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सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है. इसमें हाथ में लाल प्याज़ लिए एक महिला अपनी बेटी में दिखाई दे रहे लक्षणों के बारे में बताती हैं.
वह कहती हैं, ‘अगर आपको ज़ुकाम है, तो प्याज़ को गोल काटकर मोज़े में रखिए और उसे पहनकर पूरी रात सो जाइए.’
कच्चे प्याज़ से बीमारी ठीक होने का दावा करने वाला यह कोई अकेला वीडियो नहीं है. सोशल मीडिया पर ऐसे दावे बार-बार सामने आते रहते हैं.
कुछ लोग बीमार बच्चों के माता-पिता को भी यह नुस्ख़ा आज़माने की सलाह देते हैं. दावा किया जाता है कि पैरों पर कच्चा प्याज़ रखने से ‘तेज़ बुख़ार ठीक हो जाता है’, ‘कीटाणु और बैक्टीरिया मर जाते हैं’, ‘शरीर में जमा ज़हरीले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं’ और यहां तक कि ‘ख़ून भी साफ़ हो जाता है.’
लेकिन क्या प्याज़ रखने से ऐसा कुछ हो सकता है?
प्याज़ एलियम परिवार की सब्ज़ी है और सेहतमंद खाने का हिस्सा हो सकता है.
इसमें विटामिन सी, फ़ाइबर और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. प्याज़ में क्वेरसेटिन भी होता है. यह पौधों में पाया जाने वाला एक तत्व है, जिसके सूजन कम करने वाले गुणों पर अध्ययन हुआ है.
शोध से पता चलता है कि प्याज़ में मौजूद ये तत्व दिल और पेट की सेहत के लिए फ़ायदेमंद हो सकते हैं. ये ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में भी मदद कर सकते हैं.
लेकिन प्याज़ खाने से मिलने वाले इन फ़ायदों और इस दावे में बड़ा अंतर है कि वह शरीर से ज़हरीले पदार्थ बाहर निकाल सकता है या किसी संक्रमण को ठीक कर सकता है.
अमेरिका की महामारी विशेषज्ञ और संक्रामक रोगों की जानकार डॉ. केटी सुलेटा भी कहती हैं कि प्याज़ खाने के फ़ायदों को इससे बीमारी ठीक होने के दावे से नहीं जोड़ना चाहिए.
वहीं, अमेरिका के प्याज़ उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाली नेशनल ऑनियन एसोसिएशन के मुताबिक़, प्याज़ से जुड़े ऐसे दावे 1500 के दशक से चले आ रहे हैं.
उस समय लोगों को लगता था कि कमरे में जगह-जगह प्याज़ रखने से ब्यूबोनिक प्लेग से बचा जा सकता है.
पहले लोग सूजी हुई लिम्फ़ ग्रंथियों पर भी प्याज़ रगड़ते थे. उनका मानना था कि प्याज़ शरीर में जमा ज़हरीले पदार्थों को बाहर खींच लेगा.
प्याज़ शरीर से ज़हरीले पदार्थ क्यों नहीं निकाल सकता?
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हमारी त्वचा शरीर को कीटाणुओं से बचाने वाली पहली दीवार है. विशेषज्ञों के मुताबिक़, कुछ ज़हरीले पदार्थ त्वचा के रास्ते शरीर के अंदर जा सकते हैं. लेकिन वे इसी रास्ते शरीर से बाहर नहीं निकल सकते. पसीने के ज़रिए भी ऐसा नहीं होता.
डॉ. सुलेटा कहती हैं कि अगर प्याज़ को त्वचा के रास्ते शरीर से ज़हरीले पदार्थ बाहर खींचने हों, तो उसे ‘भौतिकी के नियम तोड़ने पड़ेंगे.’
वह कहती हैं, ‘प्याज़ में ऐसा कोई जादुई गुण नहीं है, जिससे वह त्वचा के रास्ते ज़हरीले पदार्थों को बाहर निकाल सके.’
‘ऐसा न तो पैरों के तलवों से हो सकता है और न ही शरीर की किसी दूसरी जगह की त्वचा से.’
कई बार पूरी रात मोज़े में रखने के बाद प्याज़ का रंग बदल जाता है. सोशल मीडिया पर इसे इस बात के सबूत के तौर पर दिखाया जाता है कि प्याज़ ने शरीर के ज़हरीले पदार्थों को सोख लिया.
लेकिन डॉ. सुलेटा के मुताबिक़, इसकी असल वजह कुछ और है.
हवा के संपर्क में आने पर प्याज़ में ऑक्सीडेशन होता है. इसके साथ ही वह त्वचा पर मौजूद सूक्ष्म जीवों के संपर्क में भी आता है. इन्हीं वजहों से उसका रंग बदल जाता है.

डाइट और शरीर को डिटॉक्स करने वाले उत्पादों के प्रचार में अक्सर ‘टॉक्सिन’ शब्द का इस्तेमाल होता है. लेकिन यह साफ़ नहीं बताया जाता कि ये टॉक्सिन किन पदार्थों से आता है.
बस इतना कहा जाता है कि टॉक्सिन शरीर के लिए ख़राब हैं, धीरे-धीरे शरीर में जमा होते रहते हैं और इन्हें किसी तरीक़े से बाहर निकालना ज़रूरी है.
हालांकि, मेडिकल भाषा में ‘टॉक्सिन’ का एक साफ़ मतलब होता है. ये ऐसे ज़हरीले पदार्थ हैं, जिन्हें बैक्टीरिया जैसे जीवित जीव पैदा करते हैं.
अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के मुताबिक़, नुक़सान पहुंचाने वाले रसायन और बहुत ज़्यादा मात्रा में ली गई दवाएं भी इनमें शामिल हो सकती हैं.
लेकिन इन पदार्थों को बाहर निकालने के लिए शरीर का अपना एक सिस्टम होता है.
लिवर ख़ून में मौजूद बेकार पदार्थों को छानता है. इस तरह वह शरीर को नुक़सान पहुंचाने वाले पदार्थों से बचाने में मदद करता है. किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और बेकार पदार्थों को पेशाब के रास्ते बाहर निकालती है.
लिवर और किडनी को स्वस्थ रखने के लिए किसी ख़ास घरेलू नुस्ख़े की ज़रूरत नहीं होती. संतुलित खाना खाने, स्वस्थ वज़न बनाए रखने और पर्याप्त पानी पीने से इन अंगों को ठीक से काम करने में मदद मिलती है.
ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस यानी एनएचएस की सलाह है कि घर पर शरीर को डिटॉक्स करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.
अगर किसी को लगे कि उसने कोई नुक़सान पहुंचाने वाला पदार्थ निगल लिया है, सांस के साथ अंदर ले लिया है या किसी दवा की बहुत ज़्यादा मात्रा ले ली है, तो उसे तुरंत मेडिकल सलाह लेनी चाहिए.
ज़ुकाम में किस चीज़ से मदद मिल सकती है?
एनएचएस के मुताबिक़, ज़ुकाम वायरस के कारण होता है और आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है. इससे जल्दी उबरने के लिए भरपूर आराम करने, पर्याप्त पानी पीने और सेहतमंद खाना खाने की सलाह दी जाती है.
प्याज़ का सूप पीने से शरीर को पानी और पोषण मिल सकता है. इससे गले की खराश में भी कुछ राहत मिल सकती है.
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि किसी बीमारी को ठीक करना और उसके लक्षणों से थोड़ी राहत मिलना, दो अलग-अलग बातें हैं.
डॉ. सुलेटा कहती हैं, ‘ज़ुकाम आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है. आप कोई इलाज करें या न करें, यह क़रीब एक सप्ताह में ठीक हो जाता है. प्याज़ का सूप इसे जल्दी ठीक नहीं करता.’
प्याज़ पकाते समय उसमें मौजूद कुछ विटामिन सी नष्ट हो जाता है. लेकिन इसका कुछ हिस्सा पानी में मिल जाता है. सूप पीने पर यह विटामिन सी शरीर को मिल सकता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है.
हालांकि, शोध बताते हैं कि कच्चे प्याज़ में विटामिन सी ज़्यादा बचा रहता है. प्याज़ को लंबे समय तक उबालने से उसमें मौजूद विटामिन सी की मात्रा कम हो जाती है.
अगर ज़ुकाम के साथ तेज़ बुख़ार जैसे लक्षण कुछ दिनों से ज़्यादा समय तक बने रहें, तो डॉक्टर की सलाह लेने की ज़रूरत हो सकती है.
बच्चों के मामले में इससे पहले ही डॉक्टर से बात करने की ज़रूरत पड़ सकती है.
दावे पर न जाएं, मेडिकल ट्रीटमेंट पर ध्यान दें
विशेषज्ञों के मुताबिक़, शरीर में होने वाली हर सूजन को ‘ख़त्म करने’ की ज़रूरत नहीं होती.
दरअसल, जब शरीर में संक्रमण होता है या कोई चोट लगती है, तो रोग प्रतिरोधक प्रणाली उसके जवाब में प्रतिक्रिया करती है. सूजन इसी प्रतिक्रिया का हिस्सा होती है.
इससे शरीर को अपनी रक्षा करने और क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत शुरू करने में मदद मिलती है.
सूजन शरीर के किस हिस्से में है और उसकी वजह क्या है, इसे समझने के बाद ही तय किया जाना चाहिए कि आगे क्या करना है.
सूजन, दर्द और उस जगह पर गर्माहट इसके आम संकेत हो सकते हैं.
लेकिन अगर ये लक्षण लगातार बने रहें या इनके साथ कुछ ऐसे लक्षण भी दिखाई दें, जिनकी वजह समझ में न आए, तो प्याज़ का इस्तेमाल करने के बजाय मेडिकल मदद लेनी चाहिए.
डॉ. सुलेटा कहती हैं, ‘ऐसे दावों का एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण नतीजा यह भी होता है कि लोग सही इलाज कराने में देर कर देते हैं.’
वह चेतावनी देती हैं कि इंटरनेट पर स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह को सही साबित करने के लिए अक्सर मेडिकल और वैज्ञानिक शब्दों का सहारा लिया जाता है. लेकिन कई बार इन दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं होता.
अगर कोई कहता है कि प्याज़, कोई सप्लीमेंट या दूसरा उत्पाद शरीर से ज़हरीले पदार्थ बाहर निकाल सकता है या शरीर को डिटॉक्स कर सकता है, तो डॉ. सुलेटा उससे सीधे सवाल पूछने की सलाह देती हैं.
वह कहती हैं, ‘थोड़ा और गहराई से पूछिए. कौन से ज़हरीले पदार्थ? यह तरीक़ा काम कैसे करता है? अगर सामने वाला ठीक से यह नहीं समझा पा रहा कि उसका बताया तरीक़ा कैसे काम करता है, तो इसे ख़तरे का संकेत मानिए.’
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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