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देश के सबसे बडे़ कारोबारी समूह टाटा की सबसे बड़ी होल्डिंग कंपनी टाटा सन्स की शेयर बाज़ार में लिस्टिंग का मामला पेचीदा होता जा रहा है.
टाटा सन्स में टाटा ट्रस्ट्स की 66 फ़ीसदी हिस्सेदारी है. टाटा सन्स की बोर्ड बैठक में निदेशकों ने कंपनी की लिस्टिंग की तैयारियों की मंज़ूरी दे दी थी. लेकिन टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसका विरोध किया है.
सवाल ये है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन टाटा सन्स की लिस्टिंग के ख़िलाफ़ क्यों हैं?
ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ”विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक़ शेयर बाज़ार में लिस्ट होने पर टाटा सन्स का मूल्यांकन 120 अरब डॉलर से ज़्यादा हो सकता है, जिससे यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बन जाएगा. इससे टाटा समूह के स्वामित्व और संचालन व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा, जो एक सदी से भी ज़्यादा समय से कुछ चुनिंदा हाथों में रही है.”
टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक़ 17 सितंबर को टाटा सन्स की बोर्ड बैठक में ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा सन्स की लिस्टिंग पर सहमति नहीं दी.
उन्होंने कहा कि टाटा सन्स और टाटा ग्रुप एक सदी से भी अधिक पुराने ने क़ारोबारी ढांचे को बनाए रखना चाहता है.
राष्ट्रहित का हवाला
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ट्रस्ट्स के मुताबिक़ नोएल टाटा ने बोर्ड की बैठक में कहा कि 2024 में रतन टाटा की अगुआई में हुई एक बैठक में ये फ़ैसला किया गया था कि कंपनी को अनलिस्टेड ही रहना चाहिए. सर रतन जी टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी ट्रस्ट भी कंपनी को अनलिस्टेड रखने के समर्थक थे.
उन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप के काम करने के ढांचे को अनूठा बनाने वाली चीज़ ये है कि यह ट्रस्ट के तहत काम करता है. इसका बहुमत शेयरधारक एक चैरिटी है, जो अपने हिस्से के डिविडेंड से अस्पताल, यूनिवर्सिटी और रिसर्च करने के लिए धन देती है.
इसका मक़सद सार्वजनिक हित और राष्ट्र निर्माण है.
उन्होंने कहा कि ये सिर्फ़ भावना की बात नहीं है. यही इस हाउस का ऑपरेटिंग मॉडल है.
नोएल टाटा ने कहा कि पिछली एक सदी से अधिक समय से ये इस कसौटी पर खरा उतरा है. नोएल का कहना है कि लिस्टिंग इस ग्रुप के मूल चरित्र को ख़त्म कर देगी. लिस्टिंग ग्रुप के इस सिद्धांत की जड़ पर चोट करेगी.
अधिकारों में कटौती की आशंका
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टाटा सन्स का प्रमुख काम टाटा ग्रुप की कंपनियों में निवेश करना और उनका समर्थन करना है.
द हिंदू के मुताबिक़ अगर टाटा सन्स शेयर बाज़ार में लिस्ट हो जाती है तो बहुमत शेयरधारक होने के नाते टाटा ट्रस्ट्स के अधिकारों पर गंभीर असर पड़ सकता है.
लिस्ट होने के बाद कंपनी को संस्थागत और विदेशी निवेशकों के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा. ज़ाहिर है, उन निवेशकों का हित इसमें होगा कि उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा मिले.
ट्रस्ट्स का दावा है कि ऐसे निवेशक फौरी मुनाफ़ा चाहेंगे.
ऐसे शेयरहोल्डर्स ग्रुप की संकट में फंसी किसी कंपनी को बचाने या किसी नए ग्रीनफील्ड (नए) वेंचर्स के लिए फंडिंग को शायद ही मंजूरी देंगे, जिसका रिटर्न 15 साल बाद मिलने की उम्मीद है.
पुराने गवर्नेंस मॉडल के समर्थक
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लिस्टिंग का समर्थन करने वालों का मानना है कि नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स और इसकी बहुमत हिस्सेदारी वाली कंपनियों का पुराना मॉडल बचाए रखना चाहते हैं.
लिस्टिंग के समर्थक कहते हैं कि देश के सबसे बड़े क़ारोबारी समूह को ज़्यादा पारदर्शी दिखना होगा.
टाटा ट्रस्ट्स में 18 फ़ीसदी हिस्सेदारी रखने वाले शपूरजी पलोनजी ग्रुप के चेयरमैन शपूरजी पलोनजी मिस्त्री ने लिस्टिंग के पक्ष में आरबीआई के फ़ैसले का समर्थन किया है.
उन्होंने कहा है कि पारदर्शिता, जवाबदेही, निष्पक्षता और ज़िम्मेदारी के साथ संस्थान निर्माण के लिए लिस्टिंग ज़रूरी है.
उन्होंने कहा कि एक पारदर्शी और जनता के प्रति अधिक ज़िम्मेदारी से भरा ग्रुप ट्रस्ट्स के मूल्यों को ज़्यादा साफ़ तरीक़े से सामने ला सकता है.
ये निवेशकों के हितों की रक्षा ज़्यादा अच्छे तरीक़े से कर सकता है और समानता के आधार पर डिविडेंड पॉलिसी तय कर सकता है.
मिस्त्री ने एक और बात पर ज़ोर दिया है कि टाटा ट्रस्ट्स एक चैरिटी है. टाटा सन्स को लिस्ट किया जाए तो ये आने वाली कई पीढ़ियों तक परोपकार की ज़िम्मेदारियों को निभा सकती है.
क़र्ज़ मुक्त कंपनी की चाह
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टाटा सन्स एक क़र्ज़ मुक्त कंपनी है. मार्च 2024 की एक बोर्ड बैठक में कंपनी को अनलिस्टेड रखने के अपने फ़ैसले को बरकरार रखते हुए इसने बड़ा क़दम उठाया.
इसने 20 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ चुकाया और प्रेफ़रेंस शेयरधारकों को उनकी हिस्सेदारी के बदले पैसे दे दिए. इसके लिए कंपनी ने अपने आंतरिक संसाधनों और समूह की हिस्सेदारी को भुनाकर जुटाई गई रक़म का इस्तेमाल किया.
टाटा संस ने आगे और क़र्ज़ न लेने का भी फ़ैसला किया और नोएल टाटा के मुताबिक़, मार्च 2024 से वह इस फ़ैसले पर कायम है.
नोएल टाटा के मुताबिक़, “कोई कंपनी सिर्फ़ दिखावे को बचाए रखने के लिए 20,000 करोड़ रुपये ख़र्च नहीं करती. वह ऐसा अपनी बुनियाद को बचाए रखने के लिए करती है.”
अतिरिक्त रेग्युलेशन से बचने की कोशिश
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आरबीआई ने टाटा सन्स को स्केल-बेस्ड रेग्युलेशन के तहत अपर लेयर एनबीएफसी के तौर की कैटिगरी में रखा है.
आरबीआई के इस फ्रेमवर्क के तहत ऐसी कंपनियों के लिए अतिरिक्त रेग्युलेटरी शर्तें लागू होती हैं. टाटा सन्स ने कहा था कि कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर उसका रजिस्ट्रेशन वापस ले ले लिया जाए.
लेकिन आरबीआई ने 11 सितंबर 2026 को इस अनुरोध को ख़ारिज कर दिया और टाटा सन्स को ज़रूरी रेग्युलेटरी नियमों को मानने की दिशा में आगे बढ़ने को कहा.
इसके बाद टाटा सन्स पर लिस्टिंग का दबाव बढ़ने लगा. लेकिन टाटा सन्स लिस्टिंग के बाद इस अतिरिक्त रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क में नहीं आना चाहती है.
नोएल टाटा शायद यही सोचकर लिस्टिंग का समर्थन नहीं कर रहे हैं.
लिस्टिंग से बचने के लिए क्या हो सकते हैं रास्ते
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विश्लेषकों के मुताबिक़ टाटा सन्स पब्लिक लिस्टिंग से बचने के कई रास्ते अपना सकती है.
इनमें से अपनी ऐसेट्स या शेयरहोल्डिंग की रीस्ट्रक्चरिंग से लेकर नीतियों में बदलाव को छूट देने की मांग शामिल है.
इसके अलावा वो आरबीआई के फ़ैसले को अदालत में चुनौती भी दे सकती है.
बिजनेस स्टैंडर्ड को एक पूर्व रेग्युलेटरी अधिकारी ने बताया है कि एक संभावित रास्ता ये हो सकता है कि टाटा सन्स से जुड़े ऐसेट बेस को एक लाख करोड़ रुपये की उस सीमा से नीचे लाया जाए, जिसके आधार पर किसी कंपनी को अपर लेयर एनबीएफसी की कैटिगरी में रखा जाता है.
आरबीआई के रेग्युलेशन के तहत अपर लेयर एनबीएफ़सी को इस कैटिगरी में आने के तीन साल के भीतर ख़ुद को शेयर बाज़ार में अनिवार्य तौर पर लिस्टिंग कराना होता है.
इस अधिकारी ने अख़बार से कहा कि अगर टाटा सन्स इस कैटिगरी से हट जाती है तो लिस्टिंग अनिवार्य नहीं होगी.
बिज़नेस स्टैंडर्ड के मुताबिक़ टाटा सन्स शेयरहोल्डिंग पैटर्न की री-स्ट्रक्चरिंग कर सकती है. वो शपूरजी पलोनजी की 18 फ़ीसदी हिस्सेदारी ख़रीद सकती है. इससे शेयरहोल्डिंग पैटर्न बदल जाएगा. ये लिस्टिंग की अनिवार्यता तो ख़त्म नहीं करेगा लेकिन रेग्युलेटर के साथ टाटा सन्स की स्थिति मज़बूत कर सकता है.
एक और विकल्प ये हो सकता है कि लिस्टिंग से छूट मांगने के बजाय ये कहा जाए कि लिस्टिंग की तैयारी और ज़रूरी कंप्लायंस के लिए इसे और समय चाहिए. हालांकि इससे इसे ज़्यादा समय तक टालना संभव नहीं होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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