Home National news hindi ट्रंप-शी मुलाक़ात क्या वाकई उतनी गर्मजोशी भरी थी जितनी दिखाई दी?

ट्रंप-शी मुलाक़ात क्या वाकई उतनी गर्मजोशी भरी थी जितनी दिखाई दी?

6
0

Source :- BBC INDIA

शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की बातचीत के बाद कोई साझा बयान जारी नहीं हुआ.

चीन ने सोमवार को इस बारे में कुछ और जानकारी दी कि पिछले हफ़्ते शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाक़ात में किन बातों पर सहमति बनी थी.

इससे बैठक के कुछ ठोस नतीजों का पता चला. लेकिन दोनों देशों ने कोई साझा बयान जारी नहीं किया और बातचीत में कोई बड़ी सफलता भी नहीं मिली.

इसके बजाय दोनों सरकारों ने मुलाक़ात का अपना-अपना ब्यौरा जारी किया.

यह शायद इस बात का संकेत है कि व्हाइट हाउस की सैर और रिश्तों में गर्मजोशी लाने के वादों के बावजूद वॉशिंगटन और बीजिंग अब भी एक-दूसरे को लेकर सतर्क हैं.

इस बातचीत के बारे में चार बातें अब सामने आई हैं. हालांकि, कुछ सवालों के जवाब अब भी नहीं मिले हैं.

एआई पर नई बातचीत की सहमति

व्हाइट हाउस में (बाएं से) चीन की फ़र्स्ट लेडी पेंग लियुआन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की फ़र्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप (तस्वीर: 25 सितंबर, 2026)

बीजिंग का कहना है कि चीन और अमेरिका एआई पर नई बातचीत शुरू करने के लिए तैयार हो गए हैं. इस मुद्दे पर अगली बैठक नवंबर के आख़िर में होगी.

दोनों देशों के बीच आधुनिक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तैयार करने की होड़ चल रही है.

एआई का इस्तेमाल कारोबार से लेकर सेना की योजनाएं बनाने तक में बढ़ रहा है. ऐसे में नई बातचीत से संकेत मिलता है कि दोनों देश इस तकनीक के लिए कुछ सुरक्षा सीमाएं तय करने की ज़रूरत महसूस कर रहे हैं.

दोनों देश एआई से जुड़ी घटनाओं की जानकारी एक-दूसरे को देने के लिए एक संपर्क व्यवस्था बनाने पर भी सहमत हुए हैं.

इसका मक़सद यह है कि किसी ग़लतफ़हमी या अचानक हुई घटना के कारण दोनों देशों के बीच बड़ा टकराव न हो जाए.

इस बैठक पर नज़र रखने वाले लोग देखना चाहते थे कि एआई को लेकर कोई समझौता होता है या नहीं.

इसकी एक वजह यह थी कि एंथ्रोपिक जैसी अमेरिकी कंपनियां एआई के विकास की रफ़्तार धीमी करने की मांग कर चुकी हैं.

इसके अलावा ऐसी बातें भी सामने आई हैं कि ओपनएआई ने ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की सरकारी वेबसाइटों तक बिना अनुमति पहुंच बनाई थी और अमेरिका की कई सरकारी एजेंसियों की वेबसाइटों में भी “दख़ल” दिया था.

व्यापारिक समझौता बढ़ा, लेकिन कई सवाल बाक़ी

चीन के सरकारी मीडिया ने सोमवार को पहली बार इसकी पुष्टि की कि दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर हुआ अस्थायी समझौता 10 जनवरी तक बढ़ा दिया गया है.

इस थोड़े समय के विस्तार से यह तय हो गया है कि इस साल के आख़िर में होने वाले दो बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में दोनों नेता फिर मिलेंगे.

ट्रंप नवंबर में चीन के शेनझेन में होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग यानी एपेक शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे.

वहीं, शी जिनपिंग दिसंबर में जी20 शिखर सम्मेलन के लिए मियामी जाएंगे.

दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं का इतनी जल्दी-जल्दी मिलना आम बात नहीं है.

चीन चाहता था कि व्यापारिक समझौते को इससे कहीं लंबे समय के लिए बढ़ाया जाए. इसलिए दो महीने की यह राहत बड़ी सफलता के बजाय एक छोटी उपलब्धि मानी जा रही है.

चीन को अमेरिका भेजे जाने वाले 30 अरब डॉलर यानी 23 अरब पाउंड के सामान पर टैरिफ़ कम कराने में सफलता मिली है. उम्मीद है कि इसके बदले चीन भी अमेरिकी सामान पर टैरिफ़ घटाएगा.

अमेरिका जाने वाले चीनी खिलौनों, छोटे घरेलू उपकरणों और क्रिसमस की सजावट के सामान पर अब कम टैरिफ़ लगेगा.

ट्रंप प्रशासन ने यह भी कहा है कि चीन 2027 और 2028 में हर साल कम से कम एक करोड़ मीट्रिक टन कोयला ख़रीदेगा.

लेकिन इस समझौते में शामिल बातों से ज़्यादा ध्यान उन मुद्दों पर जा रहा है, जिनका ज़िक्र ही नहीं किया गया.

अमेरिका को चीन से मिलने वाले दुर्लभ खनिजों यानी रेयर अर्थ मिनरल्स का निर्यात बढ़ाने की कोई बात नहीं हुई.

इस बात का भी कोई संकेत नहीं मिला कि आधुनिक अमेरिकी सेमीकंडक्टरों पर लगी पाबंदियों में ढील दी जाएगी.

अमेरिका की दुकानों में जाने वाले चीनी खिलौनों को टैरिफ़ में कटौती का फ़ायदा मिलेगा.

अमेरिका ने ताइवान का ज़िक्र नहीं किया, चीन ने किया

व्हाइट हाउस की ओर से जारी जानकारी में ताइवान का कोई ज़िक्र नहीं था. लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए यह मुद्दा साफ़ तौर पर अहम था.

चीन की ओर से जारी बैठक के ब्यौरे के मुताबिक़, शी जिनपिंग ने डोनाल्ड ट्रंप से कहा कि अमेरिका को औपचारिक रूप से ताइवान की आज़ादी का विरोध करना चाहिए और इस मुद्दे पर सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.

मई में दोनों नेताओं की पिछली मुलाक़ात के बाद ट्रंप ने बताया था कि शी जिनपिंग ने उनसे सीधे पूछा था कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया तो क्या अमेरिका उसकी रक्षा करेगा.

ट्रंप ने पत्रकारों से कहा था, “इसका जवाब केवल एक व्यक्ति जानता है और वह मैं हूं.”

उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि क्या ताइवान के मुद्दे पर युद्ध लड़ने के लिए अमेरिकी सेना का “9,500 मील दूर जाना” ठीक होगा.

लेकिन इस बार ट्रंप ने बहुत कम जानकारी दी.

उन्होंने सप्ताहांत में पत्रकारों से कहा, “हमने इस पर बहुत ज़्यादा बात नहीं की.”

ट्रंप ने कहा, “फ़िलहाल सब ठीक है. चीज़ें अपने तरीक़े से आगे बढ़ रही हैं. वह अच्छी तरह जानते हैं कि मैं इस बारे में क्या सोचता हूं.”

इस मुद्दे पर ट्रंप की चुप्पी अहम हो सकती है.

ट्रंप इससे पहले ताइवान के लिए प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के अमेरिकी हथियार पैकेज को चीन के साथ बातचीत में “एक बहुत अच्छा सौदेबाज़ी का ज़रिया” बता चुके हैं.

यह हथियार पैकेज कई महीनों से रुका हुआ है.

इस मामले में उस समय भ्रम और बढ़ गया, जब चीन में अमेरिका के राजदूत डेविड परड्यू ने फ़ॉक्स न्यूज़ से कहा कि शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने शी जिनपिंग को हथियार बेचने की पेशकश की थी.

बाद में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने सफ़ाई दी कि अमेरिकी क़ानून चीन को हथियार बेचने की अनुमति नहीं देता और ऐसी कोई योजना भी नहीं है.

चीन अपने आप शासन करने वाले ताइवान को अपना हिस्सा मानता है.

अमेरिका समेत दुनिया के ज़्यादातर देश ताइवान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देते.

लेकिन वॉशिंगटन ताइवान पर ताक़त के ज़रिए क़ब्ज़ा करने की किसी भी कोशिश का विरोध करता है. अमेरिका ताइवान को हथियार देने के लिए भी प्रतिबद्ध है.

शी जिनपिंग के लिए ताइवान का मुद्दा साफ़ तौर पर प्राथमिकता में था.

क्या चीन विदेशी निवेश के लिए दरवाज़े खोल रहा है?

चीन का कहना है कि वह अमेरिका के समर्थन वाले बैंकों, निवेश कंपनियों और बीमा कंपनियों समेत और ज़्यादा विदेशी वित्तीय संस्थानों को देश में कारोबार करने और दफ़्तर खोलने के लिए आवेदन करने की अनुमति देगा.

हालांकि, उनकी अर्ज़ियों को मंज़ूरी चीन के क़ानूनों और नियमों के तहत ही मिलेगी.

यही आख़िरी बात सबसे अहम है. चीन दरवाज़ा तो खोल रहा है, लेकिन अंदर किसे आने देना है, इसका फ़ैसला उसी के हाथ में रहेगा.

विदेशी वित्तीय कंपनियां लंबे समय से शिकायत करती रही हैं कि चीन में नियमों की रुकावट, लाइसेंस लेने की शर्तें और देश छोड़ने पर रोक लगने का डर उनके लिए कारोबार बढ़ाना मुश्किल बना देते हैं.

तकनीकी रूप से बाज़ार में कारोबार करने की अनुमति मिलने के बाद भी उन्हें इन परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

बीजिंग ने यह भी कहा है कि दोनों देशों के बीच उड़ानों की संख्या बढ़ाने के तरीक़ों पर चर्चा हो रही है. लेकिन यह कैसे होगा, इसकी जानकारी किसी भी पक्ष ने नहीं दी है.

चीन दुनिया के 75 से ज़्यादा देशों के नागरिकों को बिना वीज़ा प्रवेश की सुविधा दे चुका है. लेकिन अमेरिकियों को अब तक यह सुविधा नहीं मिली है.

दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने चीन की यात्रा को अब भी ‘लेवल दो’ की सलाह वाली श्रेणी में रखा है.

इसका मतलब है कि चीन जाने वाले लोगों को ज़्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.

अमेरिका ने इसकी वजह क़ानूनों को मनमाने तरीक़े से लागू किए जाने, लोगों के देश छोड़ने पर रोक लगाए जाने और हिरासत में लिए जाने के ख़तरे को बताया है.

इस तरह दोनों देश कारोबार और यात्रा बढ़ाने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन रास्ते की कुछ सबसे बड़ी रुकावटें अब भी अपनी जगह बनी हुई हैं.

आख़िर इस बैठक से क्या पता चला?

इस बैठक के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत बढ़ी है, लेकिन फ़िलहाल बड़े फ़ैसलों में बहुत कम बदलाव दिखाई दिया है.

आधुनिक तकनीक से लेकर ताइवान तक दोनों देशों के बीच विवाद के सबसे बड़े मुद्दे अब भी नहीं सुलझे हैं.

हालांकि, दोनों नेताओं के लिए यह नतीजा नया नहीं है.

दोनों देश बातचीत के लिए नए रास्ते बनाने का वादा करते हैं. अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर थोड़ी-बहुत रियायतें देते हैं और रिश्तों को स्थिर रखने के लिए कुछ प्रस्ताव सामने रखते हैं.

दोनों नेता रिश्तों में स्थिरता बनाए रखना चाहते हैं. लेकिन अमेरिका और चीन के लिए बातचीत जारी रखना कहीं आसान है. इसके मुक़ाबले किसी भी महाशक्ति को समझौते के लिए तैयार करना बहुत मुश्किल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट… सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

SOURCE : BBC NEWS