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राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की क्या है ज़मीनी हक़ीक़त? – ग्राउंड रिपोर्ट

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Source :- BBC INDIA

राहुल गांधी बात करते हुए

इमेज स्रोत, ANI

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18 सितंबर, रात के क़रीब 11 बजने वाले हैं. खाने-पीने के लिए मशहूर इंदौर का सर्राफा मार्केट रोज़ाना की तरह गुलज़ार है. मुख्य सड़क के दोनों तरफ़ खाने के स्टॉल सजे हैं और लोगों की भीड़ है.

इसी भीड़ के बीच स्टूडेंट्स का एक झुंड बार-बार मुख्य सड़क के चक्कर लगा रहा है और तालियों की थाप के साथ नारे लगा रहा है – “गूंज है भाई गूंज है, छात्रों की गूंज है.”

यही स्टूडेंट्स कुछ देर पहले गिटार के साथ जैमिंग सेशन कर रहे थे और युवाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे.

बात करने पर पता चला कि ये सभी युवा यूथ कांग्रेस से जुड़े हैं और बीते 15 दिनों से शहर के अलग-अलग हिस्सों में जाकर स्टूडेंट्स को जोड़ रहे हैं, ताकि राहुल गांधी के “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम को ‘हिट’ बनाया जा सके.

लेकिन क्या युवा वाक़ई राहुल गांधी के इस कार्यक्रम से ख़ुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं? अलग-अलग शहरों में पेपर लीक से लेकर, परीक्षा में अनियमितता, महंगी होती पढ़ाई, बेरोज़गारी, यहां तक कि पितृसत्ता को उखाड़ फेंकने की बात करने वाले राहुल गांधी की बातों को युवा कैसे देखते हैं? और क्या यही है- छात्रों की असली गूंज?

छात्रों की गूंज कार्यक्रम

ये समझने के लिए हमने इंदौर में आयोजित हुए ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को कवर किया. यहां पहुंचने वाले युवाओं से बात की और उन युवाओं से भी जो शहर के अलग-अलग इलाक़ों में रहते हैं.

तो 19 सितंबर यानी इंदौर में जिस दिन राहुल गांधी का कार्यक्रम हुआ, उस दिन मैं शहर के भंवरकुआं इलाक़े में गई. मुझे बताया गया था कि यहां बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स रहते हैं.

मेरी मुलाक़ात यहां ऐसी कई छात्राओं से हुई जो राहुल गांधी के इंदौर आने और यहां पर स्टूडेंट्स से संवाद करने को लेकर खुश नज़र आईं.

स्टूडेंट्स के बीच पुणे में दिया राहुल गांधी का भाषण चर्चा का विषय था.

उन्होंने हमसे कहा कि पुणे के कार्यक्रम में राहुल गांधी ने पितृसत्ता को कुचलने की जो बात कही है, वो कभी किसी नेता ने नहीं की और वो इससे काफ़ी खुश हैं.

एक छात्रा ने मुझसे कहा, ”मुझे तब बहुत खुशी हुई जब राहुल गांधी ने हमें एक इंडिविजुअल के तौर पर देखा. कहा कि हम किसी की बेटी, बहू या पत्नी भर नहीं हैं. ये दुर्लभ है. हमें ही नहीं, हमारे ग्रुप की सारी लड़कियों को उनकी इस बात ने प्रभावित किया है.”

छात्राओं में चर्चा

छात्राओं के बीच इस कार्यक्रम को लेकर काफ़ी दिलचस्पी देखी गई है

लड़कियों के कई ग्रुप्स ऐसे भी मिले जो कार्यक्रम स्थल पर जाने की तैयारी में थीं. इनमें से कुछ केवल राहुल गांधी को देखना चाहती थीं, तो कुछ इस उम्मीद के साथ वहां पहुंचना चाह रही थीं कि आज राहुल गांधी स्टूडेंट्स के मुद्दे उठाने जा रहे हैं.

एक छात्र जो मध्य प्रदेश राज्य की सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं. उन्होंने हमसे कहा कि इतने सालों से स्टूडेंट्स अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे थे. विपक्ष ने कभी उस स्तर पर उनका साथ नहीं दिया. लेकिन आज राहुल गांधी ये कार्यक्रम कर रहे हैं तो उन्हें खुशी है. वो कहते हैं, ”देर आए, पर दुरुस्त आए”.

कुछ ऐसे स्टूडेंट्स से भी मुलाक़ात हुई जिन्होंने हमसे कहा कि उन्हें ऐसे कार्यक्रमों से कोई उम्मीद नहीं, क्योंकि आख़िर में उनके भविष्य की ज़िम्मेदारी उनके ही कंधों पर है.

एमपीपीएससी की तैयारी करने वाले एक छात्र कहते हैं, “हमारे माता-पिता ने कांग्रेस को सत्ता से हटाया ताकि जो नई सरकार आए वो हमारे लिए कुछ अच्छा करे, लेकिन आज भी वही तस्वीर है. पेपर लीक हो रहे हैं, हमारा भविष्य दाव पर है और कोई इसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है.”

यह छात्र दिल्ली में हुए सीजेपी प्रोटेस्ट का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, ”तीन महीने लग गए सरकार को केवल जवाबदेही स्वीकार करने में इसलिए हमने अब उनसे उम्मीद खो दी है. राहुल गांधी से भी बहुत अधिक आशा नहीं है क्योंकि सत्ता में आने के बाद सब एक जैसे हो जाते हैं, पर इस बात को लेकर तसल्ली ज़रूर है कि हमारे मुद्दे उठ रहे हैं. हम जिन परेशानियों से गुज़र रहे हैं, उस पर चर्चा हो रही है.”

जेन ज़ी को लुभाने के लिए कॉन्सर्ट

छात्रों की गूंज

राहुल गांधी ने बीती 19 सितंबर की तारीख़ को इंदौर के आईडीए मैदान में ‘छात्रों की गूंज’ का जो कार्यक्रम किया, वह इसका छठा पड़ाव था. इससे पहले उन्होंने कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में ये कार्यक्रम किए.

इस कार्यक्रम को राहुल गांधी और स्टूडेंट्स के बीच संवाद के रूप में डिज़ाइन किया गया है. स्टूडेंट्स, ख़ासकर जेन ज़ी की भागीदारी इस कार्यक्रम में बढ़े इसके लिए रैप सॉन्ग, कूल मर्चेंडाइज़, सिंगिंग और डांस परफॉर्मेंस का सहारा लिया जाता है.

कार्यक्रम के शुरुआती दो घंटों में कल्चरल इवेंट्स चलते हैं और फिर जाकर कभी जींस-टीशर्ट, तो कभी शर्ट-ट्राउज़र में राहुल गांधी की एंट्री होती है.

इन कल्चरल इवेंट्स को लेकर युवाओं में हमें मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली. कुछ जहां इसे युवाओं को जोड़ने और कार्यक्रम तक लाने की बेहतर ट्रिक बताते हैं.

वहीं कुछ का कहना है कि स्टूडेंट्स अपना कीमती वक़्त लगाकर जब यहां आ रहे हैं तो कुछ गंभीर और महत्वपूर्ण चीज़ों पर ज़्यादा से ज़्यादा चर्चा चाहते हैं, वो चाहते हैं कि उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सुना जाए. इसलिए कॉन्सर्ट आधे घंटे तक ठीक है, पर उसके बाद स्टूडेंट्स को सुनने पर फ़ोकस करने की ज़रूरत है.

‘पितृसत्ता का शिकार राहुल गांधी भी’

छात्रा

इनमें से एक छात्रा से जब हमने पूछा कि वह पुणे में दिए राहुल गांधी के भाषण को कैसे देखती हैं. जवाब में उन्होंने कहा, ”मैंने वो इवेंट पूरा देखा और मुझे बहुत अच्छा लगा कि सर ने इस मुद्दे को उठाया. लेकिन सच कहूं तो केवल पितृसत्ता को उखाड़ फेंकने की बात करने से पितृसत्ता ख़त्म नहीं हो जाती.”

“आज सर की जगह उस स्टेज पर प्रियंका मैम भी हो सकती थीं, लेकिन सर ही क्यों हैं? तो पितृसत्ता के शिकार हम सब हैं, मैं खुद हूं. हमारा पूरा समाज है.”

“अभी आप देखिए कि रात के आठ बज गए हैं इसलिए लड़कियां निकलनी शुरू हो गई हैं, ये क्यों निकल रही हैं, ताकि सुरक्षित घर पहुंचे. इन्हें अलग क्यों बिठाया गया ताकि ये सुरक्षित रह सकें, उनके साथ कोई बदसलूकी न हो भीड़ में, तो ये सब ख़त्म होने में लंबा वक़्त लगेगा. पर हां, ये अच्छी पहल है. हम कम से कम इस पर बात तो कर रहे हैं.”

‘झूठ की गूंज’

राहुल गांधी का पोस्टर

राहुल गांधी को सुनने के लिए सुदूर इलाक़े से आया 70 छात्राओं का एक समूह हमें मिला. ये सभी नर्सिंग की छात्राएं हैं. इन्होंने हमसे कहा कि उनकी परीक्षा समय पर नहीं होती, चार साल की डिग्री पूरी करने में 8 साल लग जाते हैं, वह अपनी इस समस्या को राहुल गांधी के सामने रखना चाहती थीं, पर बात नहीं हो पाई.

ऐसा भी नहीं है कि ये भीड़ केवल स्टूडेंट्स की है. बड़ी संख्या में कांग्रेस के कार्यकर्ता भी इसमें हिस्सा लेते हैं, बस इतना ध्यान रखा जाता है कि वह सभी 35 वर्ष के नीचे हों.

बीच-बीच में राजनीतिक नारे भी सुनाई देते हैं. जैसे कार्यक्रम से बाहर की तरफ़ निकलने के दौरान ज़ोर-ज़ोर से राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनाने से जुड़े नारे लग रहे थे. इन्हीं में से एक छात्र दुल्हन के कपड़े में ‘मेलोडी-मेलोडी’ करता हुआ गुज़रा.

पत्रकारों के बीच एक चर्चा इस बात को लेकर भी थी कि राहुल गांधी से जिन स्टूडेंट्स ने मंच पर बात की और अपनी समस्या ज़ाहिर की, उनमें से कुछ एनएसयूएआई से जुड़े हुए थे. हम इस दावे की स्वतंत्र तौर पर पुष्टी नहीं कर पाए हैं.

पर बीजेपी ने भी इसे लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी को घेरा है. बीजेपी इस कार्यक्रम को ‘झूठ की गूंज’ बता रही है.

वहीं कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने हमसे कहा कि युवा राहुल गांधी को अपना नेता मानते हैं. वह उनके मुद्दे उठा रहे हैं और ये युवाओं को समझ आ रहा है.

नीरजा चौधरी

क्या कह रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार

इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद तिवारी पिछले करीब तीन दशक से शहर की राजनीति और सामाजिक घटनाओं को कवर कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने पहली बार इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में जुटते देखा है.

तिवारी के मुताबिक़, “शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं और सरकारी नौकरियों में भर्तियां स्टूडेंट्स के लिए बड़े मुद्दे बन चुके हैं. परीक्षाएं रद्द होना, वैकेंसी का इंतज़ार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी चिंताएं स्टूडेंट्स में बेचैनी पैदा कर रही हैं.”

उनका मानना है कि ऐसे में जो भी स्टूडेंट्स की बात सुनने की कोशिश करेगा, स्टूडेंट्स उसके कार्यक्रम तक पहुंचेंगे.

वो आगे कहते हैं, ”इंदौर लंबे समय से बीजेपी का मज़बूत गढ़ रहा है. ऐसे में विधानसभा चुनाव से क़रीब ढाई साल पहले कांग्रेस के लिए युवाओं और खासकर उस नई पीढ़ी तक पहुंच बनाना अहम है, जिसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि वो पारंपरिक राजनीति और राजनीतिक दलों से दूरी बनाए हुए है.”

अरविंद तिवारी

डूसू चुनाव में हार

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी भी मानती हैं कि राहुल गांधी के इस कार्यक्रम को अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. फ़ोन पर हुई बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा, ”राहुल गांधी इसके ज़रिए केवल स्टूडेंट्स को ही नहीं, बल्कि उनकी अलग-अलग पृष्ठभूमि, सामाजिक बैकग्राउंड, जाति, लिंग और धर्म को अड्रेस करते हुए अलग-अलग सामाजिक समूहों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं.”

”जैसे, उन्होंने पितृसत्ता की बात की, ताकि छात्राओं को अड्रेस किया जा सके, क्योंकि स्टूडेंट की समस्या केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं होती. अगर वो दलित है तो उसकी अलग समस्या है, महिला है तो अलग और अल्पसंख्यक है तो अलग. आपने देखा होगा, पिछले कार्यक्रम में उन्होंने मनुस्मृति का ज़िक्र किया. तो इसके पीछे रणनीति दलितों को साधने की थी.”

अरविंद तिवारी कहते हैं, ”स्टूडेंट्स के मुद्दे को उठाना वक़्त की मांग है और राहुल गांधी ने इसमें बाज़ी मार ली है.”

लेकिन इंदौर वाले कार्यक्रम के दिन ही दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों के नतीजे आए और इन नतीजों ने एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की.

डूसू चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को कोई कामयाबी नहीं मिली. इन परिणामों ने सवाल खड़े किए कि क्या ‘छात्रों की गूंज’ में दिख रही युवाओं की भीड़ को युवाओं के बीच राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता के तौर पर देखा जा सकता है?

या फिर ये कार्यक्रम स्टूडेंट्स की समस्याओं को आवाज़ देने का एक मंच भर है?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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SOURCE : BBC NEWS