हो कि बादशाह जहाँगीर ने सल्तनत की सत्ता अपनी पत्नी को सौंप दी थी, लेकिन अपने शासन के आख़िरी पांच साल तक वह राज्य के राजनीतिक मामलों में गहरी दिलचस्पी लेते रहे और सक्रिय रूप से उनमें हिस्सा लेते थे.

दरअसल, नूरजहाँ एक ऐसे बादशाह की सत्ता में साझेदार थीं, जिसने शासन से मुंह मोड़ने के बजाय अपनी सरकारी ज़िम्मेदारियों का एक हिस्सा अपनी भरोसेमंद और काबिल साथी को सौंप रखा था.

‘तुज़ुक’ के हवाले से लीसा लिखती हैं कि जहाँगीर को खेल और शिकार का बहुत शौक था और नूरजहाँ भी अक्सर इन अभियानों में उनके साथ जाती थीं.

‘ऐसी ही एक मुहिम के दौरान उन्होंने सिर्फ़ छह गोलियों से चार शेरों का शिकार किया. अपनी पत्नी की इस असाधारण काबिलियत पर गर्व करते हुए जहाँगीर ने उनके सिर पर 1,000 अशर्फ़ियां न्योछावर कीं. उन्हें मोतियों का एक जोड़ा और एक हीरा भी दिया, जिसकी कीमत एक लाख रुपये थी.’

‘लेकिन शासन के इन अपेक्षाकृत शांत और ख़ुशहाल बीच के सालों में भी, जब किसी शहज़ादे की बग़ावत ने बादशाह के सुकून में खलल नहीं डाला था, जहाँगीर शराब और नशीली चीज़ों पर अपनी गहरी निर्भरता से छुटकारा नहीं पा सके. यहां तक कि उनके दरबार में एक ऐसा कर्मचारी भी नियुक्त था, जिसकी शायद एकमात्र ज़िम्मेदारी शाही नशीली चीज़ों की देखभाल और उन्हें सुरक्षित रखना थी.’

इस आत्मकथा का शायद सबसे बड़ा विरोधाभास तब सामने आता है, जब बादशाह बनने के बाद जहाँगीर अपनी प्रजा के लिए शराब और दूसरी नशीली चीज़ों को बनाने और बेचने पर पाबंदी लगा देते हैं. लेकिन इसी फ़रमान में वह अपनी शराबखोरी का भी ज़िक्र कर देते हैं.

जहाँगीर इसी आत्मकथा में दूसरों की शराबखोरी और अफ़ीम के नतीजों का भी ज़िक्र करते हैं.

इनायत ख़ान के बारे में वह लिखते हैं कि वह अफ़ीम के आदी थे और शराब भी पीते थे. यहां तक कि शराब ने उनकी हालत ख़राब कर दी थी. दूसरों के बारे में लिखते हुए जहाँगीर नशे के ख़तरनाक असर देख सकते थे. लेकिन अपनी शराबखोरी को वह अक्सर संयम, दवा या हाजमे की ज़रूरत के तौर पर पेश करते हैं.

शायद इसी विरोधाभास की एक मिसाल उनके बेटे ख़ुर्रम यानी भविष्य के बादशाह शाहजहाँ का किस्सा है.

जहाँगीर लिखते हैं कि ख़ुर्रम 24 साल की उम्र तक शराब से दूर रहे थे. एक मौक़े पर जहाँगीर ने उन्हें शराब पेश की और संयम बरतने की सलाह दी. उन्होंने इब्न-ए-सीना का यह क़ौल भी लिखा कि शराब थोड़ी हो तो दवा और ज़्यादा हो तो सांप का ज़हर बन जाती है.

बादशाह दरबार में नियमित रूप से शराब की महफ़िलें सजाया करते थे. जहाँगीर के अपने शब्दों में, इन महफ़िलों में उनके दरबारी ‘वफ़ादारी की शराब से सरशार’ हो जाते थे.

नौरोज़ के मौक़े पर तो बादशाह ने हुक्म दे रखा था कि शाही जश्न मनाने वाले अपनी पसंद की कोई भी ‘नशीली या मदहोश करने वाली चीज़’ इस्तेमाल कर सकते हैं और उन्हें किसी ‘पाबंदी या रुकावट’ की परवाह नहीं करनी चाहिए.

इंसाफ़ पसंद बादशाह

मक़बरा-ए-जहाँगीरी स्थानीय और विदेशी पर्यटकों के लिए लाहौर की सबसे लोकप्रिय ऐतिहासिक इमारतों में से एक है. यहां रोज़ बड़ी संख्या में पर्यटक और इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोग आते हैं

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राम चंद्र प्रसाद ने अपनी किताब ‘अर्ली इंग्लिश ट्रैवलर्स इन इंडिया’ में लिखा है कि साल 1616 में जहाँगीर ने नशे की हालत में अपने कुछ दरबारियों को हुक्म दिया कि वे उनके साथ बैठकर शराब पिएँ.

अगले दिन किसी ने संयोग से या जानबूझकर पिछली रात हुई घटना का ज़िक्र कर दिया. बादशाह को अपना हुक्म याद नहीं था. इसलिए उन्होंने पूछा कि दरबारियों को शराब पीने की इजाज़त किसने दी.

जहाँगीर के लिए नशा सिर्फ़ शराब और अफ़ीम तक सीमित नहीं था.

कश्मीर की यात्रा के दौरान वह एक स्थानीय नशीले पेय का भी ज़िक्र करते हैं. उनका मानना था कि इसमें भांग मिलाई जाती थी. वह इसके नशे और शरीर पर होने वाले असर का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि अगर शराब उपलब्ध न हो तो ज़रूरत के समय इसे उसके विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

नरसिंह पी. सिल भारतीय मूल के एक प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार और लेखक हैं. उनके मुताबिक, हालांकि जहाँगीर को ऐशो-आराम में डूबे हुए शासक के तौर पर देखा जाता है, लेकिन उन्होंने न्याय दिलाने के लिए एक बाक़ायदा व्यवस्था बनाई थी. इसमें सबसे प्रमुख ‘ज़ंजीर-ए-अदल’ थी. यह इस संकल्प का प्रतीक थी कि प्रजा की शिकायतें और फ़रियाद सीधे बादशाह तक पहुंच सकें.

जहाँगीर के दौर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ व्यापारिक संबंध भी स्थापित हुए.

इस तरह जहाँगीर की विरासत मुग़ल इतिहास के व्यापक संदर्भ में कला और संस्कृति के संरक्षण, प्रशासनिक कदमों और जटिल पारिवारिक रिश्तों के ऐसे मेल को दिखाती है, जिसमें उनकी शख़्सियत के कई विरोधाभासी पहलू नज़र आते हैं.

लीसा लिखती हैं कि ज़िंदगी के आख़िरी सालों में कई वर्षों तक हद से ज़्यादा शराब और नशीली चीज़ों के इस्तेमाल ने जहाँगीर के शरीर को इतना कमज़ोर कर दिया था कि एक और बेटे की बग़ावत कुचलने की कामयाब लेकिन थका देने वाली मुहिम के बाद वह लगभग अपाहिज हो गए थे. उनकी हालत ऐसी थी कि न तो वह चल सकते थे और न अफ़ीम ले सकते थे. वह सिर्फ़ कुछ घूंट शराब ही पी पाते थे.

इसके बावजूद उन्होंने सफ़र करना नहीं छोड़ा.

साल 1627 की गर्मियों में जहाँगीर सुकून और आराम के लिए अपनी पसंदीदा जगह कश्मीर के लिए रवाना हुए. लेकिन वहां पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद ख़ुद जहाँगीर और उनके साथ आए सबसे छोटे बेटे, शहज़ादे शहरयार, गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. दोनों की हालत नाज़ुक हो गई.

इसके बाद वे लाहौर लौटने के लिए रवाना हुए. लेकिन सफ़र के दौरान 28 अक्तूबर 1627 को चिंगरह सिरी के स्थान पर उनका निधन हो गया. उस समय उनकी उम्र 58 साल थी और उन्हें तख़्त पर बैठे 21 साल से कुछ ज़्यादा हो चुके थे.

जहाँगीर की आत्मकथा की लिखाई 17वें साल-ए-सल्तनत के बाद बीमारी और कमज़ोरी की वजह से रुक गई थी. इसके बाद का हिस्सा दरबारी इतिहासकारों, ख़ास तौर पर मोतमिद ख़ान और मुहम्मद हादी ने पूरा किया.

लीसा के मुताबिक, जहाँगीर के बाद आने वाले मुग़ल बादशाहों ने भी अपने पूर्वजों की इस घूमने-फिरने और सक्रिय जीवनशैली को जारी रखा, जब तक उनके पास इसके लिए आर्थिक और राजनीतिक ताक़त रही. यह सिलसिला लगभग अगले 100 साल तक चलता रहा.

हालांकि, जहाँगीर से पहले या उनके बाद शायद ही कोई ऐसा मुग़ल बादशाह हुआ, जिसने सुख और आनंद की तलाश में लगातार सफ़र करने को इतनी नियमितता से अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाया हो.

जहाँगीर अपनी शराब पीने की आदत और उससे जूझने की अपनी कोशिश को खुले तौर पर स्वीकार करते थे. ख़ुद जहाँगीर के मुताबिक, उनके दरबारी कवि तालिब आमली ने इसी स्थिति को एक शेर में इस तरह बयान किया:

‘मेरे दो होंठ हैं, एक शराब का दीवाना है

और दूसरा नशे में होने के लिए माफ़ी मांगता है.’

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS