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सहानरपुर की जिस मस्जिद को ढहाया गया उसका इतिहास क्या है?

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Source :- BBC INDIA

तस्वीर में मलबे के इर्द गुर्द पुलिस बैरिकेड्स देख रहे हैं, उसी जगह पर मस्जिद हुआ करती थी; अब वहां सिर्फ़ मलबा है.

“पुरानी मस्जिद है. मेरे दादा को मैंने ख़ुद वहां नमाज़ पढ़ते देखा है. अपने अब्बू को भी मैंने वहां नमाज़ पढ़ते देखा है और मैं ख़ुद भी वहां गया हूं. आज भी कभी-कभी हम वहां जाकर नमाज़ पढ़ लेते थे, जुमे की नमाज़ भी.”

शरीफ़ अहमद सहारनपुर कलेक्ट्रेट से सटे इलाके़ में रहते हैं. इसी कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक पुरानी मस्जिद को प्रशासन ने पांच सितंबर 2026 को ढहा दिया.

मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद 100 साल से ज़्यादा पुरानी थी. वहीं प्रशासन का कहना है कि यह सरकारी ज़मीन पर बना ग़ैरक़ानूनी ढांचा था और इसके ख़िलाफ़ बेदख़ली की क़ानूनी कार्रवाई की गई थी.

हालांकि, शरीफ़ अहमद के हिंदू पड़ोसी अमित टंडन कहते हैं, “यहां बहुत ज़्यादा ग़लत हुआ है. ये हमें भी महसूस हुआ है. ये सब परिवार अपना ही है. हम इस बात के ख़िलाफ़ हैं.”

मस्जिद गिराए जाने के बाद अब इस जगह पर बैरिकेड्स लगे हैं, बैरिडेड्स से आगे जाने की अनुमति हमें नहीं दी गई.

पूरा मामला क्या है?

कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी.

इसके बाद 24 मार्च 2025 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में उत्तर प्रदेश लोक परिसर अधिनियम के तहत मामला दाख़िल हुआ था.

लंबी सुनवाई के बाद 17 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए बेदख़ली का आदेश दिया था.

मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को ज़िला अदालत में चुनौती दी. क़रीब डेढ़ महीने की सुनवाई के बाद ज़िला जज की अदालत ने दो सितंबर को अपील ख़ारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या अदालत ने मस्जिद को ध्वस्त करने का स्पष्ट आदेश दिया था, या सिर्फ़ ज़मीन से बेदख़ली का आदेश था?

इसी सवाल पर दोनों पक्षों के बीच विवाद है.

कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी.

हमने कोर्ट के आदेशों और नोटिस को समझने के लिए अलग-अलग वकीलों से बात की.

इस मामले से जुड़े वरिष्ठ वकील परवेज़ जब्बार कहते हैं, “आदेश बेदख़ली का था, ध्वस्तीकरण का नहीं. ऐसी क्या जल्दी हो रही थी कि सिर्फ़ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही यह कार्रवाई करनी थी?”

वो बताते हैं, “अगर नोटिस मिलने के बाद की पूरी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाता, तो हमारे पास 18 दिन और बाक़ी थे तो हमें वह समय मिलना चाहिए था.”

वकीलों का कहना है कि आदेश का मूल स्वरूप बेदख़ली का था और नोटिस के बाद मिलने वाली 30 दिन की निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले ही कार्रवाई कर दी गई.

वहीं, मस्जिद के मुतवल्ली (केयरटेकर) तनवीर अहमद कहते हैं, “मान लीजिए उनको हमें बेदख़ल करना था, तो उसकी पूरी वीडियोग्राफ़ी बनाते. वहां जनरेटर था, उसको हम निकालते. क़ुरान थे, उनको निकालते. नमाज़ की चटाइयां थीं, उनको निकालते. बहुत सारा सामान रहता है.”

वकील नौशाद अली बताते हैं, “30 दिन के बाद वो बेदख़ली कर सकते थे. लेकिन उससे पहले उन्होंने बेदख़ली की प्रक्रिया पूरी नहीं की. सीधे गए और दोनों तरफ़ के गेट बंद करके, पूरे कोर्ट परिसर को सील करके उस स्ट्रक्चर को ध्वस्त कर दिया.”

प्रशासन का पक्ष

इस विषय पर वकील नौशाद अली ने भी अपनी राय बीबीसी के साथ साझा की

हम अपने सवाल लेकर डीएम ऑफिस भी पहुंचे. वहां हमें बताया गया कि डीआईजी सहारनपुर इस विषय पर मीडिया को पहले ही बयान दे चुके हैं और अब ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में विचाराधीन है.

डीआईजी सहारनपुर अभिषेक सिंह ने पांच सितंबर को समाचार एजेंसी एएनआई को दिए बयान में कहा था, “हमने कार्रवाई करते समय सभी क़ानूनी प्रावधानों और प्रक्रियाओं का पालन किया है और क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठाए गए हैं. सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने इसे सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से निर्मित माना था और मस्जिद कमेटी की अपील भी ख़ारिज हो गई थी.”

यानी प्रशासन का कहना है कि मस्जिद को हटाने की कार्रवाई पहले हुई न्यायिक और प्रशासनिक कार्यवाही के बाद की गई. लेकिन मस्जिद से जुड़े लोगों का कहना है कि जिस आदेश के आधार पर कार्रवाई हुई उसमें बेदख़ली और धवस्तीकरण की प्रक्रिया को किस तरह समझा गया.

इसका जवाब अब हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद ही सामने आएगा.

इतिहास गवाह है?

मस्जिद गिराए जाने के बाद उसका मलबा भी प्रशासन से जल्द ही हटा दिया.

मस्जिद गिराए जाने के बाद उसका मलबा भी प्रशासन ने जल्द ही हटा दिया. ये मलबा अब शहर से कुछ दूर अंबाला रोड पर सड़क के किनारे रखा गया है.

मलबे में मस्जिद से जुड़ी चीज़ें दिखाई दीं- जैसे नमाज़ पढ़ने वाली चटाई, टोपी, कुछ फटे हुए पन्ने, धार्मिक माला, सफेद कुर्ता-पायजामा और दूसरे कपड़े, जो संभवतः मस्जिद के इमाम या देखरेख करने वाले व्यक्ति के थे.

मलबे में कुछ ईंटों पर 1906, 1909, 1911 और 1913 जैसे साल लिखे हुए थे. यहां मलबे के पास खड़े एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “अब मस्जिद तो बची नहीं है. बस उसकी निशानियां बटोर कर रखना चाहते हैं, चाहे ये पुरानी ईंटें ही क्यों न हों.”

वहीं, एक दूसरे व्यक्ति ने कहा, “मलबे में क़ुरान शरीफ़ ऊपर ही था. हम उन्हें घर ले गए और कुछ को क़ब्रिस्तान में दफ़ना दिया.”

स्थानीय लोगों का मानना है कि इन ईंटों पर लिखे हुए साल इस बात का संकेत देते हैं कि ये ईंटें 20वीं सदी की शुरुआत की हैं.

लेकिन क्या सिर्फ़ ईंटों पर लिखे इन सालों से मस्जिद की उम्र तय की जा सकती है?

मस्जिद बनाने में जो ईंट लगी थीं, ये उन्हीं में से एक है.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहासकार प्रोफे़सर नदीम रिज़वी के मुताबिक़, “उस दौर में ईंटों पर निर्माण का साल लिखा जाना असामान्य नहीं था. लेकिन सिर्फ़ इन नंबरों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि मस्जिद भी उसी दौर में बनी थी.”

उनके मुताबिक़, मस्जिद इन ईंटों से बाद में बनी हो सकती है, या इससे पहले की किसी इमारत की पुरानी ईंटों का इस्तेमाल भी किया गया हो सकता है.

प्रोफे़सर रिज़वी बताते हैं, “कोई इमारत कितनी पुरानी है इसके लिए ईंटों का आकार, उनकी बनावट और उन्हें जोड़ने वाले मसाले यानी मोर्टार की जांच ज़्यादा मददगार हो सकती है.”

मस्जिद की साइट पर एक कुएं जैसा ढांचा भी सामने आया था, जिसका आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (एएसआई) की टीम ने सर्वे किया था.

एएसआई अधिकारी मनोज यादव के मुताबिक़, “सर्वे के दौरान वहां लखौरी ईंटें मिलीं. ईंटों का आकार लगभग 20×10×5 सेंटीमीटर है और इन्हें जोड़ने के लिए लाइम-सुरखी जैसे बाइंडिंग सामग्री का इस्तेमाल हुआ है.”

उनके मुताबिक़, इस तरह की ईंटें और चूना-सुर्खी का इस्तेमाल मध्यकाल से लेकर 20वीं सदी के शुरुआती दौर तक उत्तर-मध्य गंगा घाटी में मिलता है.

स्थानीय लोग क्या बताते हैं

परवेज़ जब्बार, वरिष्ठ वकील

हमने मुस्लिम पक्ष के दावों से अलग, मस्जिद की उम्र और ज़मीन की मिल्कियत को समझने के लिए स्थानीय लोगों, पुराने निवासियों और उपलब्ध दस्तावेज़ों को भी देखा.

हमने खास तौर पर आसपास के बुज़ुर्ग लोगों से बात की, ताकि इस जगह के मौखिक इतिहास को भी समझा जा सके.

इमारत के 1947 से पहले होने के दावे भी हैं. इस पर एक अहम क़ानूनी सवाल भी उठता है. प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप (स्पेशन प्रॉविजन्स) अधिनियम, 1991 की धारा 4(1) कहती है कि 15 अगस्त 1947 को मौजूद किसी पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र वही रहेगा, जैसा उस तारीख़ को था.

लेकिन इस प्रावधान का मतलब यह नहीं है कि किसी धार्मिक स्थल की ज़मीन की मिल्कियत, निर्माण की वैधता या सरकारी ज़मीन पर कब्जे़ का सवाल अपने आप तय हो जाता है. इसलिए इस मामले में दो अलग सवाल हैं: पहला- क्या 15 अगस्त 1947 को यहां एक मस्जिद मौजूद थी? और दूसरा- उस ज़मीन का क़ानूनी मालिक कौन था?

इन्हीं दोनों सवालों के जवाब के लिए हमने पुराने ज़मीन के रिकॉर्ड को भी देखा.

वरिष्ठ स्थानीय निवासी आबिद कहते हैं, “सैकड़ों साल पुरानी मस्जिद है. जब यहां कचहरी भी नहीं थी, भारत आज़ाद भी नहीं हुआ था, तब से है. ब्रिटिश काल की मस्जिद है.”

वहीं, उनके हिंदू पड़ोसी पवन राणा कहते हैं, “अगर यह ग़ैरक़ानूनी है तो भी एक तरीक़ा होता है. ये थोड़े ही है कि अचानक तोड़ दी जाए. इतने लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी हुई थीं. इतनी पुरानी इमारत को इतनी जल्दी तोड़ दिया गया. पहले कभी कोई विवाद भी नहीं सुना था. अचानक डेढ़ महीने के अंदर पूरा काम हो गया, ये बात समझ में नहीं आती.”

वहीं, वकील नौशाद अली बताते हैं, “सरकार के पास मिल्कियत का कोई दस्तावेज़ नहीं है. आज तक भी नहीं है. रेवेन्यू रिकॉर्ड में मालिकान के नाम जो ज़मींदार थे, वाहिद खान और याकूब खान, आज तक इसी खसरा नंबर 539 में दर्ज चले आ रहे हैं, जिसमें कलेक्ट्रेट, कोर्ट और मस्जिद होने की बात कही जा रही है.”

हालांकि, उत्तर प्रदेश के भूलेख पोर्टल पर जब हमने चेक किया, तो खसरा 539 का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं था.

1955 में वक्फ़ रजिस्ट्रेशन और 1960 का पोस्ट ऑफिस लीज़

वकील नौशाद अली कहते हैं, “फिर 1955 में यह वक्फ बोर्ड में दर्ज हुआ. वक्फ बोर्ड में ऐसे ही दर्ज नहीं होता. पूरा सर्वे होता है, प्रॉपर्टी का मालिक कौन है, किसने इसे वक्फ़ किया, उसका रिकॉर्ड देखा जाता है.”

“दूसरी बात ये है कि केंद्र सरकार का एक विभाग, पोस्टल डिपार्टमेंट, 1960 में इस प्रॉपर्टी के दो कमरे किराए पर लेता है. वहां डाकखाना चलता था.”

“केंद्र सरकार और मस्जिद के बीच बाकायदा एक लीज़ एग्रीमेंट हुआ था. निश्चित तौर पर उन्होंने मिल्कियत के दस्तावेज़ देखे होंगे और तभी लीज़ एग्रीमेंट किया होगा. वह एग्रीमेंट आज तक बरक़रार है.”

हमने उपलब्ध वक्फ़ दस्तावेज़ों की भी पड़ताल की. इनमें इस संपत्ति के वक्फ़ से जुड़े रिकॉर्ड मौजूद हैं.

लेकिन यहां भी एक अहम फ़र्क़ है: वक्फ़ में किसी संपत्ति का दर्ज होना और उस संपत्ति का मूल मालिकाना हक़ साबित होना एक ही बात नहीं है. इसलिए वक्फ़ रिकॉर्ड के साथ-साथ मूल रेवेन्यू रिकॉर्ड और ज़मीन के टाइटल डॉक्यूमेंट्स को देखना ज़रूरी है.

कई विपक्षी नेता उठा रहे आवाज़

सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद सोफ़े पर बैठे हुए हैं

इस मामले पर कई नेताओं की प्रतिक्रिया भी आई है. कैराना की सांसद इक़रा हसन, पूर्व विधायक और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और सहारनपुर के एमएलसी शाहनवाज ख़ान का कहना है कि जब वे इस जगह पर जाना चाहते थे, तब उन्हें हाउस अरेस्ट किया गया.

वहीं, सहारनपुर के विधायक और बीजेपी नेता राजीव गुम्बर ने कहा कि मामला अदालत तक गया था और अदालत ने इसे सरकारी ज़मीन पर बना अवैध निर्माण माना है. उनका कहना है कि अदालत के फै़सले का पालन करना होगा.

सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद दावा करते हुए कहते हैं, “जो सिटी मजिस्ट्रेट ने ऑर्डर किया, सारी चीज़ों को दरकिनार करके किया. किसी नियम, किसी कायदे, किसी कानून को इन्होंने मानने का काम नहीं किया.”

“संभल में क्या हुआ था? संभल में पुलिस ने गोली चलाई, पांच आदमी मारे गए और पांच आदमियों के क़ातिलों का भी पता नहीं है. ये पूरा एक एजेंडे के तहत किया गया है. मस्जिदों या मंदिरों या इबादतगाहों को इस तरह से ढहाना किसी भी सूरत में न्यायोचित नहीं है.”

सवाल अब भी बाक़ी हैं

कलेक्ट्रेट परिसर में जहां कभी मस्जिद थी, अब वहां सिर्फ़ खाली जगह और बैरिकेड्स हैं.

कलेक्ट्रेट परिसर में जहां कभी मस्जिद थी, अब वहां सिर्फ़ खाली जगह और बैरिकेड्स हैं. एक तरफ़ प्रशासन का कहना है कि यह सरकारी ज़मीन पर बना अनाधिकृत ढांचा था और क़ानूनी प्रक्रिया के बाद इसे हटाया गया.

दूसरी तरफ़ मस्जिद कमेटी का दावा है कि यह 100 साल से ज़्यादा पुरानी मस्जिद थी, ज़मीन निजी मालिकों की थी और वक्फ़ रिकॉर्ड में भी दर्ज थी.

और इसके बीच कुछ अहम सवाल अब भी बाक़ी हैं.

खसरा नंबर 539 की ज़मीन का मूल मालिक कौन था? क्या 15 अगस्त 1947 को इस जगह पर मस्जिद मौजूद थी?

मस्जिद की उम्र और ज़मीन की मिल्कियत को साबित करने वाले सबसे पुराने दस्तावेज़ कौन से हैं?

और सबसे अहम सवाल क्या प्रशासन ने ध्वस्तीकरण से पहले क़ानून में तय पूरी प्रक्रिया का पालन किया था?

इन सवालों के जवाब अब दावों से नहीं, बल्कि मूल ज़मीन के रिकॉर्ड, वक्फ़ दस्तावेज़ों, प्रशासनिक आदेशों, जांच और अदालत में होने वाली सुनवाई से होगा.

फ़िलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है और 6.41 करोड़ रुपये से ज़्यादा की वसूली पर अंतरिम रोक लगा दी है. मामले की अगली सुनवाई 12 अक्तूबर 2026 को होगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS