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आज जैसी नहीं थी दिल्ली की रामलीला, सालों पहले ऐसे मनता था दशहरा

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Source :- LIVE HINDUSTAN

दिल्ली की रामलीला आज बड़े मैदानों, विशाल पुतलों और रंगीन मंचों के लिए जानी जाती है, लेकिन कभी इसका अंदाज बिल्कुल अलग था। जानिए मुगल दौर से आज तक दिल्ली की रामलीला कैसे बदलती गई।

आज दिल्ली में रामलीला का नाम आते ही बड़े मैदान, ऊंचे रावण के पुतले, चमकदार मंच और हजारों लोगों की भीड़ याद आती है। लेकिन कुछ साल पीछे जाएं तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है। उस समय रामलीला सिर्फ मंच पर कहानी दिखाने तक सीमित नहीं थी। इसमें शाही दरबार, सजे हुए घोड़े, मेले और कई तरह की खास रस्में भी शामिल होती थीं। अलग-अलग दौर में दिल्ली की रामलीला ने शहर के बदलते रंग भी देखे। कभी इसे बादशाह के सामने दिखाया जाता था, तो कभी सैनिक खुद राम और रावण की लड़ाई का हिस्सा बनते थे। आइए जानते हैं, समय के साथ दिल्ली की रामलीला कैसे बदलती गई।

मुगल दौर में कैसी थी रामलीला?

जब शाहजहां ने राजधानी आगरा से दिल्ली बदली और शाहजहानाबाद बसाया, तब दशहरा भी शाही दरबार में मनाया जाता था। उस समय रामलीला यमुना और लाल किले के बीच के खुले मैदान में होती थी। शाही परिवार इसे लाल किले की खिड़कियों से देखता था उस दौर में रावण का पुतला कागज और गत्ते से बनाया जाता था। उसके पेट में लाल रंग का शरबत भरा जाता था। जब राम बने बच्चे तीर मारकर रावण का पुतला गिराते, तो शरबत बाहर निकलता और लोगों में बांट दिया जाता था। इसे रावण के खून का प्रतीक माना जाता था।

दशहरे पर सजते थे घोड़े

पुरानी दिल्ली के दशहरे में सिर्फ रामलीला ही नहीं होती थी। शाही घोड़ों को भी खास तौर पर सजाया जाता था। उनके खुरों पर मेहंदी लगाई जाती, माथे पर डिजाइन बनाए जाते और गहनों से सजाया जाता था। इन घोड़ों को लाल किले तक ले जाया जाता था, जहां बादशाह उन्हें देखते थे। अच्छी तरह घोड़े सजाने वाले लोगों को इनाम भी मिलता था। बड़े लोगों की हवेलियों तक सजे हुए घोड़े और हाथी ले जाए जाते थे।

रामलीला में नाव वाला सीन भी होता था

उस समय रामलीला में कई सीन लोगों के सामने असली जगहों पर दिखाए जाते थे। राम के वनवास वाले हिस्से में राम, सीता और लक्ष्मण को एक नाव से तालाब पार कराया जाता था। यह तालाब गंगा का प्रतीक माना जाता था। यह तालाब काफी समय तक वहां रहा, लेकिन आजादी के बाद इसे भर दिया गया और बाद में वहां मार्केट बना।

सैनिक भी करते थे राम-रावण की लड़ाई

दिल्ली की रामलीला हमेशा एक जैसी नहीं रही। 1857 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की वजीराबाद छावनी में भी रामलीला होती थी। यहां हिंदू और मुस्लिम सैनिक मिलकर राम और रावण की सेना की लड़ाई का सीन करते थे। यह आम रामलीला से काफी अलग था। सैनिक अपने तरीके से पूरी लड़ाई को दिखाते थे, इसलिए इसे सैनिकों वाली रामलीला कहा जा सकता है।

समय के साथ बदलता गया अंदाज

समय के साथ रामलीला का तरीका भी बदलता गया। पहले महिला किरदार भी पुरुष ही निभाते थे। बाद में दिल्ली की लव-कुश रामलीला कमेटी ने इस परंपरा को बदला और महिला कलाकारों को महिला किरदार निभाने का मौका दिया। आज दिल्ली में सैकड़ों रामलीलाएं होती हैं। बड़े मंच, स्क्रीन और नई तकनीक ने इसका अंदाज जरूर बदल दिया है, लेकिन राम, सीता, लक्ष्मण और रावण की कहानी आज भी वही है। यही वजह है कि दिल्ली की रामलीला ने शहर के बदलते दौर के साथ खुद को बदला, लेकिन इसकी कहानी और लोगों का जुड़ाव आज भी कायम है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN