Source :- LIVE HINDUSTAN
इजरायल के रेगिस्तान में गधों ने कमाल कर दिया। 44 साल पहले यहां इजरायल ने ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के 28 गधे छोड़े थे। आज यहां 400 से 500 गधे हो गए हैं और हरियाली भी वापस आ रही है।
गधों को लेकर जितनी तरह का कहावतें प्रचलित हैं उनसे लगता है कि यह दुनिया के बहुत ही सुस्त और अनुपयोगी जीव है। हालांकि गधे हमेशा से ही इंसानों के लिए उपयोगी रहे हैं। बोझा ढोने के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी गधों के अंदर अद्वितीय क्षमता होती है। सबसे बड़ी बात यह ऐसा जीव है जिसमें खूब सहनशक्ति और धैर्य होता है। रेमन क्रेटर के रेगिस्तान में तो 28 जंगली गधों ने ऐसा कमाल किया कि रेत में भी हलियाली लौट आई। आज यहां 500 से 600 गधे कुलाचे भर रहे हैं। जरूरत के हिसाब से गधों का शरीर भी परिवर्तित हो गया। आज ये गधे देखने मे छोटे-छोटे घोड़ों की तरह नजर आते हैं।
ईरान से मंगवाए गए गधे
लगभग 44 साल पहले इजरायल ने नेगेव रेगिस्तान में ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के जंगली गधों को छोड़ा था। दरअसल 20 शताब्दी में शिकार की वजह से यहां गधों की संख्या लगभग खत्म हो गई थी। ईरान और इजरायल में अब भले ही दुश्मनी हो लेकिन उस समय इजरायल ने पर्यावरण बचाने के लिए तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी से बात की। 1968 में ईरान से 28 गधे भेजे गए। इन्हें पहले योतवाता वाइल्डलाइफ रिजर्व में लाया गया और कुछ दिन यहां रखा गया।
1982 में 28 गधे सूखे रेगिस्तान में छोड़ दिए गए। आज इस इलाके के नक्शा बदल चुका है। यहां कई तरह की वनस्पतियां विकसित होने लगी हैं। वहीं गधे भी इस माहौल में अच्छी तरह सर्वाइव कर गए। इजरायली अधइकारियों का कहना था कि इस इलाके में गधों को छोड़ने से एक तो इस प्रजाति की सुरक्षा होगी दूसरा रेगिस्तान में फिर से जीवन लौट आएगा। जिन दो नस्लों को यहां छोड़ा गया था, दोनों ही खत्म होने की कगार पर थीं।
ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान इजरायल के साथ संबंध अच्छे थे। इसीदौरान शाह ने इजरायल को गधे गिफ्ट किए थे। इन्हें हवाई जहाज से इजरायल लाया गया था। इसके बाद कुछ गधे इथियोपिया से मंगवाए गए। जब इन्हें रामोन क्रेटर में छोड़ा गया तो यहीं उनका पसंदीदा अड्डा बन गया। गधों ने यहां भयंकर गर्मी और शुष्क जलवायु का सामना किया। इन गधों के आकार में परिवर्तन हो गया और ये छोटे-छोटे घोड़े जैसे दिखने लगे। गधे अब सुस्त जीव नहीं बल्कि 70 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ने वाले घोड़ बन गए थे। अब ये यहां 45 डिग्री के तापमान में भी सर्वाइव कर लेते हैं और बिना पानी के भी कई दिनों तक रह सकते हैं। इसके अलावा इन गधों को अब गड्ढा खोदने की कला भी आ गई है। गड्ढे में पानी भर जाता है तो दूसरे जीव भी पानी पीते हैं। इसके अलावा गड्ढे के आसपास हरियाली भी हो जाती है।
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