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एनएसई का आईपीओ 10 साल तक क्यों अटका रहा? जानिए अब कैसे करेगा काम

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Source :- BBC INDIA

एनएसई का दफ़्तर

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भारत का सबसे बड़ा शेयर बाज़ार, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई पहली बार ख़ुद का आईपीओ लाने जा रहा है. यानी ख़ुद शेयर बाज़ार में लिस्ट होने जा रहा है.

एनएसई ने बताया कि उसकी कंपनी के आईपीओ में शेयर ख़रीदने की शुरुआत 17 सितंबर (गुरुवार) से हुई है और यह 21 सितंबर तक चलेगी. उसने कहा कि 24 सितंबर को इसे शेयर बाज़ार में लिस्ट किया जाएगा.

इस आईपीओ में एनएसई के एक शेयर की क़ीमत 1,700 से 1,785 रुपये के बीच रखी गई है.

छोटे निवेशकों को आठ शेयरों के एक लॉट को ख़रीदने के लिए 14,280 रुपए देने होंगे. उन्होंने कहा कि आईपीओ में एनएसई के इश्यू साइज़ 22,562 करोड़ रुपए है.

इस आईपीओ के संदर्भ में एनएसई की शुरुआत आख़िर कब हुई थी? एनएसई का आईपीओ कैसा होगा? यह आईपीओ दस साल तक क्यों टला? तकनीक के मामले में एनएसई, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) से कितना अलग है? आइए, ऐसी बातों के बारे में विशेषज्ञों से जानते हैं.

एनएसई की शुरुआत

1990 के दशक की शुरुआत में भारत एक बड़े आर्थिक बदलाव के दौर में था. उस समय शेयरों की ख़रीद-बिक्री काफ़ी हद तक पुराने शेयर बाज़ारों के आसपास ही होती थी.

ख़ास तौर पर बीएसई के ब्रोकरों का काफ़ी प्रभाव था और सही व्यवस्था नहीं होने के चलते वहाँ अक्सर गड़बड़ियाँ होती थीं.

इन समस्याओं को दूर करने के लिए वित्त मंत्रालय ने 1991 में मनोहर फेरवानी की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई थी. 1991 में फेरवानी समिति की सिफ़ारिशों के बाद 1992 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना हुई. उस समय भी सरकार ने इस शेयर बाज़ार को मान्यता नहीं दी थी.

इसी दौरान, 1992 में हर्षद मेहता का शेयर बाज़ार घोटाला सामने आया. पता चला कि मेहता ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के दूसरे बैंकरों और नेताओं के साथ मिलकर बाज़ार में गड़बड़ी की और धोखाधड़ी की.

उस समय यह घोटाला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था. यह घोटाला भारतीय शेयर बाज़ार के इतिहास में सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक बन गया.

हर्षद मेहता पर आरोप था कि उन्होंने बैंकों से बिना किसी पक्की सुरक्षा के क़र्ज़ लेने के लिए बैंक रसीदों का इस्तेमाल किया और फिर उस पैसे को शेयर बाज़ार में लगाया, जिससे शेयरों की क़ीमतें बढ़ गईं. घोटाला सामने आने के बाद भारतीय स्टेट बैंक समेत कई बैंकों को भारी नुक़सान हुआ.

इस वित्तीय घोटाले से सिस्टम की कमियां सामने आईं और भारतीय बाज़ारों को आधुनिक बनाने और उन पर निगरानी बढ़ाने की कोशिशें तेज़ हुईं.

इसी माहौल में सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (सेबी) ने 1993 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को मान्यता दी. एक्सचेंज का कहना है कि उसने 1994 में थोक क़र्ज़ बाज़ार (होलसेल डेब्ट मार्केट) शुरू होने के साथ काम करना शुरू किया था.

उसने बताया कि इसके तुरंत बाद नक़द बाज़ार (कैश मार्केट) का काम भी शुरू कर दिया गया.

बीएसई की इमारत

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एनएसई और बीएसई की ट्रेडिंग में क्या अंतर है?

एनएसई ने अपने पहले मैनेजिंग डायरेक्टर आर.एच. पाटिल की अगुवाई में पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम शुरू किया.

इसका मतलब है कि शेयरों की ख़रीद-बिक्री पूरी तरह अपने आप चलने वाले इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के ज़रिए की जा सकती थी.

एनएसई ने देशभर के ट्रेडिंग कंप्यूटरों को जोड़ने के लिए सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल किया. इससे देश के किसी भी हिस्से से शेयरों की ख़रीद-बिक्री में हिस्सा लेना संभव हो गया.

फ़िलहाल एनएसई में शेयरों, डेरिवेटिव्स, फ़िक्स्ड इनकम और क़र्ज़ से जुड़े उत्पादों (डेब्ट प्रॉडक्ट्स) और पब्लिक इश्यू में ट्रेडिंग होती है.

देश के सबसे पुराने शेयर बाज़ार बीएसई में फ़िलहाल 5,700 से ज़्यादा कंपनियां लिस्टेड हैं, जबकि मार्च 2025 तक एनएसई में 2,700 से ज़्यादा कंपनियां लिस्टेड थीं.

यह प्लेटफ़ॉर्म सोमवार से शुक्रवार तक हर दिन सुबह 9:15 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक चलता है. हालांकि, बाज़ार खुलने से पहले की ट्रेडिंग 15 मिनट पहले शुरू हो जाती है. दिवाली जैसे त्योहारों पर यह ‘मुहूर्त ट्रेडिंग’ जैसी ख़ास ट्रेडिंग भी कराता है.

बिज़नेस विशेषज्ञ नागेंद्र साई कुंदावरम ने बीबीसी को बताया, “एनएसई ने अलग-अलग हिस्सों में ट्रेडिंग के नए तरीक़े शुरू किए हैं. जैसे बैंक निफ़्टी, निफ़्टी वीकली, निफ़्टी मंथली, फ़िन निफ़्टी, मिडकैप इंडेक्स, करेंसी, एक्सचेंज ट्रेडेड फ़ंड्स, म्यूचुअल फ़ंड्स, कॉर्पोरेट बॉन्ड आदि. उसने बाज़ार में हिस्सा लेने वालों के लिए अलग-अलग तरह से ट्रेडिंग करने के लिए कई साधन शुरू किए हैं. पुराना शेयर बाज़ार बीएसई डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग के मामले में काफ़ी पीछे रह गया है.”

उन्होंने कहा, “यह देश की सबसे मज़बूत तकनीक पर आधारित व्यवस्था है. इसने बहुत तेज़ी से होने वाली ट्रेडिंग, बाज़ार की तुरंत मिलने वाली जानकारी, जोखिम को संभालने और नियमों का पालन करने के मामले में अपनी क्षमता दिखाई है.”

एनएसई की वेबसाइट के मुताबिक़, 23 जुलाई 2024 को उसने एक दिन में क़रीब 2,000 करोड़ ऑर्डर संभाले. बिज़नेस स्टैंडर्ड वेबसाइट ने कंपनी के सीईओ आशीष चौहान के हवाले से बताया कि पाँच जून 2024 को एनएसई ने एक दिन में 1,971 करोड़ ऑर्डर और 28.55 करोड़ ट्रेड संभाले, जो दुनिया में एक रिकॉर्ड है.

औसतन एनएसई पर हर दिन 500 करोड़ से ज़्यादा कॉन्ट्रैक्ट और तीन लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के लेन-देन संभाले जाते हैं. 15 सितंबर को एनएसई ने सभी हिस्सों में क़रीब 1,304 करोड़ ऑर्डर संभाले.

वहीं, बीएसई पर हर दिन औसतन केवल 3 करोड़ कॉन्ट्रैक्ट और 250 करोड़ रुपये का कारोबार होता है.

आईपीओ में दस साल की देरी क्यों हुई?

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज

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बिज़नेस विशेषज्ञ नागेंद्र साई कुंदावरम के मुताबिक़, “दस साल की कोशिशों के बाद एनएसई आईपीओ लेकर आ रहा है. हज़ारों कंपनियों को लिस्ट होने और शेयरों की ख़रीद-बिक्री के लिए प्लेटफ़ॉर्म देने वाली इस कंपनी को बाज़ार में आने में काफ़ी समय लगा. 2016 से कंपनी को क़ानूनी मामलों, नियमों और कामकाज से जुड़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा. ख़ास तौर पर को-लोकेशन मामले को सुलझाने में काफ़ी समय लगा.”

उन्होंने बताया कि एनएसई पर आरोप था कि उसने कुछ बड़े कारोबारियों को डार्क फ़ाइबर की सुविधा दी. साथ ही, कुछ कारोबारियों को संस्थागत निवेशकों की ख़रीद-बिक्री की जानकारी पहले ही पहुंचा दी. क़ानूनी तौर पर मुख्य आरोप यह था कि उसने तेज़ी से ट्रेडिंग करने वाले कारोबारियों को दूसरों से पहले ट्रेडिंग करने का मौक़ा दिया.

नागेंद्र साई के मुताबिक़, एक व्हिसलब्लोअर ने शिकायत की थी कि इससे कुछ कारोबारियों को ट्रेडिंग में ग़लत फ़ायदा मिला. अगर उन्हें कुछ माइक्रोसेकंड पहले ट्रेड करने का मौक़ा भी मिलता, तो उससे भी उन्हें फ़ायदा हो सकता था. इसी वजह से उस समय इस मामले पर बड़ा हंगामा हुआ था.

उनका दावा है कि यह भी चर्चा हुई कि एक हिमालयी योगी को पहले से जानकारी मिल रही थी और यह सब उसकी आंखों के सामने हो रहा था. यह मामला अदालतों और ट्राइब्यूनल तक पहुँचा और कई सालों तक चलता रहा.

नागेंद्र साई ने बताया, “आख़िरकार, एनएसई ने को-लोकेशन और डार्क फ़ाइबर मामलों में सेबी को 1,491.2 करोड़ रुपये देकर मामला सुलझाया. इसके बाद उसे आईपीओ लाने के लिए सेबी से मंज़ूरी मिल गई.”

को-लोकेशन मामले को इतना तूल क्यों मिला?

नागेंद्र साई कुंदावरम ने कहा, “यह कोई सामान्य कंपनी या सामान्य मामला नहीं है, इसलिए एनएसई का मामला अलग है. जिस व्यवस्था को निगरानी रखने वाली संस्था माना जाता है, उसी पर आरोप लगे. पारदर्शिता और लोगों के भरोसे का मुद्दा भी इससे जुड़ा है. इसी वजह से इस मामले को इतनी अहमियत मिली.”

ट्रेडिंग

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एनएसई आईपीओ के लिए कैसे अप्लाई करें?

जो लोग आईपीओ के लिए आवेदन करना चाहते हैं, उनके पास डीमैट अकाउंट होना ज़रूरी है. जिनके पास डीमैट अकाउंट है, वे कंपनी की ओर से बताई गई तारीख़ों के दौरान अपने नेट बैंकिंग या ट्रेडिंग अकाउंट के ज़रिए आईपीओ के लिए आवेदन कर सकते हैं.

जब आप नेट बैंकिंग से आईपीओ में निवेश के लिए आवेदन करते हैं, तो आवेदन में बताई गई पूरी रक़म आपके अकाउंट में रोक दी जाती है. आपको जितने शेयर मिलते हैं, उसके हिसाब से रक़म काट ली जाती है और बची हुई राशि आपके अकाउंट में वापस आ जाती है.

अगर शेयर नहीं मिलते हैं, तो पूरी रक़म आपके अकाउंट में वापस आ जाती है. इसका मतलब है कि यह पैसा दूसरे लेन-देन के लिए हमेशा उपलब्ध रहेगा.

शेयर कैसे मिलते हैं, लॉट क्या होता है?

शेयरों का आवंटन लॉटरी से किया जाएगा. इसलिए आवेदन करने वाले सभी लोगों को शेयर मिलना ज़रूरी नहीं है.

कंपनी आईपीओ के समय शेयरों की कम से कम संख्या तय करती है, इसे लॉट कहा जाता है. अगर कोई व्यक्ति इस लॉट से कम शेयरों के लिए आवेदन करता है, तो उसका आवेदन रद्द कर दिया जाएगा.

इसके अलावा, लॉट के हिसाब से आवेदन करने पर भी यह ज़रूरी नहीं है कि आपको एक बार में उतने ही शेयर मिलें, जितने आपने माँगे हैं.

शेयरों का आवंटन इस बात पर निर्भर करेगा कि कुल कितने शेयर उपलब्ध हैं और कितने लोगों ने बोली लगाई है.

कंपनी की ओर से आवंटित शेयर इश्यू बंद होने के 5 दिनों के अंदर निवेशकों के डीमैट अकाउंट में जमा कर दिए जाएंगे.

एनएसई की इमारत

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समस्या हो तो शिकायत किससे करें?

अगर शेयर जारी करने में कोई ग़लती होती है या पैसे वापस मिलने में कोई परेशानी होती है, तो आईपीओ जारी करने वाली कंपनी के शिकायत विभाग से संपर्क करना चाहिए.

अगर वहां से समस्या का समाधान नहीं होता है, तो सेबी में शिकायत करनी चाहिए.

पूरी जानकारी के साथ शिकायत इस पते पर भेजनी चाहिए: ऑफ़िस ऑफ़ इन्वेस्टर असिस्टेंस एंड एजुकेशन, सेबी – प्लॉट नंबर C4-A, G ब्लॉक, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स, बांद्रा (पूर्व), मुंबई

नागेंद्र साई कुंदावरम

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क्या आईपीओ के बाद एनएसई अपने ही प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेडिंग करेगा?

आईपीओ के ज़रिए बाज़ार में आने वाली लगभग सभी कंपनियां एनएसई और बीएसई के प्लेटफ़ॉर्म पर लिस्ट होती हैं और उनके शेयरों में ट्रेडिंग होती है.

हालांकि, 17 सितंबर को आईपीओ लाने वाला एनएसई अपने ही प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेडिंग नहीं करेगा.

इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक़, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने अपने शेयरों में अपने ही प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेडिंग करने के लिए सेबी से मंज़ूरी नहीं मांगी है.

एक्सचेंज के एमडी और सीईओ आशीष चौहान ने पिछले हफ़्ते यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि एनएसई नियमों का पालन करेगा.

बिज़नेस विशेषज्ञ नागेंद्र साई कुंदावरम ने कहा, “सेबी के नियमों के अनुसार, शेयर बाज़ार सिर्फ़ व्यवस्था चलाने वाली संस्था है. इसलिए इस कंपनी के लिए बाज़ार में कारोबारी और रेफ़री, दोनों की भूमिका निभाना मुश्किल है. नियमों का पालन करना, अंदर की जानकारी के आधार पर ट्रेडिंग रोकना और निगरानी करना कठिन है. पारदर्शिता की कमी का ख़तरा रहता है. शेयरों की क़ीमतों को प्रभावित करने वाली चीज़ों को नियंत्रित करना भी मुश्किल है.”

“इसी वजह से एनएसई के शेयरों की ट्रेडिंग नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर नहीं हो सकती. वे बीएसई पर लिस्ट होंगे और वहीं ट्रेडिंग होगी. ध्यान देने वाली बात यह है कि बीएसई के शेयरों की ट्रेडिंग एनएसई पर भी होती है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS