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एक स्कूल से रिटायर्ड 89 साल के प्रिंसिपल के बैंक खातों में जमा 20.33 लाख रुपये कैश ने इनकम टैक्स डिपॉर्टमेंट के कान खड़े कर दिए। विभाग ने इस पूरी रकम को एक्स प्रिंसिपल की आय मानते हुए टैक्स के दायरे में डाल दिया, लेकिन अब आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने इस मामले में एक नया मोड़ ला दिया है।
ITAT ने कहा है कि पहले यह जांचना जरूरी है कि बैंक खाते में जमा पैसा वास्तव में पूर्व प्रिंसिपल का था या वह एक एजुकेशन सोसायटी के लिए हॉस्टल फीस के रूप में जमा किया गया था। मामला कर्नाटक के तुमकुरु से जुड़ा है और असेसमेंट इयर 2017-18 का है। बेंगलुरु ITAT ने 22 सितंबर 2026 को इस मामले में आदेश दिया है।
दो बैंक खातों में जमा हुई थी 20.33 लाख की रकम
इनकम टैक्स डिपॉर्टमेंट की नजर उस समय पड़ी जब पूर्व प्रिंसिपल के बैंक ऑफ इंडिया, तिप्तूर के दो खातों में बड़ी मात्रा में कैश जमा हुआ। एक खाते में करीब 19.23 लाख रुपये 50 से ज्यादा अलग-अलग एंट्री में जमा किए गए। वहीं दूसरे खाते में करीब 1.10 लाख रुपये चार एंट्री के जरिए जमा हुए।
टैक्स विभाग ने जब इस रकम का हिसाब मांगा तो मामला यहीं से शुरू हुआ। पूर्व प्रिंसिपल ने कहा, “यह मेरी कमाई नहीं, छात्राओं की हॉस्टल फीस थी।” पूर्व प्रिंसिपल का कहना था कि यह रकम उनकी निजी कमाई नहीं थी। वह श्री विद्यर पीठ (आर) एजुकेशन सोसायटी की ओर से चलाए जा रहे महिला हॉस्टल का मैनेजमेंट देख रहे थे।
उनके मुताबिक, हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं से फीस के रूप में पैसा जमा किया जाता था। प्रशासनिक सुविधा के कारण यह रकम उनके व्यक्तिगत बैंक खातों में जमा हुई। बाद में इसी पैसे से हॉस्टल के खर्च भी किए गए।
उनका दावा था कि हॉस्टल बिना मुनाफे के आधार पर चलाया जा रहा था। फीस और खर्च का पूरा हिसाब लगाने के बाद केवल 2,251 रुपये का सरप्लस बचा था, जिसे उन्होंने अपनी आय में शामिल कर टैक्स भी दिया था।
आयकर अधिकारी को सबूत पूरे नहीं मिले
आयकर अधिकारी इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुए। अधिकारी के सामने हॉस्टल फीस की मूल रसीदें और पूरा आय-व्यय विवरण पर्याप्त रूप से पेश नहीं किया जा सका। इसके बाद अधिकारी ने बैंक खातों में जमा पूरी 20.33 लाख रुपये की रकम को धारा 69A के तहत अनएक्सप्लेंड मनी मान लिया। बाद में इनकम टैक्स डिपॉर्टमेंट के अपीलीय अधिकारी ने भी इस जोड़ को बरकरार रखा।
ITAT ने कहा, ‘पहले पता लगाइए, पैसा किसका था?’
मामला ITAT पहुंचा तो पूर्व प्रिंसिपल ने फिर वही दलील दी कि वह सिर्फ सोसायटी की ओर से हॉस्टल फीस जमा कर रहे थे। ट्रिब्यूनल ने इस दावे को सीधे स्वीकार भी नहीं किया और न ही इनकम टैक्स डिपॉर्टमेंट की कार्रवाई को अंतिम माना। इसके बजाय मामले को फिर से जांच के लिए असेंसिंग ऑफिसर (AO) के पास भेज दिया।
अब AO को यह जांच करनी होगी कि महिला हॉस्टल वास्तव में सोसायटी की ओर से या उसके संबंध में चलाया जा रहा था या नहीं। इसके साथ यह भी देखा जाएगा कि हॉस्टल की फीस की रसीदें सोसायटी के नाम से जारी हुई थीं या नहीं और क्या उन रसीदों को सोसायटी की किताबों में दर्ज किया गया था।
रिकॉर्ड में पैसा मिला तो पूर्व प्रिंसिपल को राहत
ITAT ने साफ किया है कि अगर जांच में यह साबित हो जाता है कि हॉस्टल से मिली रकम वास्तव में सोसायटी की थी और सोसायटी की अकाउंट बुक में उसका पूरा हिसाब दर्ज था, तो पूर्व प्रिंसिपल के हाथ में की गई 20.33 लाख रुपये की पूरी जोड़ को हटाना होगा, लेकिन अगर फीस की रसीदें सोसायटी के नाम पर नहीं मिलीं या रकम सोसायटी की किताबों में दर्ज नहीं पाई गई, तो पूर्व प्रिंसिपल को यह समझाना होगा कि 20.33 लाख रुपये की कुल फीस में से खर्च निकालने के बाद सिर्फ 2,251 रुपये ही कैसे बचे। यानी ITAT ने सिर्फ यह मानकर राहत नहीं दी कि पैसा किसी और संस्था का था। अब इस दावे को दस्तावेजों और खातों से साबित करना होगा।
666 दिन की देरी भी हुई माफ
इस मामले में एक और दिलचस्प बात रही। पूर्व प्रिंसिपल ने ITAT में अपील दाखिल करने में 666 दिन की देरी की थी। ट्रिब्यूनल ने उनकी उम्र 89 वर्ष होने और उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य एवं चलने-फिरने की दिक्कतों को देखते हुए देरी को माफ कर दिया। ITAT ने अपील को स्टैटिस्टिकल पर्पज के लिए स्वीकार करते हुए 20.33 लाख रुपये की टैक्स जोड़ से जुड़े मामले को दोबारा जांच के लिए AO के पास भेज दिया।
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